ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥
तथा पूर्व-जन्मकी जो सद्बुद्धि। जीवन पर्यंतकी जो अवधि।
फिर वही आगे भी निरवधि। खिलती जाती ॥ ५७ ॥
पायालु है जो दैवयोगसे। औ' दिव्यांजन पडी आंखोंसे।
देखती गुप्त संपदा जैसे। पातालकी भी ॥ ५८ ॥
वैसे दुर्भेद होते जो सिद्धांत। गुरु-करुणासे ही बुद्धिगत।
करता है उन्हे ग्रहण चित्त। सहज भावसे ॥ ५९ ॥
इंद्रियां होती हैं मनके आधीन। मन होता है पवनमें विलीन।
मूर्ध्न्याकाशमें सहज ही पवन। विलीन हो जाता ॥ ४६० ॥
होता है यह सहज भावसे। अभ्यास होता अपने आपसे।
पूछने आती समाधि आपसे। मानसका घर ॥ ६१ ॥
मानो होता वह योगपीठका भैरव। अथवा हो कार्यारंभका गौरव।
अथवा है वैराग्य सिध्दिक अनुभव। आया आकार लेकर ॥ ६२ ॥
जैसे यह संसार अंकनका नाप। अथवा अष्टांग योग साधन दीप।
जैसे परिमलने ही लिया है रूप। चंदनका ॥ ६३ ॥
संतोषकी बनी मूर्तिसा। सिध्द समाजकी कीर्तिसा।
होता योग्यताका पुंजसा। साधक दशामें ही ॥ ६४ ॥
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥४५॥
समय शतकोटिवर्षोंका। प्रतिबंध जन्म सहस्रका।
लांघके पाया आत्म-सिध्दिक। किनारा वह ॥ ६५ ॥
पूर्वाभ्यास बलसे ही खींचे अवश होकर।
योग-ज्ञान इच्छासे ही शब्दके पार शोधके ॥ ४४ ॥
यत्नसे रहके योगी दोषोंसे मुक्त होकर।
अनेक जन्ममें पाता पूर्ण होके महापद ॥ ४५ ॥
ज्ञानेश्वरी १९६
तब है साधना मात्र संपूर्ण । करती उसका अनुकरण ।
जिससे पाता वह सिंहासन । विवेक राज्यका ॥ ६६ ॥
फिर वह गतिसे विवेककी । लांघ आता है सीमा विवेककी ।
बनता है वह विचारान्तकी । मूर्ति ही मानो ॥ ६७ ॥
मन-बादल वहां छटता । पवनका पवनत्व जाता ।
आकाशका भी विलय होता । अपनेमें ही ॥ ६८ ॥
होता पवनकी अर्धमात्रामें लीन । इतना वह शब्द-सुख संपन्न ।
जिससे होता है उसका शब्द मौन । अपने आप ॥ ६९ ॥
ऐसी है यह ब्राह्मी-स्थिति । सब गतिकी जो है गति ।
ऐसी वह अमूर्त मूर्ति । बनता स्वयं ॥ ७० ॥
अपने अनेक जन्मोंमें पूर्वके । जाल झटका दिये थे विक्षेपके ।
इसलिये क्षणमें ही जनमके । लग्न घटिका भरी ॥ ७१ ॥
किया तद्रूपतासे लग्न । उसने होकर अभिन्न ।
अभ्र लोपसे है गगन । होता एक रूप ॥ ७२ ॥
जहांसे होता विश्व उत्पन्न । तथा होता है जहां विलीन ।
प्राप्त करता है विद्यमान । शरीरके ही ॥ ७३ ॥
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६ ॥
जिस लाभकी करके आशा । धैर्य-बहुका किये भरोसा ।
कूदते हैं करके साहस । कर्मनिष्ठ ॥ ७४ ॥
अथवा जिस वस्तुकेलिये । ज्ञान-कवच पहन लिये ।
जूझे प्रपंचमें जिसलिये । ज्ञानी जन ॥ ७५ ॥
अथवा फिसड्डी निराधार । तप दुर्गकी टूटी दिवार ।
भिडे उसको चढ़ने घोर । तपस्वी जन ॥ ७६ ॥
ज्ञानी तापस कर्मिष्ठ इनसे जो विशेष है ।
माना है श्रेष्ठ योगीको योगी हो पार्थ तू तभी ॥ ४६ ॥
१९७ आत्म-दर्शनयोग
था जो भजकोंका भजनीय । तथा पूजकोंका पूजनीय ।
और याज्ञिकोंका यजनीय । सदा सर्वत्र ॥ ७७ ॥
वही तत्व जो पूर्ण । हुआ स्वयं निर्वाण ।
जो साधना कारण । सिद्ध तत्व ॥ ७८ ॥
तभी कर्म निष्ठोंमें वंद्य । तथा ज्ञानियोंमें है वेद्य ।
है वह तापसमें आद्य । तपोनाथ ॥ ७९ ॥
जीव और परमात्म-संगम । जिसका है ऐसा मनोधर्म ।
होती है उस तनकी महिमा । अपार यहां ॥ ४८० ॥
तभी मैं इस कारणसे । कहता हूं सदा तुझसे ।
योगी हो अंतःकरणसे । अर्जुन तू ॥ ८१ ॥
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनांतरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥
