सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
कै भल मानैं नाचें गायें, कै भल मानैं लोक रिझायें ॥ 1 ॥
कै भल मानैं तीरथ न्हायें, कै भल मानैं मूंड़ मुंडायें ॥ 2 ॥
कै भल मानैं सब घर त्यागी, कै भल मानैं भये वैरागी ॥ 3 ॥
कै भल मानैं जटा बधाये, कै भल मानैं भस्म लगाये ॥ 4 ॥
कै भल मानैं वन वन डोलें, कै भल मानैं मुखहि न बोलें ॥ 5 ॥
कै भल मानैं जप तप कीये, कै भल मानैं करवत लीये ॥ 6 ॥
कै भल मानैं ब्रह्म गियानी, कै भल मानैं अधिक धियानी ॥ 7 ॥
जे तुम्ह भावै सो तुम्ह पै आहि, दादू न जाणैं कहि समझाहि ॥ 8 ॥
साखी से उत्तर-
दादू जे तूँ समझै तो कहूँ, साचा एक अलेख ।
डाल पान तज मूल गहि, क्या दिखलावै भेष ॥ 1 ॥
दादू सच बिन साँई ना मिलै, भावै भेष बनाइ ।
भावै करवत उरध मुख, भावै तीरथ जाइ ॥ 2 ॥
२३. परिचय विनती
अहो ! गुण तोर, अवगुण मोर, गुसाँई ।
तुम कृत कीन्हा, सो मैं जानत नांहीं ॥ टेक ॥
तुम उपकार किये हरि केते, सो हम बिसर गये ।
आप उपाइ अग्निमुख राखे, तहाँ प्रतिपाल भये, हो गुसाँई ॥ 1 ॥
नख-सिख साज किये हो संजीवन, उदर आधार दिये ।
अन्न-पान जहाँ जाइ भस्म हो, तहाँ तैं राखि लिये, हो गुसाँई ॥ 2 ॥
दिन दिन जान जतन कर पोषे, सदा समीप रहे ।
अगम अपार किये गुन केते, कबहुँ नांहि कहे, हो गुसाँई ॥ 3 ॥
कबहूँ नांहि न तुम तन चितवत, माया मोह परे ।
दादू तुम तज जाइ गुसाँई, विषया मांहि जरे, हो गुसाँई ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
24. उपदेश चेतावनी । एकताल
कैसे जीविये रे, साँई संग न पास ?
चंचल मन निश्चल नहीं, निशिदिन फिरे उदास ॥ टेक ॥
नेह नहीं रे राम का, प्रीति नहीं परकाश ।
साहिब का सुमिरण नहीं, करे मिलन की आश ॥ 1 ॥
जिस देखे तूँ फूलिया रे, पाणी पिंड बधाणां मांस ।
सो भी जल-बल जाइगा, झूठा भोग विलास ॥ 2 ॥
तो जीवीजे जीवणां, सुमरै श्वासै श्वास ।
दादू प्रकट पीव मिलै, तो अंतर होइ उजास ॥ 3 ॥
25. हितोपदेश । चटताल
जियरा मेरे सुमिर सार, काम क्रोध मद तज विकार ॥ टेक ॥
तूँ जनि भूले मन गँवार, शिर भार न लीजे मान हार ॥ 1 ॥
सुन समझायो बार-बार, अजहूँ न चेतै, हो हुसियार ॥ 2 ॥
कर तैसे भव तिरिये पार, दादू अब तैं यही विचार ॥ 3 ॥
26. (क)-भय चेतावनी । त्रिताल
जियरा, चेत रे जनि जारे ।
हे जैं हरि सौं प्रीति न कीन्ही, जन्मअमोलक हारे ॥ टेक ॥
बेर बेर समझायो रे जियरा, अचेत न होइ गंवारे ।
यहु तन है कागद की गुड़िया, कछु इक चेत विचारे ॥ 1 ॥
तिल तिल तुझको हानि होत है, जे पल राम बिसारे ।
भय भारी दादू के जिय में, कहु कैसे कर डारे ॥ 2 ॥
26 (ख) पंजाबी त्रिताल
जियरा काहे रे मूढ डोले ?
