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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

अथ राग रामकली ४
(गायन समय प्रभात 3 से 6 )
167. सद्गुरु शब्द महिमा । दादरा
शब्द समाना जो रहै, गुरु बाइक बीधा ।
उनही लागा एक सौं, सोई जन सीधा ॥ टेक ॥
ऐसी लागी मर्म की, तन मन सब भूला ।
जीवत-मृतक है रहै, गह आत्म मूला ॥ 1 ॥
चेतन चितहि न बीसरे, महारस मीठा ।
शब्द निरंजन गह रह्या, उन साहिब दीठा ॥ 2 ॥
एक शब्द जन ऊधरे, सुनि सहजैं जागे ।
अंतर राते एक सौं, सर सन्मुख लागे ॥ 3 ॥
शब्द समाना सन्मुख रहै, पर आतम आगे ।
दादू सीझै देखतां, अविनाशी लागे ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
168. नाम महिमा । त्रिताल
अहो नर नीका है हरि नाम ।
दूजा नहीं राम बिन नीका, कहले केवल राम ॥ टेक ॥
निर्मल सदा एक अविनाशी, अजर अकल रस ऐसा ।
दिढ़ गहि राख मूल मन मांहीं, निरख देख निज कैसा ॥ 1 ॥
यहु रस मीठा महा अमीरस, अमर अनूपम पीवे ।
राता रहै प्रेम सौं माता, ऐसे जुग-जुग जीवे ॥ 2 ॥
दूजा नहीं और को ऐसा, गुरु अंजन कर सूझे ।
दादू मोटे भाग हमारे, दास विवेकी बूझे ॥ 3 ॥
169. अत्यन्त विरह । त्रिताल
कब आवेगा कब आवेगा ?
पीव प्रकट आप दिखावेगा, मिठड़ा मुझको भावेगा ॥ टेक ॥
कंठड़े लाग रहूँ रे, नैनों में बाहि धरूं रे, पीव तुझ बिन झूर मरूं रे ॥ 1 ॥
पावों मस्तक मेरा रे, तन मन पीवजी तेरा रे, हौं राखूं नैनहुं नेरा रे ॥ 2 ॥
हियड़े हेत लगाऊँ रे, अब कै जे पीव पाऊँ रे, तो बेर बेर बलि जाऊँ रे ॥ 3 ॥
सेजड़िये पीव आवे रे, तब आनन्द अंग न मावे रे, दादू दरस दिखावे रे ॥ 4 ॥
170. (सिन्धी भाषा) । मल्लिका मोद ताल
पिरी तूं पाण पसाइड़े, मूं तनि लागी भाहिड़े ॥ टेक ॥
पांधी वींदो निकरीला, असां साण गल्हाइड़े ।
सांई सिकां सड़केला, गुझी गालि सुनाइड़े ॥ 1 ॥
पसां पाक दीदार केला, सिक असां जी लाहिड़े ।
दादू मंझि कलूब मेला, तोड़े बीयां न काइड़े ॥ 2 ॥
171. (सिन्धी भाषा) । मल्लिका मोद ताल
को मेड़ीदो सज्जणा,

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सुहारी सुरति केला, लगे डीहु घणां ॥ टेक॥
पीरीयां संदी गाल्हड़ीला, पांधीड़ा पूछं ।
कड़ी ईंदो मूं गरेला, डीडों बांह असां ॥ 1 ॥
आहे सिक दीदार जीला, पिरी पूर पसां ।
इयें दादू जे ज्यंद येला, सजण सांण रहां ॥ 2 ॥
172. विनती पंजाबी । त्रिताल
हरि हाँ दिखाओ नैना,
सुन्दर मूरति मोहना, बोलि सुनाओ बैना ॥ टेक॥
प्रकट पुरातन खंडना, महीमान सुख मंडना ॥ 1 ॥
अविनाशी अपरम्परा, दीनदयाल गगन धरा ॥ 2 ॥
पारब्रह्म परिपूरणां, दर्श देहु दुख दूरणां ॥ 3 ॥
कर कृपा करुणामई, तब दादू देखे तुम दई ॥ 4 ॥
173. निस्पृहता पंजाबी । त्रिताल
राम सुख सेवक जानै रे, दूजा दुख कर माने रे ॥ टेक॥
और अग्नि की झाला, फंद रोपे हैं जम जाला ।
सम काल कठिन शर पेखें, यह सिंह रूप सब देखें ॥ 1 ॥
विष सागर लहर तरंगा, यहु ऐसा कूप भुवंगा ।
भयभीत भयानक भारी, रिपु करवत मीच विचारी ॥ 2 ॥
यहु ऐसा रूप छलावा, ठग पासीहारा आवा ।
सब ऐसा देख विचारे, ये प्राण घात बटपारे ॥ 3 ॥
