सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू इश्क अल्लाह का, जे कबहुँ प्रकटै आइ ।
तो तन मन दिल अरवाह का, सब पड़दा जल जाइ ॥ 69 ॥
विरह जिज्ञासु उपदेश
अरवाहे सिजदा कुनंद, औजूद रा चे कार ।
दादू नूर दादनी, आशिकां दीदार ॥ 70 ॥
विरह ज्ञान अग्नि
विरह अग्नि तन जालिये, ज्ञान अग्नि दौं लाइ ।
दादू नखशिख परजलै, तब राम बुझावै आइ ॥ 71 ॥
विरह अग्नि में जालिबा, दरशन के तांईं ।
दादू आतुर रोइबा, दूजा कुछ नांहिं ॥ 72 ॥
विरह पतिव्रत
साहिब सौं कुछ बल नहीं, जनि हठ साधै कोइ ।
दादू पीड़ पुकारिये, रोतां होइ सो होइ ॥ 73 ॥
ज्ञान ध्यान सब छाड़ दे, जप तप साधन जोग ।
दादू विरहा ले रहै, छाड़ सकल रस भोग ॥ 74 ॥
जहाँ विरहा तहँ और क्या, सुधि, बुधि नाठे ज्ञान ।
लोक वेद मारग तजे, दादू एकै ध्यान ॥ 75 ॥
विरही विरह लक्षण
विरही जन जीवै नहीं, जे कोटि कहैं समझाइ ।
दादू गहिला ह्वै रहै, तलफि तलफि मर जाइ ॥ 76 ॥
दादू तलफै पीड़ सौं, बिरही जन तेरा ।
ससकै सांई कारणै, मिलि साहिब मेरा ॥ 77 ॥
पड़या पुकारै पीड़ सौं, दादू बिरही जन ।
राम सनेही चित बसै, और न भावै मन ॥ 78 ॥
जिस घट विरहा राम का, उस नींद न आवै ।
दादू तलफै विरहनी, उसे पीड़ जगावै ॥ 79 ॥
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