ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसके प्रेमसे साधक जन। साधते हैं ब्रह्मचर्य कठिन।
इंद्रियोंपर करके शासन। कठोर नित्य ॥ ६ ॥
ऐसा जो महत्पद। दुर्लभ औ' अगाध।
तट पर ही वेद। खडे अगम्य हो ॥ ७॥
ऐसा जिसका लय होता। वह स्वयं वह बनता।
कैसा यह तुझे कहता। मैं फिर एक बार ॥ ८ ॥
अर्जुन कहता नारायण। यही पूछता था मेरा मन।
सहज कृपा की सकरुण। कहिये जी ॥ ९॥
किंतु कहना अति ही सरल। बोले त्रिभुवन-दीप ये बोल।
जानते हैं तेरा मन निर्मल। कहूंगा संक्षेपमें ॥ १० ॥
मनकी लत होती बहिर्मुख। उसको तोड़कर स्वाभाविक।
करना है उसको अंतर्मुख। हृदय-तलमें ॥ ११ ॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१२॥
बहिर्मुख मनको अंतर्मुख करनेकी साधना—
किंतु तभी है यह घड़ता। जब संयमकी कड़ी लगाता।
सर्व-द्वारमें अनवरत। निग्रहसे ॥ १२ ॥
स्वभावसे ही संयत मन। घर करता अन्तःकरण।
टूटे जिसके कर-चरण। घर न छोड़ता वैसे ॥ १३ ॥
जब होता चित्त ऐसा स्थिर। तब कर प्राणका ओंकार।
लाओ उसको मूर्ध्याकाशपर। सुषुम्ना मार्गसे ॥ १४॥
लय होता न होता आकाशमें। ऐसा धरना है उसे धारणामें।
होता है मात्रात्रय अर्ध-बिंदुमें। तब विलीन ॥ १५॥
तब तो वह समीर। गगनमें कर स्थिर।
ऐक्यमें जैसे ओंकार। लय कर बिंदुमें ॥ १६ ॥
रोकके इंद्रिय-द्वार जकड़े मन अंतर।
तालूमें रखके प्राण करते योग-धारणा ॥ १२ ॥
(30) २३३ सातत्ययोग