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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 504 में से

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पृष्ठ 315

श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1


आवत हैं सब जाता दीसैं, इनमें तेरा नाहीं ।
इन सौं लाग जन्म जनि खोवै, शोधि देख सचु मांहीं ॥ 3 ॥
निहचल सौं मन मानैं मेरा, साँई सौं बन आई ।
दादू एक तुम्हारा साजन, जिन यहु भुरकी लाई ॥ 4 ॥

३०. उपदेश चेतावनी । त्रिताल
का जिवना का मरणा रे भाई, जो तैं राम न रमसि अघाई ॥ टेक ॥
का सुख संपत्ति छत्रपति राजा, वनखंड जाइ बसे किहिं काजा ॥ 1 ॥
का विद्या गुन पाठ पुराना, का मूरख जो तैं राम न जाना ॥ 2 ॥
का आसन कर अहर्निशि जागे, का फिर सोवत राम न लागे ॥ 3 ॥
का मुक्ता, का बंधे होई, दादू राम न जाना सोई ॥ 4 ॥

३१. मन प्रबोध । पंजाबी त्रिताल
मन रे राम बिना तन छीजे ।
जब यहु जाइ मिलै माटी में, तब कहु कैसे कीजै ॥ टेक ॥
पारस परस कंचन कर लीजे, सहज सुरति सुखदाई ।
माया बेलि विषय फल लागे, ता पर भूल न भाई ॥ 1 ॥
जब लग प्राण पिंड है नीका, तब लग ताहि जनि भूलै ।
यहु संसार सेमल के सुख ज्यों, ता पर तूँ जनि फूलै ॥ 2 ॥
अवसर यह जान जगजीवन, समझ देख सचु पावै ।
अंग अनेक आन मत भूलै, दादू जनि डहकावै ॥ 3 ॥

३२. मृगोक्ति उपदेश। झपताल
मोह्यो मृग देख वन अंधा, सूझत नहीं काल के फंधा ॥ टेक ॥
फूल्यो फिरत सकल वन मांही, सिर साधे शर सूझत नांही ॥ 1 ॥
उदमद मातो वन के ठाट, छाड़ चल्यो सब बारह बाट ॥ 2 ॥

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