ऐसा जन सेवक सोई, मन और न भावै कोई ।
हरि प्रेम मगन रंग राता, दादू राम रमै रस माता ॥ 4 ॥
174. साधु महिमा । जय मंगल ताल
आप निरंजन यों कहै, कीरति करतार ।

श्री दादूवाणी-राग रामकली 8

मैं जन सेवक द्वै नहीं, एकै अंग सार ॥ टेक ॥
मम कारण सब परिहरै, आपा अभिमान ।
सदा अखंडित उर धरै, बोले भगवान ॥ 1 ॥
अन्तर पट जीवै नहीं, तब ही मर जाइ ।
बिछुरे तलफै मीन ज्यूं, जीवै जल आइ ॥ 2 ॥
क्षीर नीर ज्यूं मिल रहै, जल जलहि समान ।
आतम पाणी लौण ज्यों, दूजा नांही आन ॥ 3 ॥
मैं जन सेवक द्वै नहीं, मेरा विश्राम ।
मेरा जन मुझ सारिखा, दादू कहै राम ॥ 4 ॥
175. परिचय विनती । जय मंगल ताल
शरण तुम्हारी केशवा, मैं अनन्त सुख पाया ।
भाग बड़े तूं भेटिया, हौं चरणौं आया ॥ टेक ॥
मेरी तप्त मिटी तुम्ह देखतां, शीतल भयो भारी ।
भव बंधन मुक्ता भया, जब मिल्या मुरारी ॥ 1 ॥
भरम भेद सब भूलिया, चेतन चित लाया ।
पारस सौं परचा भया, उन सहज लखाया ॥ 2 ॥
मेरा चंचल चित निश्चल भया, अब अनत न जाई ।
मगन भया सर बेधिया, रस पीया अघाई ॥ 3 ॥
सन्मुख ह्वै तैं सुख दिया, यहु दया तुम्हारी ।
दादू दरसन पावई, पीव प्राण अधारी ॥ 4 ॥
176. परस्पर गोष्टी परिचय विनती । तिलवाड़ा ताल
गोविन्द राखो अपणी ओट ।
काम क्रोध भये बटपारे, तकि मारैं उर चोट ॥ टेक ॥
बैरी पंच सबल संग मेरे, मारग रोक रहे ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
काल अहेडी बधिक है लागे, ज्यूं जीव बाज गहे ॥ 1 ॥
ग्यान ध्यान हिरदै हरि लीना, संग ही घेर रहे।
समझि न परई बाप रमैया, तुम्ह बिन शूल सहे ॥ 2 ॥
शरण तुम्हारी राखो गोविन्द, इन सौं संग न दीजे।
इनके संग बहुत दुख पाया, दादू को गहि लीजे ॥ 3 ॥
177. भयमान विनती । रंगताल
राम कृपा कर होहु दयाला, दर्शन देहु करहु प्रतिपाला ॥ टेक ॥
बालक दूध न देइ माता, तो वह क्यों कर जीवै विधाता ॥ 1 ॥
गुण औगुण हरि कुछ न विचारै, अंतर हेत प्रीति कर पालै ॥ 2 ॥
अपणो जान करै प्रतिपाला, नैन निकट उर धरै गोपाला ॥ 3 ॥
दादू कहै नहीं वश मेरा, तूं माता मैं बालक तेरा ॥ 4 ॥
178 (गुजराती) विनती । त्रिताल
भक्ति मांगूं बाप भक्ति मांगूं, मूने ताहरा नांऊं नों प्रेम लाग्यो।
शिवपुर ब्रह्मपुर सर्व सौं कीजिये, अमर थावा नहींलोक मांगूं ॥ टेक ॥
आप अवलंबन ताहरा अंगनों, भक्ति संजीवनी रंग राचूं।
देहनें गेहनौं बास बैकुंठ तणौं, इन्द्र आसण नहीं मुक्ति जाचूं ॥ 1 ॥
भक्ति वाहली खरी आप अविचल हरि, निर्मलो नाउं रस पान भावे।
सिद्धि नें रिद्धि नें राज रूड़ो नहीं, देव पद माहरे काज न आवे ॥ 2 ॥
आत्मा अंतर सदा निरंतर, ताहरी बापजी भक्ति दीजे।
कहै दादू हिवे कौड़ी दत आपे, तुम्ह बिना ते म्हें नहीं लीजे ॥ 3 ॥
179. (गुजराती) राज विद्याधर ताल
एह्वो एक तूँ राम जी नाम रूड़ो।
ताहरा नाम बिना बीजो सबै ही कूड़ो ॥ टेक ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
तुम्ह बिन अवर कोई कलि मां नहीं, सुमरतां संत नें साद आपे ।
कर्म कीधा कोटि छोड़वे बाँधो, नाम लेतां ख्रिणत ही ये कापे ॥ 1 ॥
संत नें सांकड़ो दुष्ट पीड़ा करे, वाहरे वाहलो वेगि आवे ।
