सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग रामकली 8
जम कर माथे बाण धरीला, ते तो मन ना आणे ॥ 2 ॥
मन विचारि सारी ते लीजे, तिल मांहीं तन पड़िबा।
दादू रे तहँ तन ताड़ीजे, जेणें मारग चढ़िबा ॥ 3 ॥
187. हितोपदेश । शूलताल
सन्मुख भइला रे, तब दुख गइला रे, ते मेरे प्राण अधारी।
निराकार निरंजन देवा रे, लेवा तेह विचारी ॥ टेक ॥
अपरम्पार परम निज सोई, अलख तोर विस्तारं।
अंकुर बीजे सहज समाना रे, ऐसा समर्थ सारं ॥ 1 ॥
जे तैं किन्हा किन्हि इक चीन्हा रे, भइला ते परिमाणं।
अविगत तोरी विगति न जाणूं, मैं मूरख अयानं ॥ 2 ॥
सहजें तोरा ए मन मोरा, साधन सौं रंग आई।
दादू तोरी गति नहिं जानैं, निर्बाहो कर लाई ॥ 3 ॥
188. मन प्रति सूरतन । त्रिताल
हरि मारग मस्तक दीजिये, तब निकट परम पद लीजिये ॥ टेक ॥
इस मारग मांहीं मरणा, तिल पीछे पाँव न धरणा।
अब आगे होई सो होई, पीछे सोच न करणा कोई ॥ 1 ॥
ज्यों शूरा रण झूझै, तब आपा पर नहिं बूझै।
सिर साहिब काज संवारै, घण घावां आपा डारै ॥ 2 ॥
सती सत गहि साचा बोलै, मन निश्चल कदे न डोलै।
वाके सोच पोच जिय ना आवै, जग देखत आप जलावै ॥ 3 ॥
इस सिर सौं साटा कीजे, तब अविनाशी पद लीजे।
ताका सब सिर साबित होवे, जब दादू आपा खोवे ॥ 4 ॥
189. कलियुगी । त्रिताल
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