सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू एक राम ही टेक गहि, दूजा सहज सुभाइ ।
राम नाम छाडै नहीं, दूजा आवै जाइ ॥ 16 ॥
दादू राम अगाध है, परिमित नाहीं पार ।
अवर्ण वर्ण न जाणिये, दादू नाम अधार ॥ 17 ॥
दादू राम अगाध है, अविगत लखै न कोइ ।
निर्गुण सगुण का कहै, नाम विलम्ब न होइ ॥ 18 ॥
दादू राम अगाध है, बेहद लख्या न जाइ ।
आदि अंत नहि जाणिये, नाम निरन्तर गाइ ॥ 19 ॥
अद्वैत ब्रह्म
दादू राम अगाध है, अकल अगोचर एक।
दादू राम विलम्बिए, साधू कहैं अनेक ॥ 20 ॥
दादू एकै अलह राम है, समर्थ सांई सोइ ।
मैदे के पकवान सब, खातां होइ सु होइ ॥ 21 ॥
निर्गुण सगुण विवाद की निवृत्ति
सगुण निर्गुण ह्वै रहै, जैसा है तैसा लीन ।
हरि सुमिरण ल्यौ लाइए, का जाणों का कीन ॥ 22 ॥
नाम चित्त आवै सो लेय
दादू सिरजनहार के, केते नाम अनन्त ।
चित आवै सो लीजिये, यों साधु सुमरैं संत ॥ 23 ॥
दादू जिन प्राण पिण्ड हमकौ दिया, अंतर सेवैं ताहि ।
जे आवै ओसण सिर, सोई नांव संवाहि ॥ 24 ॥
चितावणी
दादू ऐसा कौण अभागिया, कछु दिढावै और ।
नाम बिना पग धरन को, कहो कहाँ है ठौर ॥ 25 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
सुमिरण नाम महिमा
दादू निमिष न न्यारा कीजिये, अंतर थैं उर नाम।
कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम ॥ 26 ॥
मन प्रबोध
दादू जे तैं अब जाण्या नहीं, राम नाम निज सार।
फिर पीछै पछिताहिगा, रे मन मूढ गँवार ॥ 27 ॥
दादू राम संभाल ले, जब लग सुखी सरीर।
फिरि पीछै पछिताहिगा, जब तन मन धरै न धीर ॥ 28 ॥
दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम।
सुख सागर चलि जाइए, दादू तज बेकाम ॥ 29 ॥
दादू दरिया यहु संसार है, तामें राम नाम निज नाव।
दादू ढील न कीजिये, यहु औसर यहु डाव ॥ 30 ॥
स्मरण नाम निःसंशय
मेरा संसा को नहीं, जीवण मरण का राम।
सुपिनैं ही जनि बीसरै, मुख हिरदै हरि नाम ॥ 31 ॥
स्मरण नाम विरह
दादू दुखिया तब लगै, जब लग नाम न लेहि।
तब ही पावन परम सुख, मेरी जीवनि येहि ॥ 32 ॥
स्मरण नाम पारख लक्षण
कछु न कहावे आप को, सांई को सेवे।
दादू दूजा छाड़ि सब, नाम निज लेवे ॥ 33 ॥
नाम स्मरण से जीवों के संशय की निवृत्ति
जे चित्त चहुँटै राम सौं, सुमिरण मन लागै।
दादू आत्मा जीव का, संसा सब भागै ॥ 34 ॥
स्मरण नाम चितावणी
दादू पीव का नाम ले, तो मिटै सिर साल।
घड़ी मुहूरत चालनां, कैसी आवै काल ॥ 35 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
स्मरण बिना सांस न ले
दादू औसर जीव तैं, कह्या न केवल राम ।
अंत काल हम कहेंगे, जम बैरी सौं काम ॥ 36 ॥
दादू ऐसे महँगे मोल का, एक सांस जे जाइ ।
चौदह लोक समान सो, काहे रेत मिलाइ ॥ 37 ॥
अमूल्य श्वास
सोई सांस सुजाण नर, सांईं सेती लाइ ।
कर साटा सिरजनहार सौं, महँगे मोल बिकाइ ॥ 38 ॥
व्यर्थ जीवन
जतन करै नहीं जीव का, तन मन पवना फेर।
दादू महँगे मोल का, द्वै दोवटी इक सेर ॥ 39 ॥
सफल जीवन
दादू रावत राजा राम का, कदे न बिसारै नांव ।