अजी योगी जो कहलाता । देवोंका वह देव होता ।
मेरा सुख सर्वस्व तथा । चैतन्य ही वह ॥ ८२ ॥
जिसके भजनसे भजनीय भजन । तथा यह भक्ति साधन स्वयं संपूर्ण ।
हुआ वह स्वयं अनुभवसे तू जान । अखंडित ॥ ८३ ॥
फिर हमारे प्रेमका । स्वरूप नहीं वाचाका ।
अनिर्वचन है उसका । विषय अर्जुन ॥ ८४ ॥
वह है जो प्रेम एकात्म । उसकी है योग्य उपमा ।
मैं शरीर और वह आत्मा । यही एक ॥ ८५ ॥
ऐसा भक्त चकोर-चंद्र । वह भुवनैक नरेंद्र ।
बोला सर्वगुण समुद्र । कहता संजय ॥ ८६ ॥
जहां पहलेसे ही पार्थ । जानना चाहता था सार्थ ।
जान लिया है यदुनाथ । हुआ अधीर ॥ ८७ ॥
श्रेष्ठ है योगियोंमें जो मुझमें प्राण रोपके ।
भजता मुझ श्रद्धासे मानता श्रेष्ठ मैं उसे ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी १९८
जान कर वह प्रमुदित मन । निरूपणका है यथार्थ ग्रहण ।
करता है यह जैसे सुदर्पण । कहेगा श्रीरंग ॥ ८८ ॥
ऐसा प्रसंग आगे आयेगा । वहां शांत रस खिला होगा ।
अब है वहां बोया जायेगा । प्रमेय बीज ॥ ८९ ॥
सत्वकी वर्षासे पिघला ढेला । हुआ चित्तका बाग गुलगुल ।
सहजतासे हुआ क्षेत्र कोमल । इस समय ॥ ४९० ॥
फिर अवधानकी क्यारी सुंदर । मिली स्वर्णमय इस अवसर ।
निवृत्त-चित्तने यह जान कर । प्रेरणा दी बुवाईकी ॥ ९१ ॥
चाह कर किया मुझे प्रेमसे । सद्गुरुने सहज लीलासे ।
बीज बोया आशीर्वादसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ९२ ॥
सो मेरी वाणीसे जो निकलेग । सन्त हृदयमें महुलायेगा ।
रहने दो अब क्या कहा कहियेगा । श्रीरंगने वहां ॥ ९३ ॥
किंतु वह मनके कानसे सुनना । शब्द है जो बुद्धि-नयनसे देखना ।
चित्तकी कीमत देकर ही है लेना । मेरे शब्द ॥ ९४ ॥
यह सब ध्यान देकर । ले जाना हृदय-भीतर ।
सज्जनोंको ये निरंतर । देंगे संतोष ॥ ९५ ॥
स्वहितको स्थिर करेंगे । पूर्णत्वको जगायेंगे ।
तथा लखौरी चढ़ायेंगे । जीव पर ये ॥ ९६ ॥
अब जो मुकुंद अर्जुनसे । बोलेगा सुंदर विनोदसे ।
वह सब ओवीके छंदसे । कहूंगा मैं ॥ ४९७ ॥
गीता श्लोक ४७
ज्ञानेश्वरी ओवी ४९७-
७
ज्ञानविज्ञानयोग
भगवान उवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥
प्रापंचिक ज्ञान विज्ञान है, इसको सत्य मानना अज्ञान -
सुन तू अब पार्थ । कहता है अनंत ।
हुआ है योग-युक्त । इस समय ॥ १ ॥
जानता तू मुझे पूर्ण रूपसे । हथेली पर रखे रत्नके जैसे ।
अब तुझे ज्ञान कहूंगा मैं वैसे । विज्ञान सह जो ॥ २ ॥
यहां विज्ञानका है क्या करना । ऐसी यदि तेरी मनो भावना ।
किंतु उसको पहले जानना । आवश्यक यहां ॥ ३ ॥
क्यों कि ससयमें स्वरूपज्ञानके । मिटता यह नयन पहुंचके ।
जैसे किनारेसे लगे जहाजके । नहीं है वेग ॥ ४ ॥
श्री भगवानने कहा
.चित्ते आसरा मेरा लेके जो योग साधते ।
कसे समग्र निःशंक जानेंगे मुझसे सुन ॥ १ ॥
˙ विज्ञान सह जो ज्ञान संपूर्ण कहता तुझे ।
जानके जो नहीं अन्य जगमें जानना रहा ॥ २ ॥
होती नहीं पहुंच वहां ज्ञानकी । पुच्छ प्रगति होती है विचारकी ।
भोथरा हो जाती है धार तर्ककी । उस समय ॥ ५ ॥
नाम है जिसका ज्ञान अर्जुन । उससे भिन्न प्रपंच विज्ञान ।
वहां सत्य बुद्धि ही है अज्ञान । जान तू यह ॥ ६ ॥
अन्त होगा जब अज्ञानका । निवारण होगा विज्ञानका ।
तब साक्षात् होगा ज्ञानका । अपनेमें पूर्ण ॥ ७ ॥
रहस्य है ऐसा जो गूढ । वह करूंगा शब्दरूढ ।
जिसका पूर्ण करूंगा कोड । मनका मैं ॥ ८ ॥
जिससे है मिटता प्रवचन । सुननेवालोंका भी व्यसन ।