पापनां पुंज पह्वां करी लीधो, भाजिया भै भर्म जोनि न आवे ॥ 2 ॥
साधनें दुहेलो तहाँ तूँ आकुलो, माहरो माहरो करीनें धाए ।
दुष्ट नें मारिबा संत नें तारिबा, प्रकट थावा तहाँ आप जाए ॥ 3 ॥
नाम लेतां ख्रिण नाथ तें एकले, कोटिनां कर्मनां छेद कीधा ।
कहै दादू हिवें तुम्ह बिना को नहीं, साखी बोलें जे शरण लीधा ॥ 4 ॥
180. परिचय विनती राज । विद्याधर ताल
हरि नाम देहु निरंजन तेरा, हरि हर्ष जपै जिय मेरा ॥ टेक ॥
भाव भक्ति हेत हरि दीजे, प्रेम उमंग मन आवे ।
कोमल वचन दीनता दीजे, राम रसायन भावे ॥ 1 ॥
विरह बैराग्य प्रीति मोहि दीजे, हृदय सांच सत भाखूं ।
चित चरणों चिंतामणि दीजे, अंतर दिढ़ कर राखूं ॥ 2 ॥
सहज संतोष सील सब दीजे, मन निश्चल तुम्ह लागे ।
चेतन चिंतन सदा निवासी, संग तुम्हारे जागे ॥ 3 ॥
ज्ञान ध्यान मोहन मोहि दीजे, सुरति सदा सँग तेरे ।
दीन दयाल दादू को दीजे, परम ज्योति घट मेरे ॥ 4 ॥
181. आशीर्वाद मंगल । झपताल
जय जय जय जगदीश तूँ, तूँ समर्थ सांई ।
सकल भुवन भानैं घड़ै, दूजा को नांहीं ॥ टेक ॥
काल मीच करुणा करै, जम किंकर माया ।
महा जोध बलवंत बली, भय कंपै राया ॥ 1 ॥
जरा मरण तुम तैं डरै, मन को भय भारी ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
काम दलन करुणामयी, तूँ देव मुरारी ॥ 2 ॥
सब कंपैं करतार तैं, भव-बंधन पाशा।
अरि रिपु भंजन भय गता, सब विघ्न विनाशा ॥ 3 ॥
सिर ऊपर सांई खड़ा, सोई हम माहीं।
दादू सेवक राम का निर्भय, न डराहीं ॥ 4 ॥
182. हितोपदेश । त्रिताल
हरि के चरण पकर मन मेरा, यहु अविनाशी घर तेरा ॥ टेक ॥
जब चरण कमल रज पावै, तब काल व्याल बौरावै।
तब त्रिविध ताप तन नाशौ, तब सुख की राशि विलासै ॥ 1 ॥
जब चरण क मल चित लागै, तब माथै मीच न जागै।
तब जनम जरा सब क्षीना, तब पद पावन उर लीना ॥ 2 ॥
जब चरण कमल रस पीवै, तब माया न व्यापै जीवै।
तब भरम करम भय भाजै, तब तीनों लोक विराजै ॥ 3 ॥
जब चरण कमल रुचि तेरी, तब चार पदारथ चेरी।
तब दादू और न बांछै, जब मन लागै सांचै ॥ 4 ॥
183. संत उपदेश । राज मृगांक ताल
संतों ! और कहो क्या कहिये ।
हम तुम्ह सीख इहै सतगुरु की, निकट राम के रहिये ॥ टेक ॥
हम तुम मांहि बसै सो स्वामी, सांचे सौं सचु लहिये।
दर्शन परसन जुग जुग कीजे, काहे को दुख सहिये ॥ 1 ॥
हम तुम संग निकट रहैं नेरे, हरि केवल कर गहिये।
चरण कमल छाड़ि कर ऐसे, अनत काहे को बहिये ॥ 2 ॥
हम तुम तारन तेज घन सुन्दर, नीके सौं निरबहिये।
दादू देख और दुख सब ही, तामें तन क्यों दहिये ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
184. मन प्रति उपदेश । राज मृगांक ताल
मन रे, बहुरि न ऐसे होई ।
पीछे फिर पछतावेगा रे, नींद भरे जनि सोई ॥ टेक ॥
आगम सारे संचु करीले, तो सुख होवै तोही ।
प्रीति करि पीव पाइये, चरणों राखो मोही ॥ 1 ॥
संसार सागर विषम अति भारी, जनि राखै मन मोही ।
दादू रे जन राम नाम सौं, कश्मल देही धोई ॥ 2 ॥
185. काल चेतावनी । भंगताल
साथी ! सावधान है रहिये ।
पलक मांहि परमेश्वर जाणै, कहा होइ कहा कहिये ॥ टेक ॥
बाबा, बाट घाट कुछ समझ न आवै, दूर गवन हम जाना ।
