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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
24. उपदेश चेतावनी । एकताल
कैसे जीविये रे, साँई संग न पास ?
चंचल मन निश्चल नहीं, निशिदिन फिरे उदास ॥ टेक ॥
नेह नहीं रे राम का, प्रीति नहीं परकाश ।
साहिब का सुमिरण नहीं, करे मिलन की आश ॥ 1 ॥
जिस देखे तूँ फूलिया रे, पाणी पिंड बधाणां मांस ।
सो भी जल-बल जाइगा, झूठा भोग विलास ॥ 2 ॥
तो जीवीजे जीवणां, सुमरै श्वासै श्वास ।
दादू प्रकट पीव मिलै, तो अंतर होइ उजास ॥ 3 ॥
25. हितोपदेश । चटताल
जियरा मेरे सुमिर सार, काम क्रोध मद तज विकार ॥ टेक ॥
तूँ जनि भूले मन गँवार, शिर भार न लीजे मान हार ॥ 1 ॥
सुन समझायो बार-बार, अजहूँ न चेतै, हो हुसियार ॥ 2 ॥
कर तैसे भव तिरिये पार, दादू अब तैं यही विचार ॥ 3 ॥
26. (क)-भय चेतावनी । त्रिताल
जियरा, चेत रे जनि जारे ।
हे जैं हरि सौं प्रीति न कीन्ही, जन्मअमोलक हारे ॥ टेक ॥
बेर बेर समझायो रे जियरा, अचेत न होइ गंवारे ।
यहु तन है कागद की गुड़िया, कछु इक चेत विचारे ॥ 1 ॥
तिल तिल तुझको हानि होत है, जे पल राम बिसारे ।
भय भारी दादू के जिय में, कहु कैसे कर डारे ॥ 2 ॥
26 (ख) पंजाबी त्रिताल
जियरा काहे रे मूढ डोले ?
वनवासी लाला पुकारे, तूँही तूँही कर बोले ॥ टेक ॥

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