मिटता है यह सब अज्ञान । ऊंच नीचका ॥ ९ ॥
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३ ॥
मुझे जाननेवाला कोई एकाद होता है—
सहस्रो मनुष्योंमें कहीं एक । चाह करता इस विषयकी नेक ।
चाहनेवालोंमें भी कहीं एक । पाता है मुझे ॥ १० ॥
जैसे भरा हुआ भुवन । एकेक छंटके अर्जुन ।
करते संघटित सेना । लक्षाधिक ॥ ११ ॥
उसमें भी कहीं एक । सहते घात अनेक ।
पाता है विजयश्रीका । सिंहासन ॥ १२ ॥
आस्थाके इस महापूरमें । कूदते हैं जन करोडोंमें ।
पहुंचता है पैल-तीरमें । कोई एक ॥ १३ ॥
इसीलिये यह नहीं सामान्य । कहनेमें भी यह असामान्य ।
फिर कहेंगे तुझे वह अन्य । अब सुन विज्ञान ॥ १४ ॥
शत सहस्रमें एक मोक्षार्थ जुटता कभी ।
जुटते उसमें कोई तत्त्वता जानते मुझे ॥ ३ ॥
(26) २०१ ज्ञान विज्ञानयोग
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥
अब तू सुन हे धनंजय । है महदादिक मेरी माया ।
जैसे प्रतिबिंबित हो छाया । निजांगोंकी ॥ १५ ॥
यह विज्ञान है—
इसे कहते प्रकृति जान । जान यह जो अष्टधा भिन्न ।
उत्पन्न होता है त्रिभुवन । इससे ही ॥ १६ ॥
यह है कैसी अष्टधा भिन्न । पूछता है यदि यह मन ।
कहता हूं अब विवेचन । सुन तू यह ॥ १७ ॥
आप तेज तथा गगन । धरणी मारुत औ' मन ।
बुद्धि अहंकार है भिन्न । ये भाग आठ ॥ १८ ॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥
औ' इन आठोंकी जो समावस्था । मेरी परमप्रकृति है पार्थ ।
उसका नाम है सुन व्यवस्था । जीव ऐसा ॥ १९ ॥
जड़को जो है जिलाता । चेतनको है चेताता ।
मनसे है मनवाता । शोक मोहादिक ॥ २० ॥
बुद्धिमें जो शक्ति है जानना । उसके सान्निध्यके कारण ।
अहंकार कौशल्यके कारण । उसने धरा जगत ॥ २१ ॥
पृथ्वी आप तथा तेज वायु आकाश पांचवा ।
मन बुद्धि अहंकार मेरी प्रकृति है यह ॥ ४ ॥
हुई ये अपरा मेरी दूसरी जान तू परा ।
जीव रूप बनके जो धरता विश्वको सब ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी २०२
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥
सूक्ष्म प्रकृति जब लीलासे । पाती स्थूलके परिणामसे ।
निकलती है टंकसालसे । भूत सृष्टि ॥ २२ ॥
उद्बीज, जारज, स्वेदज, अंडज । टंकसालसे निकलते सहज ।
उसके मूल्य है समान महज । आकार भिन्न ॥ २३ ॥
होते हैं चौरासी लक्षके आकार । उसकी सीमा न जानता भांडार ।
भर जाता है आदिशून्यका घर । इन नाणोंसे ॥ २४ ॥
पंच भौतिक ऐसे बहुतसे । रंग रूप धरते हैं एकसे ।
उसको लिखती है नियमसे । स्वयं प्रकृति ही ॥ २५ ॥
नाण्य आकृतिका प्रसार करती । फिर उसको घट्या भी करती ।
कर्माकर्म व्यवहारमें कराती । प्रवर्तन स्वयं ॥ २६ ॥
जाने दो यह रूपक कुशल । कहता हूं तुझको मैं सरल ।
नाम रूपका विस्तार विशाल । करती है प्रकृति ॥ २७ ॥
तथा प्रकृति मुझमें बिंबित । इसमें नहीं है अन्यथा बात ।
तभी सृष्टिका आदि मध्य अंत । जानो मुझको ही ॥ २८ ॥
मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७ ॥
यह जो रोहिणीका जल । उसका देखनेसे मूल ।
रवि-रश्मि नहीं केवल । है वह भानु ॥ २९ ॥
इसी भांति सुन किरीटी । परा प्रकृतिसे जो सृष्टि ।
उस पार जाय तो दृष्टि । वहां हूं मैं ॥ ३० ॥
इन दोसे सभी भूत होते उत्पन्न जान तू ।
उसीसे विश्व है सारा मैं ही हूं मूल अंत भी ॥ ६ ॥
नहीं है दूसरा तत्व मुझसे पर जो रहे ।
पिरोया मुझमें सारा धागेमें मणि मान जो ॥ ७ ॥
२०३ ज्ञान-विज्ञानयोग
ऐसा हू मै सबका आधार । मुझमें सृष्टि स्थिति संहार ।