परदेशी पंथी चलै अकेला, औघट घाट पयाना ॥ 1 ॥
बाबा, संग न साथी कोई नहीं तेरा, यहु सब हाट पसारा ।
तरवर पंखी सबै सिधाये, तेरा कौण गँवारा ॥ 2 ॥
बाबा, सबै बटाऊ पंथ सिरानैं, सुस्थिर नांहीं कोई ।
अंति काल को आगे पीछे, बिछुरत बार न होई ॥ 3 ॥
बाबा, काची काया कौण भरोसा, रैन गई क्या सोवे ।
दादू संबल सुकृत लीजे, सावधान किन होवे ॥ 4 ॥
186. (गुजराती) तर्क चेतावनी । शूलताल
मेरा मेरा काहे को कीजे रे, जे कुछ संग न आवे ।
अनत करी नें धन धरीला रे, तेंऊ तो रीता जावे ॥ टेक ॥
माया बंधन अंध न चेते रे, मेर मांहिं लपटाया ।
ते जाणै हूँ यह बिलासौं, अनत विरोधे खाया ॥ 1 ॥
आप स्वारथ यह विलूधा रे, आगम मरम न जाणे ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
जम कर माथे बाण धरीला, ते तो मन ना आणे ॥ 2 ॥
मन विचारि सारी ते लीजे, तिल मांहीं तन पड़िबा।
दादू रे तहँ तन ताड़ीजे, जेणें मारग चढ़िबा ॥ 3 ॥
187. हितोपदेश । शूलताल
सन्मुख भइला रे, तब दुख गइला रे, ते मेरे प्राण अधारी।
निराकार निरंजन देवा रे, लेवा तेह विचारी ॥ टेक ॥
अपरम्पार परम निज सोई, अलख तोर विस्तारं।
अंकुर बीजे सहज समाना रे, ऐसा समर्थ सारं ॥ 1 ॥
जे तैं किन्हा किन्हि इक चीन्हा रे, भइला ते परिमाणं।
अविगत तोरी विगति न जाणूं, मैं मूरख अयानं ॥ 2 ॥
सहजें तोरा ए मन मोरा, साधन सौं रंग आई।
दादू तोरी गति नहिं जानैं, निर्बाहो कर लाई ॥ 3 ॥
188. मन प्रति सूरतन । त्रिताल
हरि मारग मस्तक दीजिये, तब निकट परम पद लीजिये ॥ टेक ॥
इस मारग मांहीं मरणा, तिल पीछे पाँव न धरणा।
अब आगे होई सो होई, पीछे सोच न करणा कोई ॥ 1 ॥
ज्यों शूरा रण झूझै, तब आपा पर नहिं बूझै।
सिर साहिब काज संवारै, घण घावां आपा डारै ॥ 2 ॥
सती सत गहि साचा बोलै, मन निश्चल कदे न डोलै।
वाके सोच पोच जिय ना आवै, जग देखत आप जलावै ॥ 3 ॥
इस सिर सौं साटा कीजे, तब अविनाशी पद लीजे।
ताका सब सिर साबित होवे, जब दादू आपा खोवे ॥ 4 ॥
189. कलियुगी । त्रिताल

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
झूठा कलियुग कह्या न जाइ, अमृत को विष कहै बनाइ ॥ टेक ॥
धन को निर्धन, निर्धन को धन, नीति अनीति पुकारै ।
निर्मल मैला, मैला निर्मल, साध चोर कर मारै ॥ 1 ॥
कंचन काच, काच को कंचन, हीरा कंकर भाखै ।
माणिक मणियाँ, मणियाँ माणिक, साँच झूठ कर नाखै ॥ 2 ॥
पारस पत्थर, पत्थर पारस, कामधेनु पशु गावै ।
चन्दन काठ, काठ को चन्दन, ऐसी बहुत बनावै ॥ 3 ॥
रस को अणरस, अणरस को रस, मीठा खारा होई ।
दादू कलिजुग ऐसा बरतै, साचा बिरला कोई ॥ 4 ॥
190. भगवंत भरोसा । ललित ताल
दादू मोहि भरोसा मोटा,
तारण तिरण सोई संग मेरे, कहा करै कलि खोटा ॥ टेक ॥
दौं लागी दरिया तै न्यारी, दरिया मंझ न जाई ।
मच्छ कच्छ रहैं जल जेते, तिन को काल न खाई ॥ 1 ॥
जब सूवै पिंजर घर पाया, बाज रह्या वन मांहीं ।
जिनका समर्थ राखणहारा, तिनको को डर नांहीं ॥ 2 ॥
साचे झूठ न पूजै कबहुँ, सत्य न लागै काई ।
दादू साचा सहज समाना, फिर वै झूठ विलाई ॥ 3 ॥
191. सांच झूठ निर्णय प्रतिपाल
सांई को साच पियारा ।
साचै साच सुहावै देखो, साचा सिरजनहारा ॥ टेक ॥
