सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
पिंड परोहन सिन्धु जल, भव सागर संसार ।
राम बिना सूझै नहीं, दादू खेवनहार ॥ 39 ॥
यहु घट बोहित धार में, दरिया वार न पार ।
भैभीत भयानक देखकर, दादू करी पुकार ॥ 40 ॥
कलियुग घोर अंधार है, तिसका वार न पार ।
दादू तुम बिन क्यों तिरै, समर्थ सिरजनहार ॥ 41 ॥
काया के वश जीव है, कस कस बँध्या मांहि ।
दादू आत्माराम बिन, क्यों ही छूटै नांहि ॥ 42 ॥
दादू प्राणी बँध्या पंच सौं, क्योंही छूटै नांहि ।
निधणी आया मारिये, यहु जीव काया मांहि ॥ 43 ॥
तुम बिन धणी न धोरी जीव का, यों ही आवै जाइ ।
जे तूँ साँई सत्य है, तो बेगा प्रकटहु आइ ॥ 44 ॥
निधणी आया मारिये, धणी न धोरी कोइ ।
दादू सो क्यूं मारिये, साहिब सिर पर होइ ॥ 45 ॥
दया विनती
राम विमुख जुग जुग दुखी, लख चौरासी जीव ।
जामै मरै जग आवटै, राखणहारा पीव ॥ 46 ॥
पोष प्रति पाल रक्षक
समर्थ सिरजनहार है, जे कुछ करै सो होइ ।
दादू सेवक राख ले, काल न लागै कोइ ॥ 47 ॥
विनती
साँई साचा नाम दे, काल झाल मिट जाइ ।
दादू निर्भय ह्वै रहे, कबहूँ काल न खाइ ॥ 48 ॥
कोई नहिं करतार बिन, प्राण उधारणहार ।
जियरा दुखिया राम बिन, दादू इहि संसार ॥ 49 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
जिनकी रक्षा तूँ करै, ते उबरे करतार।
जे तैं छाड़ै हाथ तैं, ते डूबे संसार ॥ 50 ॥
राखणहारा एक तूँ, मारणहार अनेक।
दादू के दूजा नहीं, तूँ आपै ही देख ॥ 51 ॥
दादू जग ज्वाला जम रूप है, साहिब राखणहार।
तुम बिच अन्तर जनि पड़ै, तातैं करूँ पुकार ॥ 52 ॥
जहँ तहँ विषय विकार तैं, तुम ही राखणहार।
तन मन तुम को सौंपिया, साचा सिरजनहार ॥ 53 ॥
दया विनती
दादू कहै- गरक रसातल जात है, तुम बिन सब संसार।
कर गहि कर्त्ता काढि ले, दे अवलम्बन आधार ॥ 54 ॥
दादू दौं लागी जग प्रज्वलै, घट घट सब संसार।
हम तैं कछू न होत है, तुम बरसि बुझावणहार ॥ 55 ॥
दादू आत्म जीव अनाथ सब, करतार उबारै।
राम निहोरा कीजिये, जनि काहू मारै ॥ 56 ॥
अर्श जमीं औजूद में, तहाँ तपै अफताब।
सब जग जलता देख कर, दादू पुकारैं साध ॥ 57 ॥
सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ।
पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥ 58 ॥
तन मन निर्मल आत्मा, सब काहू की होइ।
दादू विषय विकार की, बात न बूझै कोइ ॥ 59 ॥
विनती
समर्थ धोरी कंध धर, रथ ले ओर निवाहि।
मार्ग मांहि न मेलिये, पीछे बिड़द लजाहि ॥ 60 ॥
दादू गगन गिरै तब को धरै, धरती-धर छंडै।
जे तुम छाड़हु राम रथ, कंधा को मंडै ॥ 61 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
ज्यों वह बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहाँ ठाम।
लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवे राम ॥ 61 ॥
अन्तरयामी एक तूं, आतम के आधार।
जे तुम छाड़हु हाथ तैं, तो कौन संभालणहार ॥ 62 ॥
तेरा सेवक तुम लगै, तुम्हीं माथै भार।
दादू डूबत रामजी, बेगि उतारो पार ॥ 63 ॥