वनवासी लाला पुकारे, तूँही तूँही कर बोले ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
साथ सवारी ले न गयो रे, चालण लागो बोले ।
तब जाइ जियरा जाणैगो रे, बाँधे ही कोई खोले ॥ 1 ॥
तिल तिल मांहैं चेत चली रे, पंथ हमारा तोले ।
गहिला दादू कछू न जाणै, राख ले मेरे मोले ॥ 2 ॥
27. अबल वैराग्य । त्रिताल
ता सुख को कहो का कीजै, जातैं पल पल यहु तन छीजै ॥ टेक ॥
आसन कुंजर सिर छत्र धरीजै, ताथैं फिरि फिरि दुःख सहीजै ॥ 1 ॥
सेज सँवार, सुन्दरी संग रमीजै, खाइ हलाहल भरम मरीजै ॥ 2 ॥
बहु विधि भोजन मान रुचि लीजै, स्वाद संकट भ्रम पाश परीजै ॥ 3 ॥
ये तज दादू प्राण पतीजै, सब सुख रसना राम रमीजै ॥ 4 ॥
28. उपदेश । एकेताल
मन निर्मल तन निर्मल भाई, आन उपाइ विकार न जाई ॥ टेक ॥
जो मन कोयला तो तन कारा, कोटि करै नहिं जाइ विकारा ॥ 1 ॥
जो मन विषहर तो तन भुवंगा, करै उपाइ विषय पुनि संगा ॥ 2 ॥
मन मैला तन उज्जवल नांहीं, बहु पचहारे विकार न जांहीं ॥ 3 ॥
मन निर्मल तन निर्मल होई, दादू साच विचारै कोई ॥ 4 ॥
29. उपदेश चेतावनी । त्रिताल
मैं मैं करत सबै जग जावै, अजहूँ अंध न चेते रे ।
यह दुनिया सब देख दिवानी, भूल गये हैं केते रे ॥ टेक ॥
मैं मेरे में भूल रहे रे, साजन सोइ विसारा ।
आया हीरा हाथ अमोलक, जन्म जुवा ज्यों हारा ॥ 1 ॥
लालच लोभैं लाग रहे रे, जानत मेरी मेरा ।
आपहि आप विचारत नाहीं, तूँ का को को तेरा ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
आवत हैं सब जाता दीसैं, इनमें तेरा नाहीं ।
इन सौं लाग जन्म जनि खोवै, शोधि देख सचु मांहीं ॥ 3 ॥
निहचल सौं मन मानैं मेरा, साँई सौं बन आई ।
दादू एक तुम्हारा साजन, जिन यहु भुरकी लाई ॥ 4 ॥
३०. उपदेश चेतावनी । त्रिताल
का जिवना का मरणा रे भाई, जो तैं राम न रमसि अघाई ॥ टेक ॥
का सुख संपत्ति छत्रपति राजा, वनखंड जाइ बसे किहिं काजा ॥ 1 ॥
का विद्या गुन पाठ पुराना, का मूरख जो तैं राम न जाना ॥ 2 ॥
का आसन कर अहर्निशि जागे, का फिर सोवत राम न लागे ॥ 3 ॥
का मुक्ता, का बंधे होई, दादू राम न जाना सोई ॥ 4 ॥
३१. मन प्रबोध । पंजाबी त्रिताल
मन रे राम बिना तन छीजे ।
जब यहु जाइ मिलै माटी में, तब कहु कैसे कीजै ॥ टेक ॥
पारस परस कंचन कर लीजे, सहज सुरति सुखदाई ।
माया बेलि विषय फल लागे, ता पर भूल न भाई ॥ 1 ॥
जब लग प्राण पिंड है नीका, तब लग ताहि जनि भूलै ।
यहु संसार सेमल के सुख ज्यों, ता पर तूँ जनि फूलै ॥ 2 ॥
अवसर यह जान जगजीवन, समझ देख सचु पावै ।
अंग अनेक आन मत भूलै, दादू जनि डहकावै ॥ 3 ॥
३२. मृगोक्ति उपदेश। झपताल
मोह्यो मृग देख वन अंधा, सूझत नहीं काल के फंधा ॥ टेक ॥
फूल्यो फिरत सकल वन मांही, सिर साधे शर सूझत नांही ॥ 1 ॥
उदमद मातो वन के ठाट, छाड़ चल्यो सब बारह बाट ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
फंध्यो न जानै वन के चाइ, दादू स्वाद बंधानो आइ ॥ ३ ॥
३३. मन प्रति उपदेस निसारुक ताल
काहे रे मन राम विसारै, मनखा जन्म जाय जिय हारै ॥ टेक॥
मात पिता को बन्धन भाई, सब ही सपना कहा सगाई ॥ १ ॥
तन धन जोबन झूठा जाणी, राम हृदय धर सारंग प्राणी ॥ २ ॥
चंचल चितवत झूठी माया, काहे न चेतै सो दिन आया ॥ ३ ॥
दादू तन मन झूठा कहिये, राम चरण गह काहे न रहिये ॥ ४ ॥
३४. मनुष्य देह महात्म्य । झपताल
ऐसा जनम अमोलिक भाई, जामें आइ मिलै राम राई ॥ टेक॥
जामें प्राण प्रेम रस पीवै, सदा सुहाग सेज सुख जीवै ॥ १ ॥
आत्मा आइ राम सौं राती, अखिल अमर धन पावै थाती ॥ २ ॥
प्रकट दर्शन परसन पावै, परम पुरुष मिलि मांहि समावै ॥ ३ ॥
ऐसा जन्म नहीं नर आवै, सो क्यों दादू रतन गँवावै ॥ ४ ॥
३५. परिचय सत्संग । दीपचन्दी ताल
सत्संगति मगन पाइये, गुरु प्रसादैं राम गाइये ॥ टेक॥
आकाश धरणी धरीजे, धरणी आकाश कीजे, शून्य माहिं निरख लीजे ॥ १ ॥
निरख मुक्ताहल मांहैं साइर आयो, अपने पिया हौं ध्यावत खोजत पायौ ॥ २ ॥
सोच साइर अगोचर लहिये, देव देहुरे मांही कवन कहिये ॥ ३ ॥
हरि को हितार्थ ऐसो लखै न कोई, दादू जे पीव पावै अमर होई ॥ ४ ॥
३६. उपदेश चेतावनी । एकताल
कौण जनम कहँ जाता है, अरे भाई, राम छाड़ि कहाँ राता है ॥ टेक॥
मैं मैं मेरी इन सौं लाग, स्वाद पतंग न सूझै आग ॥ १ ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
विषया सौं रत गर्व गुमान, कुंजर काम बँधे अभिमान ॥ 2 ॥
लोभ मोह मद माया फंध, ज्यों जल मीन न चेतै अंध ॥ 3 ॥
दादू यहु तन यों ही जाइ, राम विमुख मर गये विलाइ ॥ 4 ॥
37 एकताल
मन मूरखा, तैं क्या किया ? कुछ पीव कारण वैराग न लिया,
रे तैं जप तप साधी क्या दिया ॥ टेक ॥
रे तैं करवत काशी कद सह्या, रे तूँ गंगा माहीं न बह्या,
रे तैं विरहनी ज्यों दुख ना सह्या ॥ 1 ॥
रे तैं पालै पर्वत ना गल्या, रे तैं आप ही आपा ना दह्या,
रे तैं पीव पुकारी कद कह्या ॥ 2 ॥
होइ प्यासे हरि जल ना पिया, रे तूँ वज्र न फाटो रे हिया।
धिक् जीवन दादू ये जिया ॥ 3 ॥
३४. यतिताल
क्या कीजै मनिखा जन्म को, राम न जपहि गँवारा रे ?