ज्यों घण घावां सार घड़ीजे, झूठ सबै झड़ जाई ।
घण के घाऊँ सार रहेगा, झूठ न मांहि समाई ॥ 1 ॥
कनक कसौटी अग्नि-मुख दीजे, पंक सबै जल जाई ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
यों तो कसणी सांच सहेगा, झूठ सहै नहिं भाई ॥ 2 ॥
ज्यों घृत को ले ताता कीजे, ताइ ताइ तत्त कीन्हा।
तत्तैं तत्त रहेगा भाई, झूठ सबै जल खीना ॥ 3 ॥
यों तो कसणी साच सहेगा, साचा कस कस लेवै ।
दादू दर्शन सांचा पावै, झूठे दरस न देवै ॥ 4 ॥
192. करणी बिना कथनी । प्रतिपाल
बातैं बाद जाहिंगी भइये, तुम जनि जानों बातनि पइये ॥ टेक ॥
जब लग अपना आप न जानै, तब लग कथनी काची ।
आपा जान सांई को जानै, तब कथनी सब साची ॥ 1 ॥
करनी बिना कंत नहीं पावै, कहे सुने का होई ।
जैसी कहै करै जे तैसी, पावैगा जन सोई ॥ 2 ॥
बातनि हीं जे निर्मल होवे, तो काहे को कस लीजे ।
सोना अग्नि दहै दस बारा, तब यहु प्रान पतीजे ॥ 3 ॥
यौं हम जाना मन पतियाना, करनी कठिन अपारा।
दादू तन का आपा जारे, तो तिरत न लागे बारा ॥ 4 ॥
193. उपदेश । पंजाबी-त्रिताल
पंडित, राम मिलै सो कीजे ।
पढ़ पढ़ वेद पुराण बखानैं, सोई तत्त्व कह दीजे ॥ टेक॥
आतम रोगी विषम बियाधी, सोई कर औषधि सारा।
परसत प्राणी होइ परम सुख, छूटै सब संसारा ॥ 1 ॥
ए गुण इन्द्री अग्नि अपारा, ता सन जलै शरीरा।
तन मन शीतल होइ सदा सुख, सो जल नहाओ नीरा ॥ 2 ॥
सोई मार्ग हमहिं बताओ, जेहि पंथ पहुँचे पारा।
भूलि न परै उलट नहीं आवै, सो कुछ करहु विचारा ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
गुरु उपदेश देहु कर दीपक, तिमिर मिटे सब सूझे।
दादू सोई पंडित ज्ञाता, राम मिलन की बूझे ॥ 4 ॥
194. उपदेश । प्रतिताल
हरि राम बिना सब भर्मि गये, कोई जन तेरा साच गहै ॥ टेक ॥
पीवै नीर तृषा तन भाजै, ज्ञान गुरु बिन कोइ न लहै।
प्रकट पूरा समझ न आवै, तातैं सो जन दूर रहै ॥ 1 ॥
हर्ष शोक दोउ सम कर राखै, एक एक के संग न बहै।
अनतहि जाइ तहाँदुख पावै, आपहि आपा आप दहै ॥ 2 ॥
आपा पर भरम सब छाड़ै, तोनि लोक पर ताहि धरै।
सो जन सही साच कौं परसे, अमर मिले नहिं कबहूँ मरै ॥ 3 ॥
पारब्रह्म सूं प्रीति निरन्तर, राम रसायन भर पीवै।
सदा आनन्द सुखी साचे सौं, कहै दादू सो जन जीवै ॥ 4 ॥
195. भ्रम विध्वंसण । प्रतिताल
जग अंधा नैन न सूझै, जिन सिरजे, ताहि न बूझै ॥ टेक ॥
पाहण की पूजा करै, करै आतम घाता।
निर्मल नैन न आवई, दोजख दिशि जाता ॥ 1 ॥
पूजै देव दिहाड़ियां, महा-माई मानैं।
प्रकट देव निरंजना, ताकी सेव न जानैं ॥ 2 ॥
भैरुं भूत सब भ्रम के, पशु प्राणी ध्यावैं।
सिरजनहारा सबन का, ताको नहिं पावैं ॥ 3 ॥
आप स्वारथ मेदनी, का का नहिं करही ।
दादू सांचे राम बिन, मर मर दुख भरही ॥ 4 ॥
196. अन्य उपासक विस्मयवादी भ्रम । रंग ताल

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
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साचा राम न जाणै रे, सब झूठ बखाणै रे ॥ टेक ॥
झूठे देवा झूठी सेवा, झूठा करे पसारा।
झूठी पूजा झूठी पाती, झूठा पूजणहारा ॥ 1 ॥
झूठा पाक करै रे प्राणी, झूठा भोग लगावै।