सत छूटा शूरातन गया, बल पौरुष भागा जाइ।
कोई धीरज ना धरै, काल पहूँता आइ ॥ 64 ॥
संगी थाके संग के, मेरा कुछ न वशाइ।
भाव भक्ति धन लूटिये, दादू दुखी खुदाइ ॥ 65 ॥
परिचय करुणा विनती
दादू जियरे जक नहीं, विश्राम न पावै।
आत्म पाणी लौंण ज्यों, ऐसे होइ न आवै ॥ 66 ॥
दया विनती
दादू तेरी खूबी खूब है, सब नीका लागे।
सुन्दर शोभा काढ़ ले, सब कोई भागे ॥ 67 ॥
विनती
तुम हो तैसी कीजिये, तो छूटेंगे जीव।
हम हैं ऐसी जनि करो, मैं सदके जाऊँ पीव ॥ 68 ॥
अनाथों का आसरा, निरधारों आधार।
निर्धन का धन राम है, दादू सिरजनहार ॥ 69 ॥
साहिब दर दादू खड़ा, निशदिन करै पुकार।
मीरां मेरा मिहर कर, साहिब दे दीदार ॥ 70 ॥
दादू प्यासा प्रेम का, साहिब राम पिलाइ।
प्रकट प्याला देहु भर, मृतक लेहु जिलाइ ॥ 71 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
अल्लह आली नूर का, भर-भर प्याला देहु ।
हम को प्रेम पिलाइ करि, मतवाला कर लेहु ॥ 72 ॥
तुम को हमसे बहुत हैं, हमको तुमसे नांहि ।
दादू को जनि परिहरै, तूँ रहु नैनहुँ मांहि ॥ 73 ॥
तुम तैं तब ही होइ सब, दरश परश दर हाल ।
हम तैं कबहुं न होइगा, जे बीतहिं जुग काल ॥ 74 ॥
तुम्हीं तैं तुम को मिलैं, एक पलक में आइ ।
हम तैं कबहुँ न होइगा, कोटि कल्प जे जाइ ॥ 75 ॥
छिन बिछोह
साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
दादू प्रेम सनेह बिन, खरी दुहेली देह ॥ 76 ॥
साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
प्रकट दर्शन देखते, दादू सुखिया देह ॥ 77 ॥
करुणा
तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और ।
मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥ 78 ॥
मुझ भावै सो मैं किया, तुझ भावै सो नांहि ।
दादू गुनहगार है, मैं देख्या मन मांहि ॥ 79 ॥
खुशी तुम्हारी त्यों करो, हम तो मानी हार ।
भावै बन्दा बख्शिये, भावै गह कर मार ॥ 80 ॥
दादू जे साहिब लेखा लिया, तो शीश काट शूली दिया ।
मिहर मया कर फिल किया, तो जीये जीये कर जिया ॥ 81 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-
सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-
ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम्
माहात्म्य चौंतीसवां विनती का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 34 ॥ साखी 81 ॥
- 295 -
साक्षीभूत का अंग
अथ साक्षीभूत का अंग ३५
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
भ्रम विध्वंसन
सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरै साखि ।
दादू साबित सो सही, दूजा और न राखि ॥ 2 ॥
मांही तैं मुझ को कहै, अन्तरजामी आप ।
दादू दूजा धंध है, साचा मेरा जाप ॥ 3 ॥
- 296 -
श्री दादूवाणी-साक्षीभूत का अंग 35
कर्त्ता साक्षीभूत
करता है सो करेगा, दादू साक्षीभूत।
कौतिकहारा ह्वै रह्या, अणकर्ता अवधूत ॥ 4 ॥
दादू राजस कर उत्पत्ति करै, सात्विक कर प्रतिपाल।
तामस कर परलै करै, निर्गुण कौतिकहार ॥ 5 ॥
