सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग रामकली 8
काम दलन करुणामयी, तूँ देव मुरारी ॥ 2 ॥
सब कंपैं करतार तैं, भव-बंधन पाशा।
अरि रिपु भंजन भय गता, सब विघ्न विनाशा ॥ 3 ॥
सिर ऊपर सांई खड़ा, सोई हम माहीं।
दादू सेवक राम का निर्भय, न डराहीं ॥ 4 ॥
182. हितोपदेश । त्रिताल
हरि के चरण पकर मन मेरा, यहु अविनाशी घर तेरा ॥ टेक ॥
जब चरण कमल रज पावै, तब काल व्याल बौरावै।
तब त्रिविध ताप तन नाशौ, तब सुख की राशि विलासै ॥ 1 ॥
जब चरण क मल चित लागै, तब माथै मीच न जागै।
तब जनम जरा सब क्षीना, तब पद पावन उर लीना ॥ 2 ॥
जब चरण कमल रस पीवै, तब माया न व्यापै जीवै।
तब भरम करम भय भाजै, तब तीनों लोक विराजै ॥ 3 ॥
जब चरण कमल रुचि तेरी, तब चार पदारथ चेरी।
तब दादू और न बांछै, जब मन लागै सांचै ॥ 4 ॥
183. संत उपदेश । राज मृगांक ताल
संतों ! और कहो क्या कहिये ।
हम तुम्ह सीख इहै सतगुरु की, निकट राम के रहिये ॥ टेक ॥
हम तुम मांहि बसै सो स्वामी, सांचे सौं सचु लहिये।
दर्शन परसन जुग जुग कीजे, काहे को दुख सहिये ॥ 1 ॥
हम तुम संग निकट रहैं नेरे, हरि केवल कर गहिये।
चरण कमल छाड़ि कर ऐसे, अनत काहे को बहिये ॥ 2 ॥
हम तुम तारन तेज घन सुन्दर, नीके सौं निरबहिये।
दादू देख और दुख सब ही, तामें तन क्यों दहिये ॥ 3 ॥
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