झूठा आड़ा पड़दा देवै, झूठा थाल बजावै ॥ 2 ॥
झूठे वक्ता झूठे श्रोता, झूठी कथा सुणावै।
झूठा कलियुग सब को मानै, झूठा भ्रम दिढ़ावै ॥ 3 ॥
स्थावर जंगम जल थल महियल, घट घट तेज समाना।
दादू आतम राम हमारा, आदि पुरुष पहिचाना ॥ 4 ॥

  1. निज मार्ग निर्णय । चौताल
    मैं पंथी एक अपार का, मन और न भावै।
    सोई पंथ पावै पीव का, जिसे आप लखावै ॥ टेक ॥
    को पंथी हिंदू तुरक के, को काहू राता।
    को पंथी सोफी सेवड़े, को सन्यासी माता ॥ 1 ॥
    को पंथी जोगी जंगमा, को शक्ति पंथ ध्यावै।
    को पंथी कमड़े कापड़ी, को बहुत मनावै ॥ 2 ॥
    को पंथी काहू के चलै, मैं और न जानूं।
    दादू जिन जग सिरजिया, ताही को मानूं ॥ 3 ॥

  2. साधु मिलाप मंगल । चौताल
    आज हमारे रामजी साधु घर आये,
    मंगलाचार चहुँ दिशि भये, आनन्द बधाये ॥ टेक ॥
    चौक पुराऊँ मोतियां, घिस चंदन लाऊँ।
    पंच पदारथ पोइ के , यहु माल चढ़ाऊँ ॥ 1 ॥
    तन मन धन करूँ वारनैं, प्रदक्षिणा दीजे।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8

शीश हमारा जीव ले, नौछावर कीजे ॥ 2 ॥
भाव भक्ति कर प्रीति सौं, प्रेम रस पीजे ।
सेवा वंदन आरती, यहु लाहा लीजे ॥ 3 ॥
भाग हमारा हे सखी, सुख सागर पाया ।
दादू को दर्शन भया, मिले त्रिभुवन राया ॥ 4 ॥
199. संत समागम प्रार्थना । दादरा
निरंजन नाम के रस माते, कोई पूरे प्राणी राते ॥ टेक ॥
सदा सनेही राम के, सोई जन साचे ।
तुम बिन और न जानहीं, रंग तेरे ही राचे ॥ 1 ॥
आन न भावै एक तूं, सति साधु सोई ।
प्रेम पियासे पीव के, ऐसा जन कोई ॥ 2 ॥
तुम हीं जीवन उर रहे, आनन्द अनुरागी ।
प्रेम मगन पीव प्रितड़ी, लै तुम सौं लागी ॥ 3 ॥
जे जन तेरे रंग रंगे, दूजा रंग नांही ।
जन्म सुफल कर लीजिये, दादू उन मांहीं ॥ 4 ॥
200. अत्यन्त निर्मल उपदेश । दादरा
चलु रे मन ! जहाँ अमृत वना, निर्मल नीके संत जना ॥ टेक ॥
निर्गुण नांव फल अगम अपार, संतन जीवन प्राण अधार ॥ 1 ॥
सीतल छाया सुखी शरीर, चरण सरोवर निर्मल नीर ॥ 2 ॥
सुफल सदा फल बारह मास, नाना वाणी धुनि प्रकाश ॥ 3 ॥
तहाँ वास बसि अमर अनेक, तहँ चलि दादू इहै विवेक ॥ 4 ॥
201. चौताल
चलो मन माहरा, जहाँ मित्र अम्हारा ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
तहँ जामण मरण नहिं जाणिये, नहिं जाणिये ॥ टेक ॥
मोह न माया, मेरा न तेरा, आवागमन नहीं जम फेरा ॥ 1 ॥
पिंड पड़े नहीं प्राण न छूटै, काल न लागै आयु न खूटै ॥ 2 ॥
अमर लोक तहँ अखिल शरीरा, व्याधि विकार न व्यापै पीरा ॥ 3 ॥
राम राज कोई भिड़े न भाजै, सुस्थिर रहणा बैठा छाजै ॥ 4 ॥
अलख निरंजन और न कोई, मित्र अम्हारा दादू सोई ॥ 5 ॥
202. बेली । त्रिताल
बेली आनन्द प्रेम समाइ ।
सहजैं मगन राम रस सींचै, दिन दिन बधती जाइ ॥ टेक ॥
सतगुरु सहजैं बाही बेली, सहज गगन घर छाया ।
सहजैं सहजैं कोंपल मेल्है, जाणै अवधू राया ॥ 1 ॥
आतम बेली सहजैं फूलै, सदा फूल फल होई ।
काया बाड़ी सहजैं निपजै, जानैं विरला कोई ॥ 2 ॥
मन हठ बेली सूखण लागी, सहजैं जुग जुग जीवै ।
दादू बेली अमर फल लागै, सहज सदा रस पीवै ॥ 3 ॥
203. शब्द बाण । त्रिताल
