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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 504 में से

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पृष्ठ 327

श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
इहि रस मुनि लागे सबै, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
सुर नर साधू संतजन, सो रस पीवै शेष ॥ 1 ॥
सिध साधक योगी जती, सती सबै शुकदेव ।
पीवत अंत न आवही, ऐसा अलख अभेव ॥ 2 ॥
इहि रस राते नामदेव, पीपा अरु रैदास ।
पीवत कबीरा ना थक्या, अजहूँ प्रेम पियास ॥ 3 ॥
यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही मांहि समाइ ।
मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥ 4 ॥
59. त्रिताल
मन मतवाला मधु पीवै, पीवै बारम्बारो रे ।
हरि रस रातो राम के, सदा रहै इकतारो रे ॥ टेक ॥
भाव भक्ति भाठी भई, काया कसणी सारो रे ।
पोता मेरे प्रेम का, सदा अखंडित धारो रे ॥ 1 ॥
ब्रह्म अग्नि जौबन जरै, चेतन चितहि उजासो रे ।
सुमति कलाली सारवै, कोई पीवै विरला दासो रे ॥ 2 ॥
प्रीति पियाले पीवही, छिन-छिन बारंबारो रे ।
आपा धन सब सौंपिया, तब रस पाया सारो रे ॥ 3 ॥
आपा पर नहिं जाणिये, भूलो माया जालो रे ।
दादू हरि रस जे पिवै, ताको कदे न लागै कालो रे ॥ 4 ॥
60. पंचम ताल
रस के रसिया लीन भये, सकल शिरोमणि तहाँ गये ॥ टेक ॥
राम रसायन अमृत माते, अविचल भये नरक नहीं जाते ॥ 1 ॥
राम रसायन भर भर पीवै, सदा सजीवन जुग जुग जीवै ॥ 2 ॥
राम रसायन त्रिभुवन सार, राम रसिक सब उतरे पार ॥ 3 ॥

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