माया के मद मातो बहे, भूल रह्या संसारा रे ॥ टेक ॥
हिरदै राम न आवई, आवै विषय विकारा रे।
हरि मारग सूझै नहीं, कूप परत नहीं बारा रे ॥ 1 ॥
आपा अग्नि जु आप में, तातैं अहिनिशि जरै शरीरा रे।
भाव भक्ति भावै नहीं, पीवै न हरि जल नीरा रे ॥ 2 ॥
मैं मेरी सब सूझई, सूझै माया जालो रे।
राम नाम सूझै नहीं, अंध न सूझै कालो रे ॥ 3 ॥
ऐसैं ही जन्म गमाइया, जित आया तित जाये रे।
राम रसायन ना पिया, जन दादू हेत लगाये रे ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
३९. परिचय वैराग्य । दादरा
इनमें क्या लीजे क्या दीजे, जन्म अमोलक छीजे ॥ टेक ॥
सोवत सुपिना होई, जागे थैं नहिं कोई ॥ 1 ॥
मृगतृष्णा जल जैसा, चेत देख जग ऐसा ॥ 2 ॥
बाजी भरम दिखावा, बाजीगर दहकावा ॥ 3 ॥
दादू संगी तेरा, कोई नहीं किस केरा ॥ 4 ॥
५०. चेतावनी उपदेश । सिंह लील ताल
खालिक जागे जियरा सोवे, क्यों कर मेला होवे ॥ टेक ॥
सेज एक नहिं मेला, तातैं प्रेम न खेला ॥ 1 ॥
साँई संग न पावा, सोवत जनम गमावा ॥ 2 ॥
गाफिल नींद न कीजे, आयु घटे तन छीजे ॥ 3 ॥
दादू जीव अयाना, झूठे भरम भुलानां ॥ 4 ॥
अथ राग जंगली गौड़ी
५1. पहरा (पंजाबी भाषा)। कहरवा ताल (बाल्यावस्था)
पहले पहरे रैणि दे, बणिजारिया, तूँ आया इहि संसार वे ।
मायादा रस पीवण लग्गा, बिसाऱ्या सिरजनहार वे ।
सिरजनहार बिसारा किया पसारा, मात पिता कुल नार वे ।
झूठी माया आप बँधाया, चेतै नहीं गँवार वे ।
दादू दास कहै, बणिजारा, तूँ आया इहि संसार वे ॥ 1 ॥
(तरुण अवस्था)
दूजे पहरै रैणि दे, बणिजारिया, तूँ रत्ता तरुणी नाल वे ।
माया मोह फिरै मतवाला, राम न सक्या संभाल वे ।
राम न संभाले, रत्ता नाले, अंध न सूझै काल वे ।
हरि नहीं ध्याया, जन्म गँवाया, दह दिशि फूटा ताल वे ।
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
दह दिशि फूटा, नीर निखूटा, लेखा देवण साल वे।
दादू दास कहै, बणिजारा, तूँ रत्ता तरुणी नाल वे ॥ 2 ॥
(प्रौढ अवस्था)
तीजे पहरे रैणि दे, बणिजारिया, तैं बहुत उठाया भार वे।
जो मन भाया, सो कर आया, ना कुछ किया विचार वे।
विचार न कीया नाम न लीया, क्यों कर लंघै पार वे।
पार न पावे, फिर पछितावे, डूबण लग्गा धार वे।
डूबण लग्गा, भेरा भग्गा, हाथ न आया सार वे।
दादू दास कहै, बणिजारा, तैं बहुत उठाया भार वे ॥ 3 ॥
वृद्धावस्था जर्जरी भूत (वृद्धावस्था)
चौथे पहरे रैणि दे, बणिजारिया, तूँ पक्का हुआ पीर वे।
जोबन गया, जरा वियापी, नांही सुधि शरीर वे।
सुधि ना पाई, रैणि गँवाई, नैनहुँ आया नीर वे।
भव-जल भेरा डूबण लग्गा, कोई न बंधै धीर वे।
कोई धीर न बंधे जम के फंधे, क्यों कर लंघे तीर वे।
दादू दास कहै, बणिजारा, तूँ पक्का हुआ पीर वे ॥ 4 ॥
५२. काल चेतावनी राग गौड़ी । पंजाबी त्रिताल
काहे रे नर करहु डफाण, अंत काल घर गोर मसाण ॥ टेक ॥
पहले बलवंत गये विलाइ, ब्रह्मा आदि महेश्वर जाइ ॥ 1 ॥
आगैं होते मोटे मीर, गये छाडि पैगम्बर पीर ॥ 2 ॥
काची देह कहा गर्वाना, जे उपज्या सो सबै बिलाना ॥ 3 ॥
दादू अमर उपावनहार, आपहि आप रहै करतार ॥ 4 ॥
५३. उपदेश पंजाबी । त्रिताल
इत घर चोर न मूसै कोई, अंतर है जे जानै सोई ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
जागुहु रे जन तत्त न जाइ, जागत है सो रह्या समाइ ॥ 1 ॥
जतन जतन कर राखहु सार, तस्कर उपजै कौन विचार ॥ 2 ॥
इब कर दादू जाणैं जे, तो साहिब शरणागति ले ॥ 3 ॥