संतों ! राम बाण मोहि लागे ।
मारत मृग मर्म तब पायो, सब संगी मिल जागे ॥ टेक ॥
चित चेतन चिंतामणि चीन्हा, उलट अपूठा आया ।
मंदिर पैसि बहुरि नहिं निकसै, परम तत्त घर पाया ॥ 1 ॥
आवै न जाइ, जाइ नहिं आवै, तिहिं रस मनवा माता ।
पान करत परमानन्द पायो, थकित भयो चलि जाता ॥ 2 ॥
भयो अपंग पंक नहि लागै, निर्मल संग सहाई ।
पूर्ण ब्रह्म अखिल अविनाशी, तिहिं तज अनत न जाई ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
सो शर लागि प्रेम प्रकाशा, प्रकटी प्रीतम वाणी।
दादू दीन दयाल ही जानै, सुख में सुरति समानी ॥ 4 ॥
204. निज स्थान निर्णय । झपताल
मध्य नैन निरखूं सदा, सो सहज स्वरूप ।
देखत ही मन मोहिया, है तो तत्त्व अनूप ॥ टेक॥
त्रिवेणी तट पाइया, मूरति अविनाशी।
जुग जुग मेरा भावता, सोई सुख राशी ॥ 1 ॥
तारुणी तट देखि हूँ, तहाँ सुस्थाना।
सेवक स्वामी संग रहें, बैठे भगवाना ॥ 2 ॥
निर्भय थान सुहात सो, तहँ सेवक स्वामी।
अनेक जतन कर पाइया, मैं अन्तरजामी ॥ 3 ॥
तेज तार परिमित नहीं, ऐसा उजियारा।
दादू पार न पाइये, सो स्वरूप संभारा ॥ 4 ॥
205. झपताल
निकट निरंजन देखि हौं, छिन दूर न जाई ।
बाहर भीतर एक सा, सहजैं रह्या समाई ॥ टेक॥
सतगुरु भेद लखाइया, तब पूरा पाया।
नैनन ही निरखूं सदा, घर सहजैं आया ॥ 1 ॥
पूरे सौं परचा भया, पूरी मति जागी।
जीव जान जीवन मिल्या, ऐसे बड़ भागी ॥ 2 ॥
रोम रोम में रम रह्या, सो जीवन मेरा।
जीव पीव न्यारा नहीं, सब संग बसेरा ॥ 3 ॥
सुन्दर सो सहजैं रहै, घट अंतरजामी।
दादू सोई देखि हौं, सारों संग स्वामी ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली ४
२०६. परिचय उपदेश । त्रिताल
सहज सहेलड़ी हे, तूँ निर्मल नैन निहारि ।
रूप अरूप निर्गुण आगुण में, त्रिभुवन देव मुरारि ॥ टेक ॥
बारम्बार निरख जग जीवन, इहि घर हरि अविनाशी ।
सुन्दरी जाइ सेज सुख विलसे, पूरण परम निवासी ॥ 1 ॥
सहजैं संग परस जगजीवन, आसण अमर अकेला ।
सुन्दरी जाइ सेज सुख सोवै, जीव ब्रह्म का मेला ॥ 2 ॥
मिलि आनन्द प्रीति करि पावन, अगम निगम जहाँ राजा ।
जाइ तहाँ परस पावन को, सुन्दरी सारे काजा ॥ 3 ॥
मंगलाचार चहुँ दिशि रोपै, जब सुन्दरी पिव पावै ।
परम ज्योति पूरे सौं मिल कर, दादू रंग लगावै ॥ 4 ॥
२०७. वस्तु निर्देश । त्रिताल
तहँ आपै आप निरंजना, तहँ निसवासर नहि संजमा ॥ टेक ॥
तहँ धरती अम्बर नाहीं, तहँ धूप न दीसै छांहीं ।
तहँ पवन न चालै पानी, तहँ आपै एक बिनानी ॥ 1 ॥
तहँ चंद न ऊगै सूरा, मुख काल न बाजै तूरा ।
तहँ सुख दुख का गम नाहीं, ओ तो अगम अगोचर माहीं ॥ 2 ॥
तहँ काल काया नहिं लागै, तहँ को सोवै को जागै ।
तहँ पाप पुण्य नहिं कोई, तहँ अलख निरंजन सोई ॥ 3 ॥
तहँ सहज रहै सो स्वामी, सब घट अंतरजामी ।
सकल निरन्तर वासा, रट दादू संगम पासा ॥ 4 ॥
२०८. त्रिताल
अवधू ! बोल निरंजन बाणी, तहँ एकै अनहद जाणी ॥ टेक ॥
तहँ वसुधा का बल नाहीं, तहँ गगन घाम नहिं छाहीं ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
तहँ चंद सूर नहिं जाई, तहँ काल काया नहिं भाई ॥ 1 ॥
तहँ रैणि दिवस नहिं छाया, तहँ बाव वर्ण नहिं माया।