दादू ब्रह्म जीव हरि आत्मा, खेलैं गोपी कान्ह।
सकल निरन्तर भर रह्या, साक्षीभूत सुजान ॥ 6 ॥
स्वकीय मित्र-शत्रुता
दादू जामण मरणा सान कर, यहु पिंड उपाया।
साँईं दिया जीव को, ले जग में आया ॥ 7 ॥
दादू विष अमृत सब पावक पाणी, सतगुरु समझाया।
मनसा वाचा कर्मणा, सोई फल पाया ॥ 8 ॥
दादू जानै बूझै जीव सब, गुण औगुण कीजे।
जान बूझ पावक पड़ै, दई दोष न दीजे ॥ 9 ॥
मन ही मांहीं ह्वै मरै, जीवै मन ही मांहि।
साहिब साक्षीभूत है, दादू दूषण नांहि ॥ 10 ॥
बुरा बला सिर जीव के, होवै इस ही मांहि।
दादू कर्त्ता कर रह्या, सो सिर दीजै नांहि ॥ 11 ॥
साधु साक्षीभूत
कर्त्ता ह्वै कर कुछ करै, उस मांहि बँधावै।
दादू उसको पूछिये, उत्तर नहीं आवै ॥ 12 ॥
दादू केई उतारैं आरती, केई सेवा कर जांहि।
केई आइ पूजा करैं, केई खिलावैं खांहि ॥ 13 ॥
केई सेवक ह्वै रहे, केई साधु संगति मांहि।
केई आइ दर्शन करैं, हम तैं होता नांहि ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-साक्षीभूत का अंग 35
ना हम करैं करावैं आरती, ना हम पिवैं पिलावैं नीर ।
करै करावै सांइयाँ, दादू सकल शरीर ॥ 15 ॥
करै करावै सांइयाँ, जिन दिया औजूद ।
दादू बन्दा बीच में, शोभा को मौजूद ॥ 16 ॥
देवै लेवै सब करै, जिन सिरजे सब कोइ ।
दादू बन्दा महल में, शोभा करैं सब कोइ ॥ 17 ॥
कर्त्ता साक्षीभूत
दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ ।
सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥ 18 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
पैंतीसवां साक्षीभूत काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 35 ॥ साखी 18 ॥
- 298 -
बेली का अंग
अथ बेली का अंग ३६
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
दादू अमृत रूपी नाम ले, आत्म तत्त्वहि पोषै ।
सहजैं सहज समाधि में, धरणी जल शोषै ॥ 2 ॥
पसरै तीनों लोक में, लिप्त नहीं धोखे ।
सो फल लागै सहज में, सुन्दर सब लोके ॥ 3 ॥
दादू बेली आत्मा, सहज फूल फल होइ ।
सहज सहज सतगुरु कहै, बूझै बिरला कोइ ॥ 4 ॥
- 299 -
श्री दादूवाणी-बेली का अंग 36
जे साहिब सींचै नहीं, तो बेली कुम्हलाइ ।
दादू सींचै सांइयाँ, तो बेली बधती जाइ ॥ 5 ॥
हरि तरुवर तत आत्मा, बेली कर विस्तार ।
दादू लागै अमर फल, कोइ साधू सींचनहार ॥ 6 ॥
दादू सूखा रूंखड़ा, काहे न हरिया होइ ।
आपै सींचै अमीरस, सुफल फलिया सोइ ॥ 7 ॥
कदे न सूखै रूंखड़ा, जे अमृत सींच्या आप ।
दादू हरिया सो फलै, कछू न व्यापै ताप ॥ 8 ॥
जे घट रोपै राम जी, सींचै अमी अघाइ ।
दादू लागै अमर फल, कबहूँ सूख न जाइ ॥ 9 ॥
दादू अमर बेलि है आत्मा, खार समंदां मांहिं ।
सूखै खारे नीर सौं, अमर फल लागे नांहिं ॥ 10 ॥
दादू बहुगुणवंती बेलि है, ऊगी कालर मांहिं ।
सींचै खारे नीर सौं, तातैं निपजै नांहिं ॥ 11 ॥
बहुगुणवंती बेली है, मीठी धरती बाहि ।
मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥ 12 ॥
अमृत बेली बाहिये, अमृत का फल होइ ।