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उपदेश चेतावनी । पंचम ताल
मेरी मेरी करत जग खीना, देखत ही चल जावै ।
काम क्रोध तृष्णा तन जालै, तातैं पार न पावै ॥ टेक ॥
मूरख ममता जन्म गमावै, भूल रहे इहिं बाजी ।
बाजीगर को जानत नांही, जन्म गंवावै वादी ॥ 1 ॥
प्रपंच पंच करै बहुतेरा, काल कुटुम्ब के तांई ।
विषै के स्वाद सबै ये लागे, तातैं चीन्हत नांही ॥ 2 ॥
येता जिय में जानत नांहीं, आइ कहाँ चल जावै ।
आगे पीछे समझै नांहीं, मूरख यूं डहकावै ॥ 3 ॥
ये सब भ्रम भान भल पावै, शोध लेहु सो साँई ।
सोई एक तुम्हारा साजन, दादू दूसर नांही ॥ 4 ॥ -
गर्व हानिकर । पंचम ताल
गर्व न कीजिये रे, गर्वै होइ विनाश ।
गर्वै गोविन्द ना मिलै, गर्वै नरक निवास ॥ टेक ॥
गर्वै रसातल जाइये, गर्वै घोर अन्धार ।
गर्वै भौ-जल डूबिये, गर्वै वार न पार ॥ 1 ॥
गर्वै पार न पाइये, गर्वै जमपुर जाइ ।
गर्वै को छूटै नहीं, गर्वै बँधे आइ ॥ 2 ॥
गर्वै भाव न ऊपजै, गर्वै भक्ति न होइ ।
गर्वै पिव क्यों पाइये, गर्वै करै जनि कोइ ॥ 3 ॥
गर्वै बहुत विनाश है, गर्वै बहुत विकार।
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
दादू गर्व न कीजिये, सन्मुख सिरजनहार ॥ 4 ॥
46. हित उपदेश । नट ताल
हुसियार रहो, मन मारैगा, साँई सतगुरु तारैगा ॥ टेक ॥
माया का सुख भावै, मूरख मन बौरावै रे ॥ 1 ॥
झूठ साच कर जाना, इन्द्रिय स्वाद भुलाना रे ॥ 2 ॥
दुख को सुख कर मानै, काल झाल नहीं जानै रे ॥ 3 ॥
दादू कह समझावै, यहु अवसर बहुरि न पावै रे ॥ 4 ॥
47. विश्वास । नटताल
साहिबजी सत मेरा रे, लोग झखैं बहुतेरा रे ॥ टेक ॥
जीव जन्म जब पाया, मस्तक लेख लिखाया रे ॥ 1 ॥
घटै बधै कुछ नांही, कर्म लिख्या उस माहीं रे ॥ 2 ॥
विधाता विधि कीन्हा, सिरज सबन को दीन्हा रे ॥ 3 ॥
समरथ सिरजनहारा, सो तेरे निकट गँवारा रे ॥ 4 ॥
सकल लोक फिर आवै, तो दादू दीया पावै रे ॥ 5 ॥
48. राज विधाधर ताल
पूर रह्या परमेश्वर मेरा, अणमांग्या देवै बहुतेरा ॥ टेक ॥
सिरजनहार सहज में देइ, तो काहे धाइ माँग जन लेइ ॥ 1 ॥
विश्वंभर सब जग को पूरै, उदर काज नर काहे झूरै ॥ 2 ॥
पूरक पूरा है गोपाल, सबकी चिंत करै दरहाल ॥ 3 ॥
समर्थ सोई है जगन्नाथ, दादू देख रहे संग साथ ॥ 4 ॥
49. नाम विश्वास । राज मृगांक ताल
राम धन खात न खूटै रे,
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अपरंपार पार नहिं आवै, आथि न टूटै रे ॥ टेक॥
तस्कर लेइ न पावक जालै, प्रेम न छूटै रे ॥ 1 ॥
चहुंदिशि पसरयो बिन रखवाले, चोर न लूटै रे ॥ 2 ॥
हरि हीरा है राम रसायन, सरस न सूखै रे ॥ 3 ॥
दादू और आथि बहुतेरी, तुस नर कूटै रे ॥ 4 ॥
50. तत्व उपदेश । राज मृगांक ताल
तूँ है तूँ है तूँ है तेरा, मैं नहीं मैं नहीं मैं नहीं मेरा ॥ टेक॥
तूँ है तेरा जगत उपाया, मैं मैं मेरा धंधै लाया ॥ 1 ॥
तूँ है तेरा खेल पसारा, मैं मैं मेरा कहै गँवारा ॥ 2 ॥
तूँ है तेरा सब संसारा, मैं मैं मेरा तिन सिर भारा ॥ 3 ॥
तूँ है तेरा काल न खाइ, मैं मैं मेरा मर मर जाइ ॥ 4 ॥
तूँ है तेरा रह्या समाइ, मैं मैं मेरा गया विलाइ ॥ 5 ॥
तूँ है तेरा तुम्हीं मांहिं, मैं मैं मेरा मैं कुछ नांहिं ॥ 6 ॥
तूँ है तेरा तूँ ही होइ, मैं मैं मेरा मिल्या न कोइ ॥ 7 ॥
तूँ है तेरा लंघे पार, दादू पाया ज्ञान विचार ॥ 8 ॥
51. संजीवनी । पंचम ताल