आत्मराम संभालिये, तो सुबस काया गांव ॥ 40 ॥
स्मरण चितावणी
दादू अहर्निशि सदा शरीर में, हरि चिंतत दिन जाइ ।
प्रेम मगनलै लीन मन, अन्तरगति ल्यौ लाइ ॥ 41 ॥
निमिष एक न्यारा नहीं, तन मन मंझि समाइ ।
एक अंगि लागा रहै, ताको काल न खाइ ॥ 42 ॥
दादू पिंजर पिंड शरीर का, सुवटा सहज समाइ ।
रमता सेती रमि रहै, विमल विमल जस गाइ ॥ 43 ॥
अविनाशी सौं एक ह्रै, निमिष न इत उत जाइ ।
बहुत बिलाई क्या करै, जे हरि हरि शब्द सुणाइ ॥ 44 ॥
दादू जहाँ रहूँ तहँ राम सौं, भावै कंदलि जाइ ।
भावै गिरि परवत रहूँ, भावै गृह बसाइ ॥ 45 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
मन परमोध
दादू राम कहे सब रहत है, नखसिख सकल सरीर।
राम कहे बिन जात है, समझि मनवां वीर ॥ 47 ॥
दादू राम कहै सब रहत है, लाहा मूल सहेत ।
राम कहे बिन जात है, मूरख मनवां चेत ॥ 48 ॥
दादू राम कहे सब रहत है, आदि अंति लौं सोइ।
राम कहे बिन जात है, यहु मन बहुरि न होइ ॥ 49 ॥
दादू राम कहे सब रहत है, जीव ब्रह्म की लार ।
राम कहे बिन जात है, रे मन हो होशियार ॥ 50 ॥
परमार्थी
हरि भज साफिल जीवना, पर उपकार समाइ।
दादू मरणा तहाँ भला, जहाँ पशु पंखी खाइ ॥ 51 ॥
स्मरण
दादू राम शब्द मुख ले रहै, पीछे लगा जाइ।
मनसा वाचा कर्मना, तिहि तत सहज समाइ ॥ 52 ॥
अब 'तिही तत्त' में समाने की विधि का वर्णन
दादू रचि मचि लागे नाम सौं, राते माते होइ।
देखेंगे दीदार को, सुख पावेंगे सोइ ॥ 53 ॥
चेतावनी
दादू सांई सेवैं सब भले, बुरा न कहिये कोइ ।
सारों मांही सो बुरा, जिस घटि नाम न होइ ॥ 54 ॥
ईश्वर विमुख प्राणी की दुर्गति
दादू जियरा राम बिन, दुखिया इहि संसार ।
उपजै विनसै खप मरै, सुख दुख बारम्बार ॥ 55 ॥
स्मरण नाम महिमा माहात्मय
राम नाम रुचि उपजै, लेवे हित चित लाइ।
दादू सोई जीयरा, काहे जमपुरि जाइ ॥ 56 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू नीकी बरियां आय कर, राम जप लीन्हां ।
आत्म साधन सोधि कर, कारज भल कीन्हां ।। 57 ।।
दादू अगम वस्तु पानैं पड़ी, राखि मंझि छिपाइ ।
छिन छिन सोई संभालिए, मत वै बीसर जाइ ।। 58 ।।
स्मरण नाम महिमा माहात्म्य
दादू उज्जवल निर्मला, हरि रंग राता होइ ।
काहे दादू पचि मरै, पानी सेती धोइ ।। 59 ।।
शरीर सरोवर राम जल, माहीं संजम सार ।
दादू सहजैं सब गए, मन के मैल विकार ।। 60 ।।
दादू रामनाम जलं कृत्वां, स्नानं सदा जितः।
तन मन आत्म निर्मलं, पंच-भू पापं गतः ।। 61 ।।
दादू उत्तम इन्द्री निग्रहं, मुच्यते माया मनः।
परम पुरुष पुरातनं, चिंतते सदा तन ।। 62 ।।
दादू सब जग विष भय्या, निर्विष बिरला कोइ ।
सोई निर्विष होइगा, जाके नाम निरंजन होइ ।। 63 ।।
दादू निर्विष नाम सौं, तन मन सहजैं होइ ।
राम निरोगा करेगा, दूजा नांही कोइ ।। 64 ।।
ब्रह्म भक्ति जब उपजै, तब माया भक्ति बिलाइ ।
दादू निर्मल मल गया, ज्यूँ रवि तिमिर नसाइ ।। 65 ।।
मनहर भाँवरि
दादू विषय विकार सौं, जब लग मन राता ।
तब लग चित्त न आवई, त्रिभुवनपति दाता ।। 66 ।।
विरह जिज्ञासा
दादू क्या जाणों कब होइगा, हरि सुमिरण इक तार ।