अमृत का फल खाइ कर, मुवा न सुणिया कोइ ॥ 13 ॥
दादू विष की बेली बाहिये, विष ही का फल होइ ।
विष ही का फल खाय कर, अमर नहिं कलि कोइ ॥ 14 ॥
सतगुरु संगति नीपजै, साहिब सींचनहार ।
प्राण वृक्ष पीवै सदा, दादू फलै अपार ॥ 15 ॥
दया धर्म का रूंखड़ा, सत सौं बधता जाइ ।
संतोंष सौं फूलै फलै, दादू अमर फल खाइ ॥ 16 ॥
- 300 -
श्री दादूवाणी-बेली का अंग 36
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
छत्तीसवां बेली काअंग सम्पूर्ण ।। अंग 36 ।। साखी 16 ।।
- 301 -
अबिहड़ का अंग
www.dadooram.org
अथ अबिहड़ का अंग ३७
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
दादू संगी सोई कीजिये, जे कलि अजरावर होइ ।
ना वह मरै, न बीछूटै, ना दुख व्यापै कोइ ॥ 2 ॥
दादू संगी सोई कीजिये, जे थिर इहि संसार ।
ना वह खिरै, न हम खपैं, ऐसा लेहु विचार ॥ 3 ॥
दादू संगी सोई कीजिये, सुख दुख का साथी ।
दादू जीवन-मरण का, सो सदा संगाती ॥ 4 ॥
- 302 -
श्री दादूवाणी-अबिहड़ का अंग 37
दादू संगी सोई कीजिये, जे कबहूँ पलट न जाइ।
आदि अंत बिहड़ै नही, ता सन यहु मन लाइ ॥ 5 ॥
दादू अबिहड़ आप है, अमर उपावनहार।
अविनाशी आपै रहै, बिनसै सब संसार ॥ 6 ॥
दादू अबिहड़ आप है, साचा सिरजनहार।
आदि अंत बिहड़ै नहीं, बिनसै सब आकार ॥ 7 ॥
दादू अबिहड़ आप है, अविचल रह्या समाइ।
निहचल रमता राम है, जो दीसै सो जाइ ॥ 8 ॥
दादू अबिहड़ आप है, कबहूँ बिहड़े नांहि।
घटै बधै नहीं एक रस, सब उपज खपै उस मांहि ॥ 9 ॥
अबिहड़ अंग बिहड़ै नहीं, अपलट पलट न जाइ।
दादू अघट एक रस, सब में रह्या समाइ ॥ 10 ॥
अन्त समय की साखी
जेते गुण व्यापैं जीव को, तेते तैं तजे रे मन।
साहिब अपणे कारणैं,(भलो निबाह्यो प्रण) ॥ 11 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सैंतीसवां अबिहड़ काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 37 ॥ साखी 11 ॥
साखी स्कन्ध पूर्वार्द्ध भाग समाप्त
दादूराम सत्यराम
- 303 -
दादूराम ॥ श्री परमात्मने नमः ॥ सत्यराम
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
शब्द भाग (उत्तरार्ध)
अथ राग गौड़ी १ (गायन समय दिन 3 से 6)
- स्मरण शूरातन नाम निश्चय । त्रिताल
राम नाम नहीं छाडूं भाई, प्राण तजूं निक ट जीव जाई ॥ टेक ॥
रती रती कर डारै मोहि, साँई संग न छाडूं तोहि ॥ 1 ॥
भावै ले सिर करवत दे, जीवन मूरी न छाडूं तोहि ॥ 2 ॥
पावक में ले डारै मोहि, जरै शरीर न छाडूं तोहि ॥ 3 ॥
अब दादू ऐसी बन आई, मिलूं गोपाल निसान बजाई ॥ 4 ॥
- 304 -
श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
2. अन्य उपदेश । त्रिताल
राम नाम जनि छाड़े कोई, राम कहत जन निर्मल होई ॥ टेक ॥
राम कहत सुख संपति सार, राम नाम तिर लंघे पार ॥ 1 ॥
राम कहत सुधि बुधि मति पाई, राम नाम जनि छाड़हु भाई ॥ 2 ॥
राम कहत जन निर्मल होई, राम नाम कहि कश्मल धोई ॥ 3 ॥
राम कहत को को नहिं तारे, यहु तत दादू प्राण हमारे ॥ 4 ॥
3. स्मरण उपदेश । राज मृगांक ताल
