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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू आसिक रब्ब दा, सिर भी डेवै लाहि ।
अल्लह कारण आपको, साड़े अंदर भाहि ॥ 59 ॥
भोरे भोरे तन करै, वंडे करि कुरवाण ।
मिट्ठा कौड़ा ना लगै, दादू तो हूं साण ॥ 60 ॥
विरही विरह लक्षण
जब लग सीस न सौंपिये, जब लग इश्क न होइ ।
आशिक मरणैं ना डरै, पिया पियाला सोइ ॥ 61 ॥
विरह पतिव्रत
तैं डीनोंई सभु, जे डीये दीदार के।
उंजे लहदी अभु, पसाई दो पाण के॥ 62 ॥
बिचौं सभो दूरि कर, अंदर बिया न पाइ ।
दादू रत्ता हिकदा, मन मोहब्बत लाइ ॥ 63 ॥
विरह उपदेश
दादू इश्क मोहब्बत मस्त मन, तालिब दर दीदार ।
दोस्त दिल हरदम हजूर, यादगार हुसियार ॥ 64 ॥
विरह लक्षण
आशिक एक अल्लाह के, फारिक दुनियां दीन ।
तारिक इस औजूद थें, दादू पाक यकीन ॥ 65 ॥
विरह जिज्ञासु उपदेश
आसिकां रह कब्ज कर्दा, दिल वजां रफतांद ।
अल्लह आले नूर दीदम, दिल ही दादू बंद ॥ 66 ॥
दादू इश्क आवाज सौं, ऐसे कहै न कोइ ।
दर्द मोहब्बत पाइये, साहिब हासिल होइ ॥ 67 ॥
विरह विलाप
कहँ आशिक अल्लाह के, मारे अपने हाथ ।
कहँ आलम औजूद सौं, कहै जबां की बात ॥ 68 ॥

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