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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 504 में से

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पृष्ठ 375

श्री दादूवाणी-राग रामकली 8

मैं जन सेवक द्वै नहीं, एकै अंग सार ॥ टेक ॥
मम कारण सब परिहरै, आपा अभिमान ।
सदा अखंडित उर धरै, बोले भगवान ॥ 1 ॥
अन्तर पट जीवै नहीं, तब ही मर जाइ ।
बिछुरे तलफै मीन ज्यूं, जीवै जल आइ ॥ 2 ॥
क्षीर नीर ज्यूं मिल रहै, जल जलहि समान ।
आतम पाणी लौण ज्यों, दूजा नांही आन ॥ 3 ॥
मैं जन सेवक द्वै नहीं, मेरा विश्राम ।
मेरा जन मुझ सारिखा, दादू कहै राम ॥ 4 ॥
175. परिचय विनती । जय मंगल ताल
शरण तुम्हारी केशवा, मैं अनन्त सुख पाया ।
भाग बड़े तूं भेटिया, हौं चरणौं आया ॥ टेक ॥
मेरी तप्त मिटी तुम्ह देखतां, शीतल भयो भारी ।
भव बंधन मुक्ता भया, जब मिल्या मुरारी ॥ 1 ॥
भरम भेद सब भूलिया, चेतन चित लाया ।
पारस सौं परचा भया, उन सहज लखाया ॥ 2 ॥
मेरा चंचल चित निश्चल भया, अब अनत न जाई ।
मगन भया सर बेधिया, रस पीया अघाई ॥ 3 ॥
सन्मुख ह्वै तैं सुख दिया, यहु दया तुम्हारी ।
दादू दरसन पावई, पीव प्राण अधारी ॥ 4 ॥
176. परस्पर गोष्टी परिचय विनती । तिलवाड़ा ताल
गोविन्द राखो अपणी ओट ।
काम क्रोध भये बटपारे, तकि मारैं उर चोट ॥ टेक ॥
बैरी पंच सबल संग मेरे, मारग रोक रहे ।

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