मेरे मन भैया राम कहो रे ।
राम नाम मोहि सहज सुनावै, उनहीं चरण मन कीन रहो रे ॥ टेक ॥
राम नाम ले संत सुहावै, कोई कहै सब शीश सहो रे ।
वाही सौं मन जोरे राखो, नीके राशि लिये निबहो रे ॥ 1 ॥
कहत सुनत तेरो कछू न जावै, पापनि छेदन सोई लहो रे ।
दादू रे जन हरि गुण गावो, कालहि जालहि फेरि दहो रे ॥ 2 ॥
4. विरह । एकताल
कौण विधि पाइये रे, मीत हमारा सोइ ॥ टेक ॥
पास पीव, परदेश है रे, जब लग प्रकटै नांहि।
बिन देखे दुख पाइये, यहु सालै मन मांहि ॥ 1 ॥
जब लग नैन न देखिये, प्रकट मिलै न आइ।
एक सेज संगहि रहै, यहु दुख सह्या न जाइ ॥ 2 ॥
तब लग नेड़ै दूर है रे, जब लग मिले न मोहि।
नैन निकट नहीं देखिये, संग रहे क्या होइ ॥ 3 ॥
कहा करूँ कैसे मिले रे, तलफै मेरा जीव।
दादू आतुर विरहनी, कारण अपने पीव ॥ 4 ॥
- 305 -
श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
5. विरह विलाप । षटताल
जियरा क्यों रहै रे, तुम्हारे दर्शन बिन बेहाल ॥ टेक ॥
परदा अंतर कर रहे, हम जीवैं किहिं आधार।
सदा संगाती प्रीतमा, अब के लेहु उबार ॥ 1 ॥
गोप्य गुसांइ ह्रै रहे, अब काहे न प्रकट होइ।
राम सनेही संगिया, दूजा नांही कोइ ॥ 2 ॥
अन्तरयामी छिप रहे, हम क्यों जीवैं दूर।
तुम बिन व्याकुल केशवा, नैन रहे जल पूर ॥ 3 ॥
आप अपरछन ह्रै रहे, हम क्यों रैनि बिहाइ।
दादू दर्शन कारणै, तलफ तलफ जीव जाइ ॥ 4 ॥
6. विरह हैरान । त्रिताल
अजहूँ न निकसैं प्राण कठोर।
दर्शन बिना बहुत दिन बीते, सुन्दर प्रीतम मोर ॥ टेक ॥
चार पहर चारों युग बीते, रैनि गँवाई भोर।
अवधि गई अजहूँ नहिं आये, कतहूँ रहे चित-चोर ॥ 1 ॥
कबहूँ नैन निरख नहिं देखे, मारग चितवत तोर।
दादू ऐसे आतुर विरहनी, जैसे चंद चकोर ॥ 2 ॥
7. सुन्दरी श्रृंगार
सो-धन पीवजी साज सँवारी,
अब वेगि मिलो तन जाइ बनवारी ॥ टेक ॥
साज श्रृंगार किया मन मांही, अजहूँ पीव पतीजै नांही ॥ 1 ॥
पीव मिलन को अहिनिशि जागी, अजहूँ मेरी पलक न लागी ॥ 2 ॥
जतन-जतन कर पंथ निहारूँ, पीव भावै त्यों आप सँवारूं ॥ 3 ॥
अब सुख दीजे जाऊँ बलिहारी, कहै दादू सुन विपति हमारी ॥ 4 ॥
- 306 -
श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
४. विरह चिन्ता । गजताल
सो दिन कबहूँ आवेगा, दादूड़ा पीव पावेगा ॥ टेक ॥
क्यूं ही अपने अंग लगावेगा, तब सब दुख मेरा जावेगा ॥ 1 ॥
पीव अपने बैन सुनावेगा, तब आनंद अंग न मावेगा ॥ 2 ॥
पीव मेरी प्यास मिटावेगा, तब आपहि प्रेम पिलावेगा ॥ 3 ॥
दे अपना दर्श दिखावेगा, तब दादू मंगल गावेगा ॥ 4 ॥
९. विरह प्रीति । पंचम ताल
तैं मन मोह्यो मोर रे, रह न सकूँ हौं राम जी ॥ टेक ॥
तोरे नांव चित लाइया रे, औरन भया उदास।
साँईं ये समझाइया, हौं संग न छाडूं पास रे ॥ 1 ॥
जाणूं तिलहि न बिछुटूं रे, जनि पछतावा होइ।
गुण तेरे रसना जपूं, सुणसी साँई सोइ रे ॥ 2 ॥
भोरे जन्म गँमाइया रे, चीन्हा नहीं सो सार।
अजहूँ यह अचेत है, और नहीं आधार रे ॥ 3 ॥
पीव की प्रीत तो पाइये रे, जो सिर होवे भाग।
