सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
कौण भक्ति ? योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव।
मुक्ता-द्वारा महल का, इहि भक्ति का भाव ॥ 11 ॥
कौण आराध ? आत्मदेव आराथिये, विरोथिये नहीं कोइ।
आराधे सुख ऊपजै, विरोधे दुख होइ ॥ 12 ॥
कौण जाप ? सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरति सौं पोइ।
बिना हाथों निशदिन जपै, परम जाप यों होइ ॥ 13 ॥
कौण अभ्यास ? दादू धरती ह्वै रहै, तजि कूड़ कपट अहंकार।
साँई कारण शिर सहै, ताकों प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥ 14 ॥
कौण प्रेम ? प्रेम लहर की पालकी, आतम बैसे आइ।
दादू खेलै पीव सौं, सो सुख कह्या न जाइ ॥ 15 ॥
कौण पियास ? दादू कोई बांछै मुक्ति फल, कोई अमरापुरीवास।
कोई बांछै परमगति, दादू राममिलन की प्यास ॥ 16 ॥
सेवा कौण ? तेज पुंज को विलसना, मिल खेलैं इक ठाम।
भर-भर पीवै राम रस, सेवा इसकानाम ॥ 17 ॥
आपा गर्व गुमान तज, मद मत्सर अहंकार।
गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥ 18 ॥
सार मत कौण ? आपा मेटै हरि भजै, तन मन तजै विकार।
निर्वैरी सब जीव सौं, दादू यहु मतसार ॥ 19 ॥
56. प्रश्न । पंचम ताल
मैं नहिं जानूं सिरजनहार, ज्यों है त्योंहि कहो करतार ॥ टेक ॥
मस्तक कहाँ कहाँ कर पाइ, अविगत नाथ कहो समझाइ ॥ 1 ॥
कहं मुख नैनाँ श्रवणां साँई, जानराइ सब कहो गुसाँई ॥ 2 ॥
पेट पीठ कहाँ है काया, पड़दा खोल कहो गुरु राया ॥ 3 ॥
ज्यों है त्यों कह अन्तरजामी, दादू पूछै सतगुरु स्वामी ॥ 4 ॥
उत्तर की साखी
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