ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा देखे तो मैं नहीं । ऐसी वस्तु नहीं कहीं ।
जैसा पानी होता नहीं । रसके बिना ॥ ५९ ॥
पवन किसको नहीं छूता । आकाश कहां नहीं रहता ।
वैसी ही सर्वत्र व्यापकता । एक मात्र मेरी ॥ ६० ॥
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥
अतीतमें जितने भूत । मैं ही वे जान तू सतत ।
आज हैं विश्वमें जो पार्थ । वे भी मैं हूं ॥ ६१ ॥
भविष्यमें होंगे जितने ही । अलग मुझसे वे भी नहीं ।
यह बात है कहनेकी ही । वैसा न होता कछु ॥ ६२ ॥
अजी ! रज्जूके भुजंगको जैसे । काल पीला न कह सके ऐसे ।
भूतमात्र सब मिथ्यापनसे । हैं अनिश्चित ॥ ६३ ॥
सदा मैं सुन पांडुसुत । होने पर भी अखंडित ।
संसार ग्रस्त सब भूत । अन्य प्रकारसे ॥ ६४ ॥
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥ २७ ॥
कहता हूं इसका कारण । अब तू ध्यान देकर सुन ।
अहंकार-तनका वरण । हुआ तब ॥ ६५ ॥
जन्म हुआ कुमारीका । आया उसे यौवन कामका ।
हुआ द्वेषसे ब्याह उसका । सुनो तब ॥ ६६ ॥
आपत्य हुआ उन दोनोंके । द्वंद्व मोह नाम हैं उनके ।
बड़े वह प्यारमें दादाके । जो था अहंकार ॥ ६७ ॥
हुये जो और जो होंगे भूत हैं आज जो यहां ।
सबको जानता हूं मैं मुझे कोयी न जानते ॥ २६ ॥
राग औ' द्वेषसे उठे चित्तमें मोह-द्वंद्व जो ।
जगतके सभी प्राणि घिरे हैं इससे यहां ॥ २७ ॥
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