यो तो अनत न जाइसी, रहसी चरणहुँ लाग रे ॥ 4 ॥
अनतैं मन निवारिया रे, मोहि एकै सेती काज।
अनत गये दुख ऊपजै, मोहि एकै सेती राज रे ॥ 5 ॥
साँईं सौं सहजैं रमूँ रे, और नहीं आन देव।
तहाँ मन विलंबिया, जहाँ अलख अभेव रे ॥ 6 ॥
चरण कमल चित लाइया रे, भोरैं ही ले भाव।
दादू जन अचेत है, सहजैं ही तूँ आव रे ॥ 7 ॥
- 307 -
श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
-
विरह विलाप । पंचमताल
विरहनी को श्रृंगार न भावे, है कोई ऐसा राम मिलावे ॥ टेक ॥
विसरे अंजन मंजन चीरा, विरह व्यथा यहु व्यापै पीरा ॥ 1 ॥
नव-सत थाके सकल श्रृंगारा, है कोई पीड़ मिटावनहारा ॥ 2 ॥
देह गेह नहीं सुधि शरीरा, निशदिन चितवत चातक नीरा ॥ 3 ॥
दादू ताहि न भावे आन, राम बिना भई मृतक समान ॥ 4 ॥ -
करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल
अब तो मोहि लागी बाइ, उन निश्चल चित्त लियो चुराइ ॥ टेक ॥
आन न रुचै और नहीं भावै, अगम अगोचर तहँ मन जाइ।
रूप न रेख वर्ण कहूँ कैसा, तिन चरणों चित्त रह्या समाइ ॥ 1 ॥
तिन चरणों चित्त सहज समाना, सो रस भीना तहँ मन धाइ।
अब तो ऐसी बन आई, विष तजैं अरु अमृत खाइ ॥ 2 ॥
कहा करूँ, मेरा वश नांही, और न मेरे अंग सुहाइ।
पल इक दादू देखन पावै, तो जन्म जन्म की तृषा बुझाइ ॥ 3 ॥ -
करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल
तूँ जनि छाड़ै केशवा, मेरे और निवाहनहार हो ॥ टेक ॥
अवगुण मेरे देखकर, तूँ ना करि मैला मन।
दीनानाथ दयाल है, अपराधी सेवक जन हो ॥ 1 ॥
हम अपराधी जन्म के, नखशिख भरे विकार।
मेट हमारे अवगुणा, तूँ गरवा सिरजनहार हो ॥ 2 ॥
मैं जन बहुत बिगारिया, अब तुम ही लेहु सँवार ।
समर्थ मेरा सांइयाँ, तूँ आपै आप उधार हो ॥ 3 ॥
तूँ न विसारी केशवा, मैं जन भूला तोहि।
दादू को और निवाह ले, अब जनि छाड़े मोहि हो ॥ 4 ॥
- 308 -
श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
13. केवल विनती । गजताल
राम सँभालिये रे, विषम दुहेली बार ॥ टेक ॥
मंझ समंदां नावरी रे, बूडे खेवट-बाज।
काढनहारा को नहीं, एक राम बिन आज ॥ 1 ॥
पार न पहुँचै राम बिन, भेरा भवजल मांहि।
तारणहारा एक तूँ, दूजा कोई नांहि ॥ 2 ॥
पार परोहन तो चले, तुम खेवहु सिरजनहार।
भव सागर में डूब है, तुम्ह बिन प्राण अधार ॥ 3 ॥
औघट दरिया क्यों तिरे, बोहिथ बैसणहार।
दादू खेवट राम बिन, कौण उतारे पार ॥ 4 ॥
14. रंग ताल
पार नहीं पाइये रे, राम बिना को निर्वाणहार ॥ टेक ॥
तुम बिन तारण को नहीं, दूभर यहु संसार।
पैरत थाके केशवा, सूझै वार न पार ॥ 1 ॥
विषम भयानक भव-जला, तुम्ह बिन भारी होइ।
तूँ हरि तारण केशवा, दूजा नांही कोइ ॥ 2 ॥
तुम्ह बिन खेवट को नहीं, अतिर तिरा नहिं जाइ।
औघट भेरा डूब है, नांही आन उपाइ ॥ 3 ॥
यहु घट औघट विषम है, डूबत मांहि शरीर ।
दादू कायर, राम बिन, मन नहिं बाँधै धीर ॥ 4 ॥
15. रंग ताल
क्यों हम जीवैं दास गुसाँई, जे तुम छाड़हु समर्थ साँई ॥ टेक ॥
जे तुम जन को मनहिं बिसारा, तो दूसर कौण संभालणहारा ॥ 1 ॥