राम विमुख जग मर मर जाइ, जीवैं संत रहैं लयौ लाइ ॥ टेक॥
लीन भये जे आतम रामा, सदा सजीवन कीये नामा ॥ 1 ॥
अमृत राम रसायन पीया, तातैं अमर कबीरा कीया ॥ 2 ॥
राम राम कह राम समाना, जन रैदास मिले भगवाना ॥ 3 ॥
आदि अंत केते कलि जागे, अमर भये अविनासी लागे ॥ 4 ॥
राम रसायन दादू माते, अविचल भये राम रंग राते ॥ 5 ॥
52. पंचम ताल
निकटि निरंजन लाग रहे, तब हम जीवित मुक्त भये ॥ टेक॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
मर कर मुक्ति जहाँ जग जाइ, तहाँ न मेरा न पतियाइ ॥ 1 ॥
आगे जन्म लहैं अवतारा, तहाँ न मानै मना हमारा ॥ 2 ॥
तन छूटे गति जो पद होइ, मृतक जीव मिले सब कोइ ॥ 3 ॥
जीवित जन्म सुफल करि जाना, दादू राम मिले मन माना ॥ 4 ॥
53. हैरान प्रश्न। वर्ण भिन्न ताल
कादिर कुदरत लखी न जाइ, कहाँ तैं उपजै कहाँ समाइ ॥ टेक ॥
कहाँ तैं कीन्ह पवन अरु पानी, धरणि गगन गति जाइ न जानी ॥ 1 ॥
कहाँ तैं काया प्राण प्रकासा, कहाँ पंच मिल एक निवासा ॥ 2 ॥
कहाँ तैं एक अनेक दिखावा, कहाँ तैं सकल एक ह्वै आवा ॥ 3 ॥
दादू कुदरत बहु हैरानां, कहाँ तैं राख रहे रहमाना ॥ 4 ॥
साखी उत्तर की
रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ ।
आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥ 1 ॥
श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।
कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥ 2 ॥
दादू शब्दैं बँध्या सब रहै, शब्दैं ही सब जाइ ।
शब्दैं ही सब ऊपजै, शब्दैं सबै समाइ ॥ 3 ॥
54. स्वरूप गति हैरान। वर्ण भिन्न ताल
ऐसा राम हमारे आवै, वार पार कोई अन्त न पावै ॥ टेक ॥
हलका भारी कह्या न जाइ, मोल माप नहीं रह्या समाइ ॥ 1 ॥
कीमत लेखा नहीं परिमाण, सब पच हारे साधु सुजाण ॥ 2 ॥
आगो पीछो परिमित नांहिं, केते पारिख आवहिं जाहिं ॥ 3 ॥
आदि अन्त मधि कहै न कोइ, दादू देखै अचरज होइ ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
55. प्रश्न । गजताल
कौण शब्द कौण परखणहार, कौण सुरति कहु कौण विचार ॥ टेक ॥
कौण सुज्ञाता कौण गियान, कौण उन्मनी कौण धियान ॥ 1 ॥
कौण सहज कहु कौण समाध, कौण भक्ति कहु कौण आराध ॥ 2 ॥
कौण जाप कहु कौण अभ्यास, कौण प्रेम कहु कौण पियास ॥ 3 ॥
सेवा कौण कहो गुरुदेव, दादू पूछे अलख अभेव ॥ 4 ॥
उत्तर की साखी
कौण शब्द ? दादू शब्द अनाहद हम सुन्या, नख शिख सकल शरीर ।
सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥ 1 ॥
कौण परखणहार ? प्राण जौहरी पारिखू, मन खोटा ले आवै ।
खोटा मन के माथे मारै, दादू दूर उड़ावै ॥ 2 ॥
कौण सुरति ? दादू सहजैं सुरति समाइ ले, पारब्रह्म के अंग ।
अरस परस मिल एक है, सन्मुख रहिबा संग ॥ 3 ॥
कौण विचार ? सहज विचार सुख में रहै, दादू बड़ा विवेक।
मन इन्द्री पसरै नहीं, अंतर राखै एक ॥ 4 ॥
कौण सुज्ञाता ? दादू सो ही पंडित ज्ञाता, राम मिलण की बूझै ॥ 5 ॥
कौण गियान ? हंस गियानी सो भला, अंतर राखै एक।
विष में अमृत काढ ले, दादू बड़ा विवेक ॥ 6 ॥
कौण उन्मनी ? मन लवरू के पंख हैं, उनमनि चढ़ै आकाश ।
पग रहि पूरे सांच के, रोपि रह्या हरि पास ॥ 7 ॥
कौण धियान ? जहँ विरहा तहँ और क्या, सुधि बुधि नाठे ज्ञान ।
लोक वेद मारग तजे, दादू एकै ध्यान ॥ 8 ॥
कौण सहज ? सहज रूप मन का भया, जब द्वै द्वै मिटी तरंग ।
ताता सीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 9 ॥
