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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 504 में से

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पृष्ठ 57

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
ना वह मिलै, न हम सुखी, कहो क्यों जीवन होइ।
जिन मुझको घायल किया, मेरी दारु सोइ ॥ 15 ॥
दर्शन कारण विरहनी, वैरागिन होवै।
दादू विरह बियोगिनी, हरि मारग जोवै ॥ 16 ॥
विरह उपदेश
अति गति आतुर मिलन को, जैसे जल बिन मीन।
सो देखे दीदार को, दादू आतम लीन ॥ 17 ॥
राम बिछोही विरहनी, फिरि मिलन न पावै।
दादू तलपै मीन ज्यूं, तुझ दया न आवै ॥ 18 ॥
दादू जब लग सुरति सिमिटै नहीं, मन निश्चल नहीं होहि।
तब लग पीव परसै नहीं, बड़ी विपति यहु मोहि ॥ 19 ॥
ज्यूं अमली के चित अमल है, सूरे के संग्राम।
निर्धन के चित धन बसै, यों दादू के राम ॥ 20 ॥
ज्यूं चातक के चित जल बसैं, ज्यूं पानी बिन मीन।
जैसे चंद चकोर है, ऐसे दादू हरि सौं कीन ॥ 21 ॥
ज्यूं कुंजर के मन वन बसै, अनल पंखी आकास।
यूं दादू का मन राम सौं, ज्यूं वैरागी वनखंड वास ॥ 22 ॥
भँवरा लुब्धी बास का, मोह्या नाद कुरंग।
यों दादू का मन राम सौं, ज्यों दीपक ज्योति पंतग ॥ 23 ॥
श्रवणा राते नाद सौं, नैनां राते रूप।
जिभ्या राती स्वाद सौं, त्यों दादू एक अनूप ॥ 24 ॥
विरह उपदेश
देह पियारी जीव को, निशदिन सेवा मांहि।
दादू जीवन मरण लौं, कबहूं छाड़ी नांहि ॥ 25 ॥

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