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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1

फंध्यो न जानै वन के चाइ, दादू स्वाद बंधानो आइ ॥ ३ ॥
३३. मन प्रति उपदेस निसारुक ताल
काहे रे मन राम विसारै, मनखा जन्म जाय जिय हारै ॥ टेक॥
मात पिता को बन्धन भाई, सब ही सपना कहा सगाई ॥ १ ॥
तन धन जोबन झूठा जाणी, राम हृदय धर सारंग प्राणी ॥ २ ॥
चंचल चितवत झूठी माया, काहे न चेतै सो दिन आया ॥ ३ ॥
दादू तन मन झूठा कहिये, राम चरण गह काहे न रहिये ॥ ४ ॥
३४. मनुष्य देह महात्म्य । झपताल
ऐसा जनम अमोलिक भाई, जामें आइ मिलै राम राई ॥ टेक॥
जामें प्राण प्रेम रस पीवै, सदा सुहाग सेज सुख जीवै ॥ १ ॥
आत्मा आइ राम सौं राती, अखिल अमर धन पावै थाती ॥ २ ॥
प्रकट दर्शन परसन पावै, परम पुरुष मिलि मांहि समावै ॥ ३ ॥
ऐसा जन्म नहीं नर आवै, सो क्यों दादू रतन गँवावै ॥ ४ ॥
३५. परिचय सत्संग । दीपचन्दी ताल
सत्संगति मगन पाइये, गुरु प्रसादैं राम गाइये ॥ टेक॥
आकाश धरणी धरीजे, धरणी आकाश कीजे, शून्य माहिं निरख लीजे ॥ १ ॥
निरख मुक्ताहल मांहैं साइर आयो, अपने पिया हौं ध्यावत खोजत पायौ ॥ २ ॥
सोच साइर अगोचर लहिये, देव देहुरे मांही कवन कहिये ॥ ३ ॥
हरि को हितार्थ ऐसो लखै न कोई, दादू जे पीव पावै अमर होई ॥ ४ ॥
३६. उपदेश चेतावनी । एकताल
कौण जनम कहँ जाता है, अरे भाई, राम छाड़ि कहाँ राता है ॥ टेक॥
मैं मैं मेरी इन सौं लाग, स्वाद पतंग न सूझै आग ॥ १ ॥

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