कौण समाधि ? सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि ।
लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 10 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
कौण भक्ति ? योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव।
मुक्ता-द्वारा महल का, इहि भक्ति का भाव ॥ 11 ॥
कौण आराध ? आत्मदेव आराथिये, विरोथिये नहीं कोइ।
आराधे सुख ऊपजै, विरोधे दुख होइ ॥ 12 ॥
कौण जाप ? सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरति सौं पोइ।
बिना हाथों निशदिन जपै, परम जाप यों होइ ॥ 13 ॥
कौण अभ्यास ? दादू धरती ह्वै रहै, तजि कूड़ कपट अहंकार।
साँई कारण शिर सहै, ताकों प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥ 14 ॥
कौण प्रेम ? प्रेम लहर की पालकी, आतम बैसे आइ।
दादू खेलै पीव सौं, सो सुख कह्या न जाइ ॥ 15 ॥
कौण पियास ? दादू कोई बांछै मुक्ति फल, कोई अमरापुरीवास।
कोई बांछै परमगति, दादू राममिलन की प्यास ॥ 16 ॥
सेवा कौण ? तेज पुंज को विलसना, मिल खेलैं इक ठाम।
भर-भर पीवै राम रस, सेवा इसकानाम ॥ 17 ॥
आपा गर्व गुमान तज, मद मत्सर अहंकार।
गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥ 18 ॥
सार मत कौण ? आपा मेटै हरि भजै, तन मन तजै विकार।
निर्वैरी सब जीव सौं, दादू यहु मतसार ॥ 19 ॥
56. प्रश्न । पंचम ताल
मैं नहिं जानूं सिरजनहार, ज्यों है त्योंहि कहो करतार ॥ टेक ॥
मस्तक कहाँ कहाँ कर पाइ, अविगत नाथ कहो समझाइ ॥ 1 ॥
कहं मुख नैनाँ श्रवणां साँई, जानराइ सब कहो गुसाँई ॥ 2 ॥
पेट पीठ कहाँ है काया, पड़दा खोल कहो गुरु राया ॥ 3 ॥
ज्यों है त्यों कह अन्तरजामी, दादू पूछै सतगुरु स्वामी ॥ 4 ॥
उत्तर की साखी
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
दादू सबै दिशा सो सारिखा, सबै दिशा मुख बैन।
सबै दिशा श्रवणहुँ सुनै, सबै दिशा कर नैन ॥ 1 ॥
सबै दिशा पग शीश हैं, सबै दिशा मन चैन।
सबै दिशा सन्मुख रहै, सबै दिशा अंग ऐन ॥ 2 ॥
ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात।
सभूमिं सर्वतः वत्वा अत्र तिष्ठ दशांगुलम् ॥
57. प्रश्न । पंजाबी त्रिताल
अलख देव गुरु ! देहु बताइ, कहाँ रहो त्रिभुवनपति राइ ॥ टेक ॥
धरती गगन बसहु कैलास, तिहूँ लोक में कहाँ निवास ॥ 1 ॥
जल थल पावक पवनां पूर, चंद सूर निकट कै दूर ॥ 2 ॥
मंदिर कौण, कौण घरबार, आसण कौण कहो करतार ॥ 3 ॥
अलख देव ! गति लखी न जाइ, दादू पूछै कहि समझाइ ॥ 4 ॥
उत्तर की साखी
दादू मुझ ही मांहीं मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार।
मुझ ही मांहीं मैं बसूं, आप कहै करतार ॥ 1 ॥
दादू मैं ही मेरा अर्श में,मैं ही मेरा स्थान।
मैं ही मेरी ठौर में, आप कहै रहमान ॥ 2 ॥
दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार।
मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥ 3 ॥
दादू मैं ही मेरी जाति में, मैं ही मेरा अंग।
मैं ही मेरा जीव में, आप कहै प्रसंग ॥ 4 ॥
58. रस त्रिताल
राम रस मीठा रे, कोई पीवै साधु सुजाण।
सदा रस पीवै प्रेम सौं, सो अविनाशी प्राण ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
इहि रस मुनि लागे सबै, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
सुर नर साधू संतजन, सो रस पीवै शेष ॥ 1 ॥
सिध साधक योगी जती, सती सबै शुकदेव ।
