सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग रामकली ४
२०६. परिचय उपदेश । त्रिताल
सहज सहेलड़ी हे, तूँ निर्मल नैन निहारि ।
रूप अरूप निर्गुण आगुण में, त्रिभुवन देव मुरारि ॥ टेक ॥
बारम्बार निरख जग जीवन, इहि घर हरि अविनाशी ।
सुन्दरी जाइ सेज सुख विलसे, पूरण परम निवासी ॥ 1 ॥
सहजैं संग परस जगजीवन, आसण अमर अकेला ।
सुन्दरी जाइ सेज सुख सोवै, जीव ब्रह्म का मेला ॥ 2 ॥
मिलि आनन्द प्रीति करि पावन, अगम निगम जहाँ राजा ।
जाइ तहाँ परस पावन को, सुन्दरी सारे काजा ॥ 3 ॥
मंगलाचार चहुँ दिशि रोपै, जब सुन्दरी पिव पावै ।
परम ज्योति पूरे सौं मिल कर, दादू रंग लगावै ॥ 4 ॥
२०७. वस्तु निर्देश । त्रिताल
तहँ आपै आप निरंजना, तहँ निसवासर नहि संजमा ॥ टेक ॥
तहँ धरती अम्बर नाहीं, तहँ धूप न दीसै छांहीं ।
तहँ पवन न चालै पानी, तहँ आपै एक बिनानी ॥ 1 ॥
तहँ चंद न ऊगै सूरा, मुख काल न बाजै तूरा ।
तहँ सुख दुख का गम नाहीं, ओ तो अगम अगोचर माहीं ॥ 2 ॥
तहँ काल काया नहिं लागै, तहँ को सोवै को जागै ।
तहँ पाप पुण्य नहिं कोई, तहँ अलख निरंजन सोई ॥ 3 ॥
तहँ सहज रहै सो स्वामी, सब घट अंतरजामी ।
सकल निरन्तर वासा, रट दादू संगम पासा ॥ 4 ॥
२०८. त्रिताल
अवधू ! बोल निरंजन बाणी, तहँ एकै अनहद जाणी ॥ टेक ॥
तहँ वसुधा का बल नाहीं, तहँ गगन घाम नहिं छाहीं ।
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