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सर्वकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 504 में से

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पृष्ठ 326

श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
दादू सबै दिशा सो सारिखा, सबै दिशा मुख बैन।
सबै दिशा श्रवणहुँ सुनै, सबै दिशा कर नैन ॥ 1 ॥
सबै दिशा पग शीश हैं, सबै दिशा मन चैन।
सबै दिशा सन्मुख रहै, सबै दिशा अंग ऐन ॥ 2 ॥
ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात।
सभूमिं सर्वतः वत्वा अत्र तिष्ठ दशांगुलम् ॥
57. प्रश्न । पंजाबी त्रिताल
अलख देव गुरु ! देहु बताइ, कहाँ रहो त्रिभुवनपति राइ ॥ टेक ॥
धरती गगन बसहु कैलास, तिहूँ लोक में कहाँ निवास ॥ 1 ॥
जल थल पावक पवनां पूर, चंद सूर निकट कै दूर ॥ 2 ॥
मंदिर कौण, कौण घरबार, आसण कौण कहो करतार ॥ 3 ॥
अलख देव ! गति लखी न जाइ, दादू पूछै कहि समझाइ ॥ 4 ॥
उत्तर की साखी
दादू मुझ ही मांहीं मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार।
मुझ ही मांहीं मैं बसूं, आप कहै करतार ॥ 1 ॥
दादू मैं ही मेरा अर्श में,मैं ही मेरा स्थान।
मैं ही मेरी ठौर में, आप कहै रहमान ॥ 2 ॥
दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार।
मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥ 3 ॥
दादू मैं ही मेरी जाति में, मैं ही मेरा अंग।
मैं ही मेरा जीव में, आप कहै प्रसंग ॥ 4 ॥
58. रस त्रिताल
राम रस मीठा रे, कोई पीवै साधु सुजाण।
सदा रस पीवै प्रेम सौं, सो अविनाशी प्राण ॥ टेक ॥

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