जैसा मणियोंमें होता डोर । आधार रूप ॥ ३१ ॥
जैसे सुवर्णके मणि किये । सुवर्ण सूत्रमें वे पिरोये ।
वैसे सृष्टिका धारण किये । रहा हूं मै ॥ ३२ ॥
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥
इसीलिये उदकमें रस । अथवा पवनमें जो स्पर्श ।
तथा शशि सूर्यमें प्रकाश । वह मै ही जान ॥ ३३ ॥
वैसा ही नैसर्गिक शुद्ध । पृथ्वीमें रहता जो गंध ।
तथा गगनमें मै शब्द । प्रणव वेदमें ॥ ३४ ॥
नरमें जो होता नरत्व । अहंभावका जो है सत्व ।
वह पौरुष मैं औ' तत्व । कहता तुझे ॥ ३५ ॥
अग्निका भी अर्जुन ऐसा ही है । वह तेजका निरा कवच है ।
उसके परे जो निज तेज है । वह मै ही जान ॥ ३६ ॥
तथा जो नानाविध योनियोंमें । जनमके प्राणी त्रिभुवनमें ।
आचरण करते हैं जीवनमें । अपने पार्थ ॥ ३७ ॥
एक पवन ही है पीता । दूसरा तृणार्थ है जीता ।
कोई अन्नाधार रहता । जलपे एक ॥ ३८ ॥
सब भूतोंका जो है अन्न । प्रकृतिवश है जीवन ।
उन सबमें जो अभिन्न । मै ही केवल ॥ ३९ ॥
हुवा मैं रस पानीमें प्रकाश चंद्र-सूर्यमें ।
वेदमें ॐ 'ख' में शब्द नरोंमें पुरुषार्थ मैं ॥ ८ ॥
मैं पुण्य गंध पृथ्वीमें उष्णता अग्निमें बना ।
.आयुष्य प्राणि-मात्रोंमें तापसोंमें बना तप ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी २०४
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
विश्वोत्पत्तिके कालमें जो था । गगन अंकुरसे खिलाथा ।
अंतमें अक्षर निगलाथा । प्रणव पटके ॥ ४० ॥
अब यह विश्वाकार रहता । विश्वके समानही है दीखता ।
महा-प्रलय दशामें है होता । निराकार ॥ ४१ ॥
ऐसा अनादि जो सहज । वह मैं ही हूं विश्व-बीज ।
हथेली पर वह आज । देता हूं तुझे ॥ ४२ ॥
इस पर पांडुकुमार । करेगा गंभीर विचार ।
इसका प्रभाव सुंदर । होगा श्रेष्ठ ॥ ४३ ॥
जाने दो अप्रासंगिक आलाप । अब न बोलूंगा ऐसा संक्षेप ।
जान तपस्वियोंमें है जो तप । वह रूप है मेरा ॥ ४४ ॥
बलियोंमें है जो बल । रहता है जो अचल ।
बुद्धिवंतोंमें केवल । बुद्धि है मैं ॥ ४५ ॥
भूतमात्रोंमें है जो काम । जिससे उत्कर्ष हो धर्म ।
मैं हूं कहता आत्माराम । जान निश्चल ॥ ४६ ॥
अन्यथा जो विकारोंके रूपमें । पडे इंद्रियानुकूल कर्ममें ।
किंतु धर्म-विरुद्ध पथमें । जाने नहीं देता ॥ ४७ ॥
शास्त्र निषिद्ध कर्मका जब कुपथ । तज चलता विहित कर्मका पथ ।
तब रहता नित मशालची साथ । धर्म-रूप ॥ ४८ ॥
बीज जो सब भूतोंमें वह हूं मैं सनातन ।
तेज मैं तेजस्वियोंमें बुद्धि मैं बुद्धिमानमें ॥ १० ॥
वैराग्य-युक्त निष्काम बल मैं बलवानका ।
धर्मसे अविरोधी मैं भूतोंकी काम-वासना ॥ ११ ॥
२०५ ज्ञान-विज्ञानयोग
ऐसा काम तेज देता चलता । जिससे होती धर्मकी पूर्णता ।
संसारमें मुक्ताफल भोगता । मोक्षतीर्थका वह ॥ ४९ ॥
तब श्रुति-गौरवके मांडवेपर । बढ़ाता काम सृष्टि-लताका अंकुर ।
सुकर्म फल सह पल्लव सुंदर । पहुंचते मोक्षतक ॥ ५० ॥
ऐसा जो काम है धर्म विहित । जिसमें सृष्टिका बीज निहित ।
वह हूं मैं कहता जगन्नाथ । अर्जुनसे ॥ ५१ ॥
कहना कितना भिन्न भिन्न । वस्तुमात्र मुझसे उत्पन्न ।
जिससे भरा है त्रिभुवन । जान तू पार्थ ॥ ५२ ॥
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥
जो हैं ये सात्विक भाव । या रज-तमादि सर्व ।
वे मम रूप संभव । जान तू यहां ॥ ५३ ॥
हुए ये यदि मुझसे ही । इसमें मैं रहता नहीं ।
स्वप्न कुंडमें डूबे नहीं । जागृति जैसी ॥ ५४ ॥
नहीं तो बीज होता ठोस । जैसे जमा हुआ ही रस ।