क्या जाणों कब छाड़ि है, यहु मन विषै विकार ।। 67 ।।
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
है सो सुमिरण होत नहीं, नहीं सो कीजै काम ।
दादू यहु तन यूँ गया, क्यूँ कर पड्ये राम ॥ 68 ॥
स्मरण नाम महिमा माहात्म्य
दादू राम नाम निज मोहनी, जिन मोहे करतार ।
सुर नर शंकर मुनि जना, ब्रह्मा सृष्टि विचार ॥ 69 ॥
दादू राम नाम निज औषधि, काटै कोटि विकार ।
विषम व्याधि थैं ऊबरै, काया कंचन सार ॥ 70 ॥
दादू निर्विकार निज नांव ले, जीवन इहै उपाय ।
दादू कृत्रिम काल है, ताके निकट न जाय ॥ 71 ॥
स्मरण
मन पवना गहि सुरति सौं, दादू पावै स्वाद ।
सुमिरण माहिं सुख घणा, छाड़ि देहु बकवाद ॥ 72 ॥
माया प्रपंच का त्याग
नाम सपीड़ा लीजिए, प्रेम भगति गुण गाइ ।
दादू सुमिरण प्रीति सौं, हेत सहित ल्यौ लाइ ॥ 73 ॥
लय लगाने की विधि
प्राण कवल मुख राम कहि, मन पवना मुख राम ।
दादू सुरति मुख राम कहि, ब्रह्म शून्य निज ठाम ॥ 74 ॥
दादू कहतां सुणातां राम कह, लेतां देतां राम ।
खातां पीतां राम कह, आत्म कवल विश्राम ॥ 75 ॥
ज्यूं जल पैसे दूध में, ज्यूं पाणी में लौण ।
ऐसे आत्माराम सौं, मन हठ साधै कौण ॥ 76 ॥
दादू राम नाम में पैस कर, राम नाम ल्यौ जाइ ।
यहु इंकत त्रिय लोक में, अनत काहे को जाइ ॥ 77 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
मध्य मार्ग
ना घर भला न वन भला, जहाँ नहीं निज नाँव।
दादू उनमनी मन रहै, भला तो सोई ठाँव ॥ 78 ॥
निर्गुण नाम महिमा महात्तम
दादू निर्गुणं नामं मई, हृदय भाव प्रवर्तितम्।
भ्रमं कर्म किल्विषं, माया मोहं कंपितम् ॥ 79 ॥
कालं जालं सोचितं, भयानक यम किंकरम्।
हर्षं मुदितं सदगुरुं, दादू अविगत दर्शनम् ॥ 80 ॥
भगवद् दर्शन का अनुपम माहात्म्य
दादू सब सुख स्वर्ग पयाल के, तोल तराजू बाहि।
हरि सुख एक पलक का, ता सम कह्या न जाहि ॥ 81 ॥
स्मरण नाम पारिख लक्षण
दादू राम नाम सब को कहै, कहिबे बहुत विवेक।
एक अनेकों फिर मिले, एक समाना एक ॥ 82 ॥
स्थूल रीति से राम-नाम स्मरण में भेद
दादू अपणी अपणी हद में, सब कोई लेवे नाउँ।
जे लागे बेहद सौं, तिन की मैं बलि जाउँ ॥ 83 ॥
स्मरण नाम अगाधता
कौण पटंतर दीजिये, दूजा नाहीं कोइ।
राम सरीखा राम है, सुमिऱ्यां ही सुख होइ ॥ 84 ॥
अपणी जाणै आप गति, और न जाणै कोइ।
सुमरि सुमरि रस पीजिये, दादू आनन्द होइ ॥ 85 ॥
करणी बिना कथणी
दादू सबही वेद पुराण पढ़ि, नेटि नाम निर्धार।
सब कुछ इन ही मांहि है, क्या करिये विस्तार ॥ 86 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
नाम अगाधता
पढ़ि पढ़ि थाके पंडिता, किनहुँ न पाया पार ।
कथि कथि थाके मुनिजना, दादू नाम आधार ॥ 87 ॥
निगम हि अगम विचारिये, तऊ पार न आवै ।
ताथैं सेवग क्या करै, सुमिरण ल्यौ लावै ॥ 88 ॥
कथनी बिना करणी
दादू अलिफ एक अल्लाह का, जे पढ़ि जाणै कोइ ।
कुरान कतेबां इल्म सब, पढकर पूरा होइ ॥ 89 ॥
दादू यहु तन पिंजरा, मांहीं मन सूवा ।
एक नाम अल्लाह का, पढ़ि हाफिज हूवा ॥ 90 ॥
स्मरण नाम पारख लक्षण