पीवत अंत न आवही, ऐसा अलख अभेव ॥ 2 ॥
इहि रस राते नामदेव, पीपा अरु रैदास ।
पीवत कबीरा ना थक्या, अजहूँ प्रेम पियास ॥ 3 ॥
यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही मांहि समाइ ।
मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥ 4 ॥
59. त्रिताल
मन मतवाला मधु पीवै, पीवै बारम्बारो रे ।
हरि रस रातो राम के, सदा रहै इकतारो रे ॥ टेक ॥
भाव भक्ति भाठी भई, काया कसणी सारो रे ।
पोता मेरे प्रेम का, सदा अखंडित धारो रे ॥ 1 ॥
ब्रह्म अग्नि जौबन जरै, चेतन चितहि उजासो रे ।
सुमति कलाली सारवै, कोई पीवै विरला दासो रे ॥ 2 ॥
प्रीति पियाले पीवही, छिन-छिन बारंबारो रे ।
आपा धन सब सौंपिया, तब रस पाया सारो रे ॥ 3 ॥
आपा पर नहिं जाणिये, भूलो माया जालो रे ।
दादू हरि रस जे पिवै, ताको कदे न लागै कालो रे ॥ 4 ॥
60. पंचम ताल
रस के रसिया लीन भये, सकल शिरोमणि तहाँ गये ॥ टेक ॥
राम रसायन अमृत माते, अविचल भये नरक नहीं जाते ॥ 1 ॥
राम रसायन भर भर पीवै, सदा सजीवन जुग जुग जीवै ॥ 2 ॥
राम रसायन त्रिभुवन सार, राम रसिक सब उतरे पार ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
दादू अमली बहुरि न आये, सुख सागर ता मांहि समाये ॥ 4 ॥
61. भेष । पंचम ताल
भेष न रीझे मेरा निज भर्तार, तातें कीजै प्रीति विचार ॥ टेक ॥
दुराचारिणी रच भेष बनावै, शील साच नहिं पिव को भावै ॥ 1 ॥
कंत न भावै करै श्रृंगार, डिंभपणैं रीझै संसार ॥ 2 ॥
जो पै पतिव्रता ह्वै है नारी, सो धन भावै पियहिं पियारी ॥ 3 ॥
पीव पहचानें आन नहिं कोई, दादू सोई सुहागिनी होई ॥ 4 ॥
62. विरह । घट ताल
सब हम नारी एक भर्तार, सब कोई तन करैं श्रृंगार ॥ टेक ॥
घर घर अपने सेज सँवारैं, कंत पियारे पंथ निहारैं ॥ 1 ॥
आरत अपने पीव को धावैं, मिलै नाह कब अंग लगावैं ॥ 2 ॥
अति आतुर ये खोजत डोलैं, बान परी वियोगिनि बोलैं ॥ 3 ॥
सब हम नारी दादू दीन, दे सुहाग काहू संग लीन ॥ 4 ॥
63. आत्मार्थी भेष । घट ताल
सोई सुहागिनी साच श्रृंगार, तन मन लाइ भजै भर्तार ॥ टेक ॥
भाव भक्ति प्रेम ल्यौ लावै, नारी सोई सार सुख पावै ॥ 1 ॥
सहज संतोंष शील सब आया, तब नारी नाह अमोलक पाया ॥ 2 ॥
तन मन जौबन सौंप सब दीन्हा, तब कंत रिझाइ आप वश कीन्हा ॥ 3 ॥
दादू बहुरि वियोग न होई, पीव सौं प्रीति सुहागिनी सोई ॥ 4 ॥
64. समता । वर्ण भिन्न ताल
तब हम एक भये रे भाई, मोहन मिलि सांची मति आई ॥ टेक ॥
पारस परस भये सुखदाई, तब दुतिया, दुर्मति दूर गँवाई ॥ 1 ॥
मलियागिरि मरम मिल पाया, तब वंश वरण कुल भ्रम गँवाया ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
हरि जल नीर निकट जब आया, तब बूँद बूँद मिल सहज समाया ॥ 3 ॥
नाना भेद भ्रम सब भागा, तब दादू एक रंगै रंग लागा ॥ 4 ॥
65. वर्ण भिन्न ताल
अलह राम छूटा भ्रम मोरा ।
हिंदू तुरक भेद कछु नांही, देखूं दर्शन तोरा ॥ टेक ॥
सोई प्राण पिंड पुनि सोई, सोई लोही मांसा ।
सोई नैन नासिका सोई, सहजैं कीन्ह तमासा ॥ 1 ॥
श्रवणों शब्द बाजता सुणिये, जिह्वा मीठा लागै ।
सोई भूख सबन को व्यापै, एक जुगति सोई जागै ॥ 2 ॥
सोई संधि बंध पुनि सोई, सोई सुख सोई पीरा ।
सोई हस्त पाँव पुनि सोई, सोई एक शरीरा ॥ 3 ॥
यहु सब खेल खालिक हरि तेरा, तैं ही एक कर लीना ।
दादू जुगति जान कर ऐसी, तब यहु प्राण पतीना ॥ 4 ॥
66. नटताल
भाई रे ऐसा पंथ हमारा,