फूटके कौपल सरस । बनता काष्ठ ॥ ५५ ॥
फिर कहो उस काष्ठमें सभी । बीजपन रहता है क्या कभी ।
वैसा दीखता विकार कर भी । नहीं मैं विकारमें ॥ ५६ ॥
अथवा गगनमें घिरते बादल । उनमें न रहता गगन केवल ।
अथवा बादलमें होता है सलिल । जलमें नहीं अभ्र ॥ ५७ ॥
फिर उस जलके आवेशसे । दीखता लखलख तेज जैसे ।
किंतु उस तेजमें जल वैसे । रहता है क्या ॥ ५८ ॥
जैसे अग्निसे है धूम होता । धूममें क्या अग्नि है रहता ।
वैसे विकरके भी नहीं होता । विकृत मैं कभी ॥ ५९ ॥
मुझसे हैं बने भाव सत्व राजस तामस ।
इनमें न रहता मैं रहते मुझमें यही ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी २०६
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥
मुझसे निर्मित त्रिगुणोंने मुझे ढक दिया है—
जलसे हुई जलकुंभी जैसे । छिपा देती है सलिलको वैसे ।
झूठे ही घटोंके आवरणसे । छिपता आकाश ॥ ६० ॥
अजी ! स्वप्न यह मिथ्या सब । आप हुआ निद्रावश तब ।
आती उसकी प्रतीति जब । समरसता है क्या ॥ ६१ ॥
अजी ! पानी ही जो आंखका । रूप लेता जब झिल्लीका ।
देखना ही वह आंखका । मिटा देता ॥ ६२ ॥
ऐसी ही यह मेरी माया । बनी त्रिगुणात्मक छाया ।
उसने मुझे है छिपाया । आवरण बन ॥ ६३ ॥
प्राणिमात्र तभी मुझे नहीं जानते । मेरे होकर भी मद्रूप नहीं होते ।
जल होकर जलमें न गलते । मोति जैसे ॥ ६४ ॥
माटीसे बनाया हुआ जो मटका । तुरंत मिलानेसे होता मृत्तिका ।
किंतु आगमें जला हुआ मटका । रहता खपरा बन ॥ ६५ ॥
वैसे भूतमात्र सर्व । हैं मेरे ही अवयव ।
किंतु अविद्यासे .जीव । बने हैं जो ॥ ६६ ॥
तभी ये मेरे होकर भी मैं नहीं । मेरे होकर भी मुझे जानते नहीं ।
अहं ममताकी भ्रांतिमें ही यही । हुए विषयांध ॥ ६७ ॥
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥
अहं ममताकी भ्रांतिके कारण जन्ममरण-चक्र—मायानदी—
इन्हीं त्रिगुण भावोंने किया है विश्व मोहित ।
जिससे मैं नहीं ज्ञात गुणातीत सनातन ॥ १३ ॥
दैवी गुणमयी माया मेरी है अति दुस्तर ।
मेरी शरण जो आते इसको तरते वही ॥ १४ ॥
२०७ ज्ञान-विज्ञानयोग
महदादि है यह मेरी माया । उसे पार करके धनंजय ।
होना है मद्रूपमें जो विलय । किस भांतिसे ॥ ६८ ॥
टूटे कगारसे जो ब्रह्माचलके । उमंगसे मूल संकल्प जलके ।
उठे हैं बुल्ले पंचमहाभूतोंके । छोटेसे वहां ॥ ६९ ॥
सृष्टि विस्तारके जो ओघसे । काल-ग्रास शक्तिके वेगसे ।
प्रवृत्ति निवृत्तिके कूलसे । बहती उमड़कर ॥ ७० ॥
जो गुण-घनकी महा-वृष्टिसे । भरी है मोहके महा-पूरसे ।
काटकर ले जाती है वेगसे । यम नियम नगर ॥ ७१ ॥
भरी है जो द्वेषावर्त्तोसे । मत्सरादि बडे मोड़ोंसे ।
तथा भयानक मीनोंसे । प्रलोभनके ॥ ७२ ॥
चक्कर हैं उसमें प्रपंचके । महापूर आते कर्माकर्मके ।
ऊपर तरते सुख दुःखके । झाग-पुंज ॥ ७३ ॥
वहां द्वीप पर हैं रतीके । टकराते तरंग कामके ।
दीखते हैं जीव समूहके । झाग पुंज ॥ ७४ ॥
अंतः प्रवाह अहंकारके । उबाल आते मदत्रयके ।
उठे तरंग विषयोर्मिके । पुनः पुनः ॥ ७५ ॥
जहां रेलेसे उदयास्तके । गढे पड़ते जन्म मृत्युके ।
बुल्ले उसमें पंच भूतके । उठते औ' फूटते ॥ ७६ ॥
संमोह विभ्रम हैं मीन जिसके । निगलते कौर सात्विक धैर्यके ।
वक्र गतिसे चलते अज्ञानके । भंवर भी जहां ॥ ७७ ॥
जहां भ्रांतिके गंदले जलमें । फंसता जीव आशाके पंकमें ।
रजोगुणकी खलबलीमें । गूंजता स्वर्ग ॥ ७८ ॥
वहां है तमकी तीव्रधार । सत्वकी है स्थिर औ' गंभीर ।