नाम लिया तब जानिए, जे तन मन रहै समाइ ।
आदि अंत मधि एक रस, कबहूँ भूल न जाइ ॥ 91 ॥
विरह पतिव्रत
दादू एकै दशा अनन्य की, दूजी दशा न जाइ ।
आपा भूलै आन सब, एकै रहै समाइ ॥ 92 ॥
दादू पीवै एक रस, बिसरि जाइ सब और ।
अविगत यहु गति कीजिये, मन राखो इहि ठौर ॥ 93 ॥
आत्म चेतन कीजिए, प्रेम रस पीवै ।
दादू भूलै देह गुण, ऐसैं जन जीवै ॥ 94 ॥
स्मरण नाम अगाधता
कहि कहि केते थाके दादू, सुणि सुणि कहु क्या लेइ ।
लौंण मिलै गलि पाणियां, ता सम चित यों देइ ॥ 95 ॥
दादू हरि रस पीवतां, रती विलम्ब न लाइ ।
बारम्बार संभालिये, मति वै बीसरि जाइ ॥ 96 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
स्मरण नाम विरह
दादू जगत सुपना है गया, चिंतामणि जब जाइ ।
तब ही साचा होत है, आदि अंत उर लाइ ॥ 97 ॥
नांव न आवै तब दुखी, आवै सुख संतोष ।
दादू सेवक राम का, दूजा हर्ष न शोक ॥ 98 ॥
मिले तो सब सुख पाइये, बिछुरे बहु दुःख होइ ।
दादू सुख दुःख राम का, दूजा नाहीं कोइ ॥ 99 ॥
दादू हरि का नाम जल, मैं मीन ता माहिं ।
संगि सदा आनन्द करै, बिछुरत ही मर जाहिं ॥ 100 ॥
दादू राम बिसार कर, जीवैं किहिं आधार ।
ज्यूं चातक जल बूँद को, करै पुकार पुकार ॥ 101 ॥
हम जीवैं इहि आसरे, सुमिरण के आधार ।
दादू छिटके हाथ थैं, तो हमको वार न पार ॥ 102 ॥
पतिव्रत निष्काम स्मरण
दादू नाम निमित रामहि भजै, भक्ति निमित भजि सोइ ।
सेवा निमित सांई भजै, सदा सजीवन होइ ॥ 103 ॥
नाम सम्पूर्णता
दादू राम रसाइन नित चवै, हरि है हीरा साथ ।
सो धन मेरे साइयां, अलख खजाना हाथ ॥ 104 ॥
हिरदै राम रहै जा जन के, ताको ऊरा कौण कहै ।
अठ सिधि, नौ निधि ताके आगे, सनमुख सदा रहै ॥ 105 ॥
वंदित तीनों लोक बापुरा, कैसे दर्श लहै ।
नाम निसान सकल जग ऊपर, दादू देखत है ॥ 106 ॥
दादू सब जग नीधना, धनवंता नहीं कोइ ।
सो धनवंता जाणिये, जाके राम पदार्थ होइ ॥ 107 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
संगहि लागा सब फिरै, राम नाम के साथ।
चिंतामणि हिरदै बसै, तो सकल पदार्थ हाथ ॥ 108 ॥
दादू आनन्द आत्मा, अविनाशी के साथ।
प्राणनाथ हिरदै बसै, तो सकल पदार्थ हाथ ॥ 109 ॥
पुरुष प्रकाशित
दादू भावै तहाँ छिपाइए, साच न छाना होइ।
शेष रसातल गगन धू, प्रगट कहिये सोइ ॥ 110 ॥
दादू कहाँ था नारद मुनिजना, कहाँ भक्त प्रहलाद।
परगट तीनों लोक में, सकल पुकारैं साध ॥ 111 ॥
दादू कहाँ शिव बैठा ध्यान धरै, कहाँ कबीरा नाम।
सो क्यों छाना होइगा, जेरु कहैगा राम ॥ 112 ॥
दादू कहाँ लीन शुकदेव था, कहाँ पीपा, रैदास।
दादू साचा क्यों छिपै, सकल लोक प्रकास ॥ 113 ॥
दादू कहाँ था, गोरख, भरथरी, अनंत सिधों का मंत।
परगट गोपीचन्द है, दत्त कहैं सब संत ॥ 114 ॥
अगम अगोचर राखिये, कर कर कोटि जतन।
दादू छाना क्यों रहै, जिस घट राम रतन ॥ 115 ॥
दादू स्वर्ग पयाल में, साचा लेवे नाम।
सकल लोक सिर देखिये, प्रकट सब ही ठाम ॥ 116 ॥
स्मरण लाम्बी रस
सुमिरण का शंसा रह्या, पछितावा मन मांहि।
दादू मीठा राम रस, सगला पिया नांहि ॥ 117 ॥
