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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 302

जड़ाजड़को घुलाता । भ्रूमध्यमें लय होता ।
घंटानाद लय होता। घंटा में ही वैसे ॥ ९७ ॥
अथवा ज्योति घटमें ढकी । न जाने क्या हुई है कबकी ।
ऐसी मृत्यू आती है उसकी । पांडुकुमार ॥ ९८ ॥
ऐसा होता है वह पर-ब्रह्म । परम-पुरुष जिसका नाम ।
ऐसा है वह मेरा निजधाम । स्वयं है वह होता ॥ ९९ ॥
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥
वेदोंको भी अगम्य ब्रह्म-पद प्राप्त करनेका साधना मार्ग-
सकल-ज्ञानका अंत है जो ज्ञान । उस ज्ञानकी एक-मात्र खान
अक्षर कहते उसे ज्ञानी-जन । धनुर्धर ॥ १०० ॥
आंधीमें न उड़ता जान । होता जैसे स्वयं-गगन ।
यदि हो वह जैसा घन । टिकता कैसे ॥ १ ॥
ज्ञानका विषय होनेसे । गुना गया जो ज्ञानसे ।
वृत्ति-ज्ञान लय होनेसे । कहा अक्षर सहज ॥ २ ॥
तभी वेद-विद् नर । कहते उसे अक्षर ।
प्रकृतिसे जो है पर । परमात्म-रूप ॥ ३ ॥
विषयोंको विष मानकर । इंद्रिय सबको शुद्ध कर ।
देह-वृक्ष सायाके अंदर । बैठे है शांत ॥ ४ ॥
इस भांतिसे जो विरक्त । देखते निरंतर पथ ।
निष्कामसे हैं अभिप्रेत । सर्वदा जो ॥ ५ ॥
गाते जिसे अक्षर वेद-वेत्ता
विरक्त जाके जिसमें समाते ।
जो ब्रह्मचारी पद चाहते हैं
तुझे कहूंगा वह तत्व-सार ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी २३२