यह तैरनेमें भयंकर । माया-नदी ॥ ७९ ॥
पुनर्जन्मके उत्तंग तरंग । छूते सत्य-लोकके गिरिश्रृंग ।
ढलती जिससे शिला भी संग । ब्रह्मलोककी ॥ ८० ॥
महानदीका यह पूर । वह जाता जो भयंकर ।
करे कौन इसको पार । धनंजय ॥ ८१ ॥
ज्ञानेश्वरी २०८
यहां है एक और आश्चर्य । करते हैं जो तरणोपाय ।
होता है वह सब अपाय । वह कैसा जान ॥ ८२ ॥
बुद्धि बाहूसे जो तरने गये । पता नहीं चला वे कहां गये ।
अभिमान डोहमें डूब गये । ज्ञानमानी जो ॥ ८३ ॥
लिया जिन्होंने वेदोंका आश्रय । साथ ही दिया मानको प्रश्रय ।
हुए वे मद-मीनमें ही लय । पूर्ण रूपसे ॥ ८४ ॥
जिसने किया तारुण्यका साथ । उसपे पड़ा मन्मथका हाथ ।
उसे विषय मगरके दांत । चबाते सदा ॥ ८५ ॥
फिर वृद्धावस्थाका जाल । मति-भ्रम कंप जंजाल ।
कसता जाता पल पल । चहूं ओरसे ॥ ८६ ॥
पटकता फिर शोक तीर पर । क्रोधावर्तमें नित उलझाकर ।
जब उठाते हैं उसमेंसे सिर । कोंचते विपद्गृध्र ॥ ८७ ॥
रुते फिर दुःख पंकमें । फंसे नित मृत्यु-पाशमें ।
गये जो काम आश्रयमें । गये व्यर्थ ही जो ॥ ८८ ॥
यज्ञ-क्रियाके साधनसे । लैस होकर तरनेसे ।
स्वर्ग-कंदरामें जा फंसे । यकायक ॥ ८९ ॥
मुक्ति-किनारा जो पाने गये । कर्म-बाहूंका आसरा लिये ।
चक्करमें ही उलझ गये । विधि-निषेधके ॥ ९० ॥
वहां वैराग्य नांव नहीं जाती । विवेकको थाह नहीं मिलती ।
योग-विद्या भी यदि काम आती । यदाकदा ही ॥ ९१ ॥
अपना बल लगाकर । माया-नदीको तैर कर ।
पार करनेका विचार । व्यर्थ ही है ॥ ९२ ॥
कुपथ्यशीलकी मिटे व्याधी । साधु जाने दुर्जनकी बुद्धि ।
अथवा लोभी त्यजे श्रीसिद्धि । हाथमें जो आयी ॥ ९३ ॥
अथवा दंड डरे चोरसे । कांटा निगला जावे मीनसे ।
तथा काय लडे भूतसे । वैसे ही पार्थ ॥ ९४ ॥
या जाल कुतरे मृग-छौना । चींटीका हिमगिरि लांगना ।
तभी है माया नदी तैरना । जीवसे साध्य ॥ ९५ ॥
२०९ ज्ञान-विज्ञानयोग
(27)
अजी ! सुन तू पांडुसुता । कामी न जीतता वनिता ।
वैसी मायामय सरिता । न तैरता जीव ॥ ९६ ॥
किंतु सरते सहज लीलासे । भजते मुझे जो सर्व भावसे ।
सूखा उनके इसी तीरसे । मायाका जल ॥ ९७ ॥
सद्गुरु मांझी उनके साथ । प्रतीतिका बल उनके हाथ ।
आत्म-निवेदनकी है सतेज । डांगी ही जो ॥ ९८ ॥
अहंभावका जो तजकर भार । विकल्प आंधीका झांका ढालकर ।
अनुराग जलावेगका उतार । लेकर टोह ॥ ९९ ॥
फिर लिया ऐक्यका आधार । उसे जोडा बोधका उतार ।
तब निवृत्तिका पैल-तीर । जीत लिया ॥ १०० ॥
उपरतिका चप्पू मारकर । सोऽहंभावका साम्य साधकर ।
फिर चले निवृत्ति तट पर । सहज भावसे ॥ १ ॥
इस उपायसे जो मेरे हुये । वे सब मेरी माया तर गये ।
ऐसे भक्त भी क्वचित ही भये । नहीं अधिक ॥ २ ॥
न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥
सभी अहंकारकी भूत-चेष्टामें आते हैं—
अन्य जन हैं जो अवांतर । अहंकारका भूत संचार ।
होनेसे विस्मृत निरंतर । आत्म-बोधसे ॥ ३ ॥
हीन मूढ दुराचारी मेग आश्रय छोड़के ।
भ्रात होकर मयासे पाते हैं भाव आसुरी ॥ १५ ॥
भक्त चार सदाचारी भजते मुझको नित ।
ज्ञानी तथैव जिज्ञासू अर्थार्थी पार्थ विव्हल ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी २१०
होता नियम-पटका विस्मरण । अधोगतिका रहता नहीं भान ।
किया जाता शास्त्र-निषिद्ध ही जान । अकार्य सब ॥ ४ ॥
क्यों किया शरीरका आश्रय । भूलकर ही मूल उद्देश्य ।
तदर्थ करणीय जो कार्य । छोडकर ॥ ५ ॥
इंद्रिय-ग्रामके चौराहेपर । अहं ममताके गप्पोंमें भर ।
विकारोंके समुदाय अपार । जुटाते रहते ॥ ६ ॥