दादू जैसा नाम था, तैसा लीया नांहि।
हौंस रही यहु जीव में, पछितावा मन मांहि ॥ 118 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
स्मरण नाम चितावणी
दादू सिर करवत बहै, बिसरे आत्म राम।
मांहि कलेजा काटिये, जीव नहीं विश्राम ॥ 119 ॥
दादू सिर करवत बहै, राम हिरदै थैं जाइ।
माँहि कलेजा काटिये, काल दसों दिसी खाइ ॥ 120 ॥
दादू सिर करवत बहै, अंग परस नहीं होइ।
मांहि कलेजा काटिये, यहु बिथा न जाणै कोइ ॥ 121 ॥
दादू सिर करवत बहै, नैनहूँ निरखै नांहि।
मांहि कलेजा काटिये, साल रह्या मन मांहि ॥ 122 ॥
नाम चिंतन के फलाफल का विवेचन
जेता पाप सब जग करै, तैता नाम बिसारे होइ।
दादू राम संभालिये, तो येता डारे धोइ ॥ 123 ॥
दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही मोटी मार।
खंड खंड कर नाखिये, बीज पड़ै तिहिं बार ॥ 124 ॥
दादू जबही राम बिसारिये, तब ही झंपै काल।
सिर ऊपर करवत बहै, आइ पड़ै जम जाल ॥ 125 ॥
दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही कंध बिनाश।
पग पग परलै पिंड पडै, प्राणीजाइ निराश ॥ 126 ॥
दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही हाना होइ।
प्राण पिंड सर्वस गया, सुखी न देख्या कोइ ॥ 127 ॥
नाम सम्पूर्णता
साहिब जी के नांव में, बिरहा पीड़ पुकार।
ताला बेली रोवणा, दादू है दीदार ॥ 128 ॥
विरह जागृति स्मरण विधि
साहिब जी के नांव में, भाव भगति विश्वास।
लै समाधि लागा रहै, दादू सांई पास ॥ 129 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
साहिब जी के नांव में, मति बुधि ज्ञान विचार।
प्रेम प्रीति स्नेह सुख, दादू ज्योति अपार ॥ 130 ॥
साहिब जी के नांव में, सब कुछ भरे भंडार।
नूर तेज अनन्त है, दादू सिरजनहार ॥ 131 ॥
जिसमें सब कुछ सो लिया, निरंजन का नांउँ।
दादू हिरदै राखिए, मैं बलिहारी जाउँ ॥ 132 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
द्वितीयो स्मरण का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 2 ॥ साखी 132 ॥
दादूराम
राम
सत्यराम
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विरह का अंग
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अथ विरह का अंग-३
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
रतिवंती आरति करै, राम सनेही आव।
दादू औसर अब मिलै, यहु विरहनी का भाव ।। 2 ।।
विरहिनी की विरह दशा और उसका विलाप
पीव पुकारै विरहनी, निशदिन रहे उदास।
राम राम दादू कहै, ताला-बेली प्यास ।। 3 ।।
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श्री दादूवाणी-विरह का अंग 3
विरहीजनों की अनन्यता
मन चित चातक ज्यों रटै, पीव पीव लागी प्यास ।
दादू दर्शन कारणै, पुरवहु मेरी आस ॥ 4 ॥
दादू विरहनी दुख कासनि कहै, कासनि देइ संदेश ।
पंथ निहारत पीव का, विरहनी पलटे केश ॥ 5 ॥
दादू विरहनी दुख कासनि कहै, जानत है जगदीश ।
दादू निशदिन बिरही है, विरहा करवत शीश ॥ 6 ॥
शब्द तुम्हारा ऊजला, चिरिया क्यों कारी ?