तहँ उदय अस्त नहिं होई, तहँ मरै न जीवै कोई ॥ 2 ॥
तहँ नाहीं पाठ पुराना, तहँ आगम निगम नहिं जाना।
तहँ विद्या वाद न जाना, नहिं तहाँ जोग अरु ध्याना ॥ 3 ॥
तहँ निराकार निज ऐसा, तहँ जाण्या जाइ न जैसा।
तहँ सब गुण रहिता गहिये, तहँ दादू अनहद कहिये ॥ 4 ॥
२०९. प्रसिद्ध साधु प्रतिपाल
बाबा! को ऐसा जन जोगी ।
अंजन छाड़ै रहै निरंजन, सहज सदा रस भोगी ॥ टेक ॥
छाया माया रहै विवर्जित, पिंड ब्रह्माण्ड नियारे।
चंद सूर तैं अगम अगोचर, सो कह तत्त्व विचारे ॥ 1 ॥
पाप पुण्य लिपै नहीं कबहूँ, द्वै पख रहिता सोई।
धरणि आकाश ताहि तैं ऊपरि, तहाँ जाइ रत होई ॥ 2 ॥
जीवण मरण न बांछै कबहूँ, आवागमन न फेरा।
पानी पवन परस नहिं लागै, तिहिं संग करै बसेरा ॥ 3 ॥
गुण आकार जहाँ गम नाहीं, आपै आप अकेला।
दादू जाइ तहाँ जन जोगी, परम पुरुष सौं मेला ॥ 4 ॥
२१०. परिचय पराभक्ति । राज विद्याधर ताल
जोगी जान जान जन जीवै ।
बिन ही मनसा मन हि विचारै, बिन रसना रस पीवै ॥ टेक ॥
बिनही लोचन निरख नैन बिन, श्रवण रहित सुन सोई।
ऐसे आतम रहै एक रस, तो दूसर नाम न होई ॥ 1 ॥
बिन ही मार्ग चलै चरण बिन, निहचल बैठा जाई।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
बिन ही काया मिलै परस्पर, ज्यों जल जलहि समाई ॥ 2 ॥
बिन ही ठाहर आसण पूरे, बिन कर बैन बजावै ।
बिन ही पावों नाचै निशिदिन, बिन जिभ्या गुण गावै ॥ 3 ॥
सब गुण रहिता सकल बियापी, बिन इंद्री रस भोगी ।
दादू ऐसा गुरु हमारा, आप निरंजन जोगी ॥ 4 ॥
२11. रूपक ताल
इहै परम गरु योगं, अमी महारस भोगं ॥ टेक॥
मन पवना स्थिर साधं, अविगत नाथ अराधं, तहँ शब्द अनाहद नादं ॥ १ ॥
पंच सखी परमोधं, अगम ज्ञान गुरु बोधं, तहँ नाथ निरंजन शोधं ॥ २ ॥
सद्गुरु मांहि बतावा, निराधार घर छावा, तहँ ज्योति स्वरूपी पावा ॥ ३ ॥
सहजैं सदा प्रकाशं, पूरण ब्रह्म विलासं, तहँ सेवक दादू दासं ॥ ४ ॥
२12. (गुजराती) अनभई । त्रिताल
मूने येह अचंभो थाये । कीड़ीये हस्ती विडान्यो, तेन्नें बैठी खाये ॥ टेक ॥
जाण हु तो ते बैठो हारे, अजाण तेन्नें ता वाहे ।
पांगुलोउ जाबा लाग्यो, तेन्नें कर को साहे ॥ १ ॥
नान्हो हुतो ते मोटो थायो, गगन मण्डल नहिं माये ।
मोटे रो विस्तार भणीजे, ते तो केन्नें जाये ॥ २ ॥
ते जाणे जे निरखी जोवे, खोजी नें वलीमांहे ।
दादू तेन्नों मर्म न जाणें, जे जिह्वा विहूणों गाये ॥ ३ ॥
इति राग रामकली सम्पूर्ण ॥ 8 ॥ पद 46 ॥

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राग आसावरी
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अथ राग आसावरी ९
(गायन समय प्रातः 6 से 9)
२13. उत्तम स्मरण । ब्रह्म ताल
तूँ ही मेरे रसना, तूँ ही मेरे बैना,
तूँ ही मेरे श्रवना, तूँ ही मेरे नैना ॥ टेक ॥
तूँ ही मेरे आतम कँवल मंझारी,
तूँ ही मेरी मनसा, तुम पर वारी ॥ 1 ॥
तूँ ही मेरे मन ही, तूँ ही मेरे श्वासा,
तूँ ही मेरे सुरतैं प्राण निवासा ॥ 2 ॥
तूँ ही मेरे नखशिख सकल शरीरा,
तूँ ही मेरे जियरे ज्यों जल नीरा ॥ 3 ॥
तुम बिन मेरे अवर को नांही,

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