दुःख-शोकके घावोंसे । प्रहारोंके विचारसे ।
बेभान माया-तमसे । ग्रस्त हैं जो ॥ ७ ॥
इसीलिये वे बिछुडे मुझसे । अन्य जो भजते चतुर्विधसे ।
उन्होंने आत्महित है जिससे । किया वृद्धिगत ॥ ८ ॥
चार प्रकारके मेरे भक्त ---
पहला आर्त कहलाता । दूसरा जिज्ञासू बनता ।
तीसरा अर्थार्थी है होता । चौथा है जो ज्ञानी ॥ ९ ॥
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥
दुःखी होनेसे भजता आर्त । जिज्ञासु भजता है ज्ञानार्थ ।
तीसरा है भजता अर्थार्थ । धनंजय ॥ ११० ॥
मत्प्रिय ज्ञानी भक्त—
अब बात चौथेकी रही । उसको करणीय नहीं ।
वही एक भक्त है सही । ज्ञानी है जो ॥ ११ ॥
होता है जो ज्ञानके प्रकाशसे । मुक्त सदा भेदाभेद तमसे ।
रहता मद्रूप-समरससे । तथा भक्त भी जो ॥ १२ ॥
श्रेष्ठ है सबमें ज्ञानी नित्य-युक्त अनन्य जो ।
उसे मैं प्रिय अत्यंत वह भी प्रिय है मुझे ॥ १७ ॥
२११ ज्ञान-विज्ञानयोग
जैसे सामान्य दृष्टिसे स्फटिक । आभास होता है मानो उदक ।
वैसा लगता ज्ञानी सकौतुक । नहीं है ज्ञानी ॥ १३ ॥
पवन जब गगनमें घुल जाता । उसका अस्तित्व भिन्न नहीं रहता ।
ज्ञानीका समरसमें विलय होता । रहता जैसे ॥ १४ ॥
हिलकर देखा पवन । दीखता गगनसे भिन्न ।
वैसे स्वभावसे गगन- । जैसे रहता ॥ १५ ॥
ज्ञानी वैसे काया-कर्मसे । दीखता उपासक जैसे ।
आंतरिक अनुभावसे । मद्रूप है जो ॥ १६ ॥
किंतु वह ज्ञानके प्रकाशसे । अनुभवता तत्वमसि ऐसे ।
मैं भी कहता तब आनंदसे । है वह “मम आत्मा” ॥ १७ ॥
जो जीव भाव परका बोध पाकर । करना जानता शुद्ध व्यवहार ।
पानेसे वह केवल भिन्न शरीर । मुझसे भिन्न है क्या ॥ १८ ॥
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥१८॥
ऐसे अपने स्वार्थके लोभसे । भक्त बनकर चिपकते मुझसे ।
किंतु मैं प्रेम करता जिनसे । वह है ज्ञानी मात्र ॥ १९ ॥
अजी ! दूध पय घृतकी जो आशा । उलझाती लोगोंसे गयको फांसा ।
किंतु उस पाशके बिन भी कैसा । दूध पाता है बछड़ा ॥ १२० ॥
क्यों कि वह तन मन प्राणसे । न जाने अन्य कुछ भी जिससे ।
जो सामनेसे दीखता है उसे । मानता माय मेरी ॥ २१ ॥
इस भांति जो हैं अनन्य गति । तभी करती है गाय भी प्रीति ।
इसलिये कहता लक्ष्मीपति । वह है यथार्थ ॥ २२ ॥
रहने दो फिर वे बोले । अब तुझसे हम बोले ।
वे तीन भक्त भी भले । भाते हैं मुझको ॥ २३ ॥
हैं ये उदार सारे ही ज्ञानी तो स्व-समान है ।
मुझमें स्थिर जो युक्त गति अंतिम जानके ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी २१२
किंतु जिसने मुझे जानकर । मुड़कर देखा नहीं संसार ।
सरिता सागरको प्राप्तकर । न मुड़ती जैसे ॥ २४ ॥
जिसके हृदय गह्वरमें उगम । अनुभव गंगाका मुझसे संगम ।
कैसे गायें फिर महिमा अनुपम । शब्दोंसे उसकी ॥ २५ ॥
अजी ! जो ज्ञानी कहलाता है । वह तो मेरा चैतन्य ही है ।
यह बात कहनेकी नहीं है । कहता हूं तुझसे ॥ २६ ॥
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९ ॥
ज्ञानी भक्तिका महान् अनुभाव—
वह तो घने वनमें विषयोंके । आया है आतंकसे काम-क्रोधके ।
पाकर छुटकारा सद्वासनाके । पहाड़पर ॥ २७ ॥
फिर वह साधु-संगसे धनुर्धर । विहित कर्म-पथ पर चलकर ।
निषिद्ध-प्रवृत्ति पथ छोड़कर । कर्म-मार्गसे ॥ २८ ॥
शत-जन्मोंका है प्रवास करता । फलाशाका जूता नहीं पहनता ।
फल-हेतुका लेख कौन लिखता । ऐसी स्थितिमें ॥ २९ ॥
शरीर संयोगकी रातमें ऐसे । सर्व-संग त्यागकी सिद्धतासे ।
दौडनमें पौ फटी अनायाससे । कर्मक्षयकी ॥ १३० ॥