तूँही, तूँही निशदिन करूँ, विरहा की जारी ॥ 7 ॥
विरह विलाप
विरहनी रोवै रात दिन, झूरै मन ही मांहिं ।
दादू औसर चल गया, प्रीतम पाये नाहिं ॥ 8 ॥
दादू विरहनी कुरलै कुंज ज्यूं, निशदिन तलफत जाइ ।
राम सनेही कारणै, रोवत रैन विहाइ ॥ 9 ॥
पासैं बैठा सब सुणै, हमकों जवाब न देइ ।
दादू तेरे सिर चढै, जीव हमारा लेइ ॥ 10 ॥
सबको सुखिया देखिये, दुखिया नाहीं कोइ ।
दुखिया दादू दास है, ऐन परस नहीं होइ ॥ 11 ॥
विरहीजनों के दुःख का कारण
साहिब मुख बोलै नहीं, सेवक फिरै उदास ।
यहु बेदन जिय में रहै, दुखिया दादू दास ॥ 12 ॥
पीव बिन पल पल जुग भया, कठिन दिवस क्यों जाइ ।
दादू दुखिया राम बिन, काल रूप सब खाइ ॥ 13 ॥
दादू इस संसार में, मुझसा दुखी न कोइ ।
पीव मिलन के कारणै, मैं जल भरिया रोइ ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
ना वह मिलै, न हम सुखी, कहो क्यों जीवन होइ।
जिन मुझको घायल किया, मेरी दारु सोइ ॥ 15 ॥
दर्शन कारण विरहनी, वैरागिन होवै।
दादू विरह बियोगिनी, हरि मारग जोवै ॥ 16 ॥
विरह उपदेश
अति गति आतुर मिलन को, जैसे जल बिन मीन।
सो देखे दीदार को, दादू आतम लीन ॥ 17 ॥
राम बिछोही विरहनी, फिरि मिलन न पावै।
दादू तलपै मीन ज्यूं, तुझ दया न आवै ॥ 18 ॥
दादू जब लग सुरति सिमिटै नहीं, मन निश्चल नहीं होहि।
तब लग पीव परसै नहीं, बड़ी विपति यहु मोहि ॥ 19 ॥
ज्यूं अमली के चित अमल है, सूरे के संग्राम।
निर्धन के चित धन बसै, यों दादू के राम ॥ 20 ॥
ज्यूं चातक के चित जल बसैं, ज्यूं पानी बिन मीन।
जैसे चंद चकोर है, ऐसे दादू हरि सौं कीन ॥ 21 ॥
ज्यूं कुंजर के मन वन बसै, अनल पंखी आकास।
यूं दादू का मन राम सौं, ज्यूं वैरागी वनखंड वास ॥ 22 ॥
भँवरा लुब्धी बास का, मोह्या नाद कुरंग।
यों दादू का मन राम सौं, ज्यों दीपक ज्योति पंतग ॥ 23 ॥
श्रवणा राते नाद सौं, नैनां राते रूप।
जिभ्या राती स्वाद सौं, त्यों दादू एक अनूप ॥ 24 ॥
विरह उपदेश
देह पियारी जीव को, निशदिन सेवा मांहि।
दादू जीवन मरण लौं, कबहूं छाड़ी नांहि ॥ 25 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
देह पियारी जीव को, जीव पियारा देह।
दादू हरि रस पाइये, जे ऐसा होइ स्नेह ॥ 26 ॥
प्रेमा भक्ति के बिना सब फीका है
दादू हरदम मांहि दिवान, सेज हमारी पीव है।
देखूँ सो सुबहान, ये इश्क हमारा जीव है ॥ 27 ॥
दादू हरदम मांहि दिवान, कहूँ दरूने दर्द सौं।
दर्द दरूने जाइ, जब देखूँ दीदार कों ॥ 28 ॥
विरह विनती
दादू दरूने दर्दबंद, यहु दिल दर्द न जाइ।
हम दुखिया दीदार के, महरबान दिखलाइ ॥ 29 ॥
मूये पीड़ पुकारतां, बैद न मिलिया आइ।
दादू थोड़ी बात थी, जे टुक दर्श दिखाइ ॥ 30 ॥
दादू मैं भिखारी मंगता, दर्शन देहु दयाल।
तुम दाता दुख भंजता, मेरी करहु संभाल ॥ 31 ॥