जे तुम परिहर रहो नियारे, तो सेवक जाइ कवन के द्वारे ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
जे जन सेवक बहुत बिगारे, तो साहिब गरवा दोष निवारे ॥ ३ ॥
समर्थ साँई साहिब मेरा, दादू दास दीन है तेरा ॥ ४ ॥
16. करुणा । वीर विक्रम ताल
क्यों कर मिलै मोकौं राम गुसाँई, यहु बिषिया मेरे वश नांही ॥ टेक ॥
यहु मन मेरा दहदिशि धावै, नियरे राम न देखन पावे ॥ 1 ॥
जिह्वा स्वाद सबै रस लागे, इन्द्री भोग विषय को जागे ॥ 2 ॥
श्रवणहुँ साच कदे नहिं भावे, नैन रूप तहँ देख लुभावे ॥ 3 ॥
काम क्रोध कदे नहीं छीजे, लालच लाग विषय रस पीजे ॥ 4 ॥
दादू देख मिले क्यों साँई, विषय विकार बसे मन मांही ॥ 5 ॥
17. परिचय विनती । वीर विक्रम ताल
जो रे भाई ! राम दया नहीं करते ।
नवका नाम खेवट हरि आपै, यों बिन क्यों निस्तरते ॥ टेक ॥
करणी कठिन होत नहिं मोपै, क्यों कर ये दिन भरते ।
लालच लाग परत पावक में, आपहि आपै जरते ॥ 1 ॥
स्वाद हि संग विषय नहिं छूटै, मन निश्चल नहिं धरते ।
खाय हलाहल सुख के तांई, आपै ही पच मरते ॥ 2 ॥
मैं कामी कपटी क्रोध काया में, कूप परत नहिं डरते ।
करवत काम शीश धर अपने, आपहि आप विहरते ॥ 3 ॥
हरि अपना अंग आप नहिं छाड़ै, अपनी आप विचरते ।
पिता क्यों पूत को मारै, दादू यूं जन तिरते ॥ 4 ॥
18. विरह विलाप विनती । द्वितीय ताल
तो लग जनि मारे तूँ मोहि, जो लग मैं देखूं नहिं तोहि ॥ टेक ॥
अब के बिछुरे मिलन कैसे होइ, इहि विधि बहुरि न चिन्है कोइ ॥ 1 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
दीन दयाल दया कर जोइ, सब सुख आनंद तुम्ह तैं होइ ॥ 2 ॥
जन्म-जन्म के बन्धन खोइ, देखन दादू अहिनिशि रोइ ॥ 3 ॥
19. स्पर्श विनती । द्वितीय ताल
संग न छाडूं मेरा पावन पीव, मैं बलि तेरे जीवन जीव ॥ टेक ॥
संग तुम्हारे सब सुख होहि, चरण कमल मुख देखूं तोहि ॥ 1 ॥
अनेक जतन कर पाया सोइ, देखूं नैनहुँ तो सुख होइ ॥ 2 ॥
शरण तुम्हारी अंतर वास, चरण कमल तहँ देहु निवास ॥ 3 ॥
अब दादू मन अनत न जाइ, अंतर वेधि रह्यो ल्यौ लाइ ॥ 4 ॥
20. परिचय विनती (गुजराती भाषा) । त्रिताल
नहीं मेल्हूँ , राम ! नहीं मेल्हूँ ,
मैं शोधि लीधो नहीं मेल्हूँ, चित्त तुम्ह सूं बांधूं नहीं मेल्हूँ ॥ टेक ॥
हूँ तारे काजे तालाबेली, हवे केम मने जाशे मेल्ही ॥ 1 ॥
साहसि तूं ने मनसों गाढो, चरण समानों केवी पेरे काढो ॥ 2 ॥
राखिश हदे तूं मारो स्वामी, मैं दुहिले पाम्यों अंतरजामी ॥ 3 ॥
हवे न मेल्हूँ तूं स्वामी मारो, दादू सन्मुख सेवक तारो ॥ 4 ॥
21. परिचय करुणा विनती । दादरा
राम ! सुनहु न विपति हमारी हो, तेरी मूरति की बलिहारी हो ॥ टेक ॥
मैं जु चरण चित चाहना, तुम सेवक साधारना ॥ 1 ॥
तेरे दिन प्रति चरण दिखावना, कर दया अंतर आवना ॥ 2 ॥
जन दादू विपति सुनावना, तुम गोविन्द तपत बुझावना ॥ 3 ॥
22. परिचय विनती-प्रश्न । द्रुताली
कौण भांति भल मानैं गुसाँई, तुम्ह भावे सो मैं जानत नांहीं ॥ टेक ॥
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