फिर चमकी उषा गुरु-कृपाकी । खिल फैली स्वर्ण-किरण ज्ञानकी ।
वहां प्रतीति हुई साम्य-सिद्धिकी । अंतर दृष्टिमें ॥ ३१ ॥
जिस ओर देखो तब मैं हूं । एकांत लोकांतमें मैं ही हूं ।
सदा सर्वत्र मैं एक ही हूं । मैं ही उसका ॥ ३२ ॥
उसके लिये सदा सर्वत्र कहीं । मैं छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं ।
तलावमें डूबी गगरीको कहीं । जैसे जल सर्वत्र ॥ ३३ ॥
होता है वह मेरे भीतर । उसको मैं बाहर भीतर ।
इसको शब्दोंमें गूंथकर । कहा नहीं जाता ॥ ३४ ॥
अनेक जन्मके पीछे पायो हैं शरणागति ।
विश्व देखें वासुदेव संत है अति दुर्लभ ॥ १९ ॥
२१३ ज्ञान-विज्ञानयोग
ऐसा होता वह ज्ञान-सागर । जिससे सदा बाहर भीतर ।
देखता आत्म-रूप निरंतर । विश्वमें आप ॥ ३५ ॥
यह समस्त है श्रीवासुदेव । प्रतीति रससे ढला है भाव ।
इसीलिये भक्तमें वह राव । तथा ज्ञानियोंमें भी ॥ ३६ ॥
उसका अनुभव भंडार । भरता है जंगम स्थावर ।
ऐसा महात्मा हे धनुर्धर । दुर्लभ मिलना ॥ ३७ ॥
नाशवंत वस्तुओंकी इच्छासे आराधना करनेवाले अनेक—
ऐसे बहुत आते हैं अर्जुन । करते हैं जो भोगार्थ भजन ।
आशा तमसे जिनके नयन । हुए अति-मंद ॥ ३८ ॥
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताःस्वया ॥ २० ॥
होती जब फलकी तीव्र आस । हृदयमें होता काम प्रवेश ।
बुझाता है उसका सहवास । ज्ञान-दीपको ॥ ३९ ॥
पडनेसे ऐसा उभय अंधार । समीपस्थ मुझको वे भुलाकर ।
होते हैं सर्व भावसे अनुचर । देवताओंके ॥ १४० ॥
पहलेसे जो दास है प्रकृतिके । उसीमें वश है भोग लालसाके ।
लोलुपतासे रचते हैं पूजाके । महोत्सव ॥ ४१ ॥
क्या है उसकी नियम-बुद्धि । कैसी है उपचार-समृद्धि ।
अर्पण करते हैं यथाविधि । विहित रूपसे ॥ ४२ ॥
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥
भ्रांत जो कामना ग्रस्त पूजते अन्य दैवत ।
स्वभाव वश अज्ञानी उनके ही विधानसे ॥ २० ॥
पूजना चाहते जैसे श्रद्धासे जिस रूपको ।
जैसी है जिसकी श्रद्धा करता स्थिर मैं स्वयं ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी २१४
किंतु जो है अन्य देवता । भजनेकी चाह करता ।
इच्छा पूर्तिमें ही करता । उनकी भी ॥ ४३ ॥
देव-देवीमें मैं ही रहता । यह भी वह नहीं जानता ।
सबमें वह भाव धरता । भिन्न भिन्न ॥ ४४ ॥
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥
फिर है वह श्रद्धायुक्त । आराधनामें जो उचित ।
सिद्धि तक सब समस्त । करता रहता है ॥ ४५ ॥
जैसा है जिसका भाव । वैसा फल देता देव ।
मिलता वह सदैव । मेरे ही कारण ॥ ४६ ॥
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजोयान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥
अन्य देवताओं द्वारा पाये गये भोग नाशवंत होते हैं
किंतु भक्त वे मुझे नहीं जानते । कल्पनाके बाहर नहीं पड़ते
इसीलिये कल्पित फल हैं पाते । नाशवंत जो ॥ ४७ ॥
अजी ! ऐसा जो यह भजन । वह है संसारका ही साधन ।
यहां फल भोगका ही स्वप्न । दीखे क्षणभर ॥ ४८ ॥
फिर जो भाता है दैवत । जिसका यजन सतत ।
होता है वही जिसे प्राप्त । धनंजय ॥ ४९ ॥
यहां जिसके तनमन प्राण । करता सतत मेरा स्मरण ।
होता है जब उसका निर्वाण । पाता मद्रूप ॥ १५० ॥
उसी श्रद्धा-शक्तिसे तो पूजते उस रूपको ।
मांगे जो उससे भोग पाते मेरे विधानसे ॥ २२ ॥
नाशवंत फल पाते जन जो अल्प बुद्धिके ।
देवोंके भक्त देवोंको मेरे जो मुझसे मिले ॥ २३ ॥
२१५ ज्ञान-विज्ञानयोग