छिन बिछोह
क्या जीये में जीवना, बिन दर्शन बेहाल।
दादू सोई जीवना, प्रकट परसन लाल ॥ 32 ॥
इहि जग जीवन सो भला, जब लग हिरदै राम।
राम बिना जे जीवना, सो दादू बेकाम ॥ 33 ॥
विरह विनती
दादू कहु दीदार की, सांई सेती बात।
कब हरि दरशन देहुगे, यहु औसर चलि जात ॥ 34 ॥
बिथा तुम्हारे दर्श की, मोहि व्यापै दिन रात।
दुखी न कीजे दीन को, दर्शन दीजे तात ॥ 35 ॥
दादू इस हियड़े ये साल, पीव बिन क्योंहि न जाइसी।
जब देखूँ मेरा लाल, तब रोम रोम सुख आइसी ॥ 36 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
तूं है तैसा प्रकाश कर, अपना आप दिखाइ ।
दादू को दीदार दे, बलि जाऊँ विलंब न लाइ ॥ 37 ॥
दादू पिव जी देखै मुझ को, हौं भी देखूँ पीव ।
हौं देखूँ देखत मिलै, तो सुख पावै जीव ॥ 38 ॥
विरह कसौटी
दादू कहै, तन मन तुम पर वारणैं, कर दीजे कै बार ।
जे ऐसी विधि पाइये, तो लीजे सिरजनहार ॥ 39 ॥
विरह पतिव्रत
दीन दुनी सदके करूँ, टुक देखण दे दीदार ।
तन मन भी छिन छिन करूँ, भिस्त दोजग भी वार ॥ 40 ॥
दादू हम दुखिया दीदार के, तूं दिल थैं दूरि न होइ ।
भावै हमको जाल दे, होना है सो होइ ॥ 41 ॥
विरह पतिव्रत
दादू कहै, जे कुछ दिया हमको, सो सब तुम ही लेहु ।
तुम बिन मन मानै नहीं, दरस आपणां देहु ॥ 42 ॥
दूजा कुछ मांगै नहीं, हमको दे दीदार ।
तूं है तब लग एक टग, दादू के दिलदार ॥ 43 ॥
दादू कहै, तूं है तैसी भक्ति दे, तूं है तैसा प्रेम ।
तूं है तैसी सुरति दे, तूं है तैसा खेम ॥ 44 ॥
दादू कहै, सदिके करूँ शरीर को, बेर बेर बहु भंत ।
भाव भक्ति हित प्रेम ल्यौ, खरा पियारा कंत ॥ 45 ॥
दादू दर्शन की रली, हम को बहुत अपार ।
क्या जाणूं कबही मिले, मेरा प्राण आधार ॥ 46 ॥
दादू कारण कंत के, खरा दुखी बेहाल ।
मीरां मेरा महर कर, दे दर्शन दरहाल ॥ 47 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
ताला बेली प्यास बिन, क्यों रस पीया जाइ ।
विरहा दर्शन दर्द सौं, हमको देहु खुदाइ ॥ 48 ॥
ताला बेली पीड़ सौं, विरहा प्रेम पियास ।
दर्शन सेती दीजिये, बिलसै दादू दास ॥ 49 ॥
दादू कहै, हमको अपणां आप दे, इश्क मुहब्बत दर्द ।
सेज सुहाग सुख प्रेम रस, मिल खेलैं लापर्द ॥ 50 ॥
प्रेम भगति माता रहै, ताला बेली अंग ।
सदा सपीड़ा मन रहै, राम रमै उन संग ॥ 51 ॥
प्रेम मगन रस पाइये, भक्ति हेत रुचि भाव ।
विरह बेसास निज नाम सौं, देव दया कर आव ॥ 52 ॥
गई दशा सब बाहुड़ै, जे तुम प्रकटहु आइ ।
दादू ऊजड़ सब बसै, दर्शन देहु दिखाइ ॥ 53 ॥
हम कसिये क्या होइगा, बिड़द तुम्हारा जाइ ।
पीछै ही पछिताहुगे, ताथैं प्रकटहु आइ ॥ 54 ॥
छिन बिछोह
मीयां मैंडा आव घर, वांढी वंता लोइ ।
डुखंडे मुहिंडे गये, मरां विच्छौहे रोइ ॥ 55 ॥
विरह पतिव्रत
