सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग रामकली 8
तहँ चंद सूर नहिं जाई, तहँ काल काया नहिं भाई ॥ 1 ॥
तहँ रैणि दिवस नहिं छाया, तहँ बाव वर्ण नहिं माया।
तहँ उदय अस्त नहिं होई, तहँ मरै न जीवै कोई ॥ 2 ॥
तहँ नाहीं पाठ पुराना, तहँ आगम निगम नहिं जाना।
तहँ विद्या वाद न जाना, नहिं तहाँ जोग अरु ध्याना ॥ 3 ॥
तहँ निराकार निज ऐसा, तहँ जाण्या जाइ न जैसा।
तहँ सब गुण रहिता गहिये, तहँ दादू अनहद कहिये ॥ 4 ॥
२०९. प्रसिद्ध साधु प्रतिपाल
बाबा! को ऐसा जन जोगी ।
अंजन छाड़ै रहै निरंजन, सहज सदा रस भोगी ॥ टेक ॥
छाया माया रहै विवर्जित, पिंड ब्रह्माण्ड नियारे।
चंद सूर तैं अगम अगोचर, सो कह तत्त्व विचारे ॥ 1 ॥
पाप पुण्य लिपै नहीं कबहूँ, द्वै पख रहिता सोई।
धरणि आकाश ताहि तैं ऊपरि, तहाँ जाइ रत होई ॥ 2 ॥
जीवण मरण न बांछै कबहूँ, आवागमन न फेरा।
पानी पवन परस नहिं लागै, तिहिं संग करै बसेरा ॥ 3 ॥
गुण आकार जहाँ गम नाहीं, आपै आप अकेला।
दादू जाइ तहाँ जन जोगी, परम पुरुष सौं मेला ॥ 4 ॥
२१०. परिचय पराभक्ति । राज विद्याधर ताल
जोगी जान जान जन जीवै ।
बिन ही मनसा मन हि विचारै, बिन रसना रस पीवै ॥ टेक ॥
बिनही लोचन निरख नैन बिन, श्रवण रहित सुन सोई।
ऐसे आतम रहै एक रस, तो दूसर नाम न होई ॥ 1 ॥
बिन ही मार्ग चलै चरण बिन, निहचल बैठा जाई।
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