द्वै पख रहित पंथ गह पूरा,अवरण एक अधारा ॥ टेक ॥
वाद-विवाद काहू सौं नांहीं, माहीं जगत तैं न्यारा ।
सम दृष्टि स्वभाव सहज में, आप ही आप विचारा ॥ 1 ॥
मैं तैं मेरी यहु मति नाहीं, निर्वैरी निरकारा ।
पूरण सबै देख आपा पर, निरालंब निरधारा ॥ 2 ॥
काहु के संग मोह न ममता, संगी सिरजनहारा ।
मनही मन सौं समझ सयाना, आनन्द एक अपारा ॥ 3 ॥
काम कल्पना कदे न कीजे, पूरण ब्रह्म पियारा ।
इहि पथ पहुँच पार गह दादू, सो तत सहज संभारा ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
67. परिचय हैरान । नटताल
ऐसो खेल बन्यो मेरी माई, कैसे कहूँ कछु जान्यो न जाई ॥ टेक ॥
सुर नर मुनिजन अचरज आई, राम-चरण को भेद न पाई ॥ 1 ॥
मंदिर माहिं सुरति समाई, कोऊ है सो देहु दिखाई ॥ 2 ॥
मनहिं विचार करहु ल्यौ लाई, दिवा समान कहाँ ज्योति छिपाई ॥ 3 ॥
देह निरंतर शून्य ल्यौ लाई, तहं कौण रमे कौण सूता रे भाई ॥ 4 ॥
दादू न जाणै ये चतुराई, सोइ गुरु मेरा जिन सुधि पाई ॥ 5 ॥
68. निज घर परिचय । पंचम ताल
भाई रे घर ही में घर पाया ।
सहज समाइ रह्यो ता मांही, सतगुरु खोज बताया ॥ टेक ॥
ता घर काज सबै फिर आया, आपै आप लखाया ।
खोल कपाट महल के दीन्हें, स्थिर सुस्थान दिखाया ॥ 1 ॥
भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया ।
पिंड परे जहाँ जिव जावै, ता में सहज समाया ॥ 2 ॥
निश्चल सदा चलै नहिं कबहुँ, देख्या सब में सोई ।
ताही सौं मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥ 3 ॥
आदि अनन्त सोई घर पाया, अब मन अनत न जाई ।
दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥ 4 ॥
69. मानस तीर्थ । पंचम ताल
इत है नीर नहावन जोग, अनत हि भ्रम भूला रे लोग ॥ टेक ॥
तिहिं तट न्हाये निर्मल होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ ॥ 1 ॥
सुघट घाट अरु तिरबो तीर, बैठे तहाँ जगत-गुरु पीर ॥ 2 ॥
दादू न जाणै तिन का भेव, आप लखावै अंतर देव ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
70. पंजाबी त्रिताल
ऐसा ज्ञान कथो मन ज्ञानी, इहि घर होइ सहज सुख जानी ॥ टेक ॥
गंग जमुन तहँ नीर नहाई, सुषमन नारी रंग लगाई ॥ 1 ॥
आप तेज तन रह्यो समाइ, मैं बलि ताकी देखूँ अघाइ ॥ 2 ॥
वास निरन्तर सो समझाइ, बिन नैनहुँ देखूँ तहाँ जाइ ॥ 3 ॥
दादू रे यहु अगम अपार, सो धन मेरे अधर अधार ॥ 4 ॥
71. परिचय सत्संग । पंजाबी त्रिताल
अब तो ऐसी बन आई, राम-चरण बिन रह्यो न जाई ॥ टेक ॥
साँई को मिलबे के कारण, त्रिकुटी संगम नीर नहाई ।
चरण-कमल की तहँ ल्यौ लागै, जतन जतन कर प्रीति बनाई ॥ 1 ॥
जे रस भीना छावर जावै, सुन्दरी सहजैं संग समाई ।
अनहद बाजे बाजन लागे, जिह्वाहीणैं कीरति गाई ॥ 2 ॥
कहा कहूँ कुछ वरणि न जाई, अविगति अंतर ज्योति जगाई ।
दादू उनको मरम न जानै, आप सुरंगे बैन बजाई ॥ 3 ॥
72. राज मृगांक ताल
नीके राम कहत है बपुरा ।
घर मांही घर निर्मल राखै, पंचों धोवै काया कपरा ॥ टेक ॥
सहज समर्पण सुमिरण सेवा, तिरवेणी तट संजम सपरा ।
सुन्दरी सन्मुख जागण लागी, तहँ मोहन मेरा मन पकरा ॥ 1 ॥
बिन रसना मोहन गुण गावै, नाना वाणी अनुभव अपरा ।
दादू अनहद ऐसे कहिये, भक्ति तत्त यहु मारग सकरा ॥ 2 ॥
73. मनसा गायत्री। राज मृगांक ताल
अवधू ! कामधेनु गहि राखी,
वश कीन्हीं तब अमृत स्रवै, आगै चार न नाखी ॥ टेक ॥
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