है, सो निधि नहिं पाइये, नहीं, सो है भरपूर ।
दादू मन मानै नहीं, ताथैं मरिये झूर ॥ 56 ॥
विरही विरह लक्षण
जिस घट इश्क अलाह का, तिस घट लोही न मांस ।
दादू जियरे जक नहीं, ससकै सांसैं सांस ॥ 57 ॥
रत्ती रब्ब ना बीसरै, मरै संभाल संभाल ।
दादू सुहदा थीर है,आसिक अल्लह नाल ॥ 58 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू आसिक रब्ब दा, सिर भी डेवै लाहि ।
अल्लह कारण आपको, साड़े अंदर भाहि ॥ 59 ॥
भोरे भोरे तन करै, वंडे करि कुरवाण ।
मिट्ठा कौड़ा ना लगै, दादू तो हूं साण ॥ 60 ॥
विरही विरह लक्षण
जब लग सीस न सौंपिये, जब लग इश्क न होइ ।
आशिक मरणैं ना डरै, पिया पियाला सोइ ॥ 61 ॥
विरह पतिव्रत
तैं डीनोंई सभु, जे डीये दीदार के।
उंजे लहदी अभु, पसाई दो पाण के॥ 62 ॥
बिचौं सभो दूरि कर, अंदर बिया न पाइ ।
दादू रत्ता हिकदा, मन मोहब्बत लाइ ॥ 63 ॥
विरह उपदेश
दादू इश्क मोहब्बत मस्त मन, तालिब दर दीदार ।
दोस्त दिल हरदम हजूर, यादगार हुसियार ॥ 64 ॥
विरह लक्षण
आशिक एक अल्लाह के, फारिक दुनियां दीन ।
तारिक इस औजूद थें, दादू पाक यकीन ॥ 65 ॥
विरह जिज्ञासु उपदेश
आसिकां रह कब्ज कर्दा, दिल वजां रफतांद ।
अल्लह आले नूर दीदम, दिल ही दादू बंद ॥ 66 ॥
दादू इश्क आवाज सौं, ऐसे कहै न कोइ ।
दर्द मोहब्बत पाइये, साहिब हासिल होइ ॥ 67 ॥
विरह विलाप
कहँ आशिक अल्लाह के, मारे अपने हाथ ।
कहँ आलम औजूद सौं, कहै जबां की बात ॥ 68 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू इश्क अल्लाह का, जे कबहुँ प्रकटै आइ ।
तो तन मन दिल अरवाह का, सब पड़दा जल जाइ ॥ 69 ॥
विरह जिज्ञासु उपदेश
अरवाहे सिजदा कुनंद, औजूद रा चे कार ।
दादू नूर दादनी, आशिकां दीदार ॥ 70 ॥
विरह ज्ञान अग्नि
विरह अग्नि तन जालिये, ज्ञान अग्नि दौं लाइ ।
दादू नखशिख परजलै, तब राम बुझावै आइ ॥ 71 ॥
विरह अग्नि में जालिबा, दरशन के तांईं ।
दादू आतुर रोइबा, दूजा कुछ नांहिं ॥ 72 ॥
विरह पतिव्रत
साहिब सौं कुछ बल नहीं, जनि हठ साधै कोइ ।
दादू पीड़ पुकारिये, रोतां होइ सो होइ ॥ 73 ॥
ज्ञान ध्यान सब छाड़ दे, जप तप साधन जोग ।
दादू विरहा ले रहै, छाड़ सकल रस भोग ॥ 74 ॥
जहाँ विरहा तहँ और क्या, सुधि, बुधि नाठे ज्ञान ।
लोक वेद मारग तजे, दादू एकै ध्यान ॥ 75 ॥
विरही विरह लक्षण
विरही जन जीवै नहीं, जे कोटि कहैं समझाइ ।
दादू गहिला ह्वै रहै, तलफि तलफि मर जाइ ॥ 76 ॥
दादू तलफै पीड़ सौं, बिरही जन तेरा ।
ससकै सांई कारणै, मिलि साहिब मेरा ॥ 77 ॥
पड़या पुकारै पीड़ सौं, दादू बिरही जन ।
राम सनेही चित बसै, और न भावै मन ॥ 78 ॥
जिस घट विरहा राम का, उस नींद न आवै ।
दादू तलफै विरहनी, उसे पीड़ जगावै ॥ 79 ॥
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