सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
70. पंजाबी त्रिताल
ऐसा ज्ञान कथो मन ज्ञानी, इहि घर होइ सहज सुख जानी ॥ टेक ॥
गंग जमुन तहँ नीर नहाई, सुषमन नारी रंग लगाई ॥ 1 ॥
आप तेज तन रह्यो समाइ, मैं बलि ताकी देखूँ अघाइ ॥ 2 ॥
वास निरन्तर सो समझाइ, बिन नैनहुँ देखूँ तहाँ जाइ ॥ 3 ॥
दादू रे यहु अगम अपार, सो धन मेरे अधर अधार ॥ 4 ॥
71. परिचय सत्संग । पंजाबी त्रिताल
अब तो ऐसी बन आई, राम-चरण बिन रह्यो न जाई ॥ टेक ॥
साँई को मिलबे के कारण, त्रिकुटी संगम नीर नहाई ।
चरण-कमल की तहँ ल्यौ लागै, जतन जतन कर प्रीति बनाई ॥ 1 ॥
जे रस भीना छावर जावै, सुन्दरी सहजैं संग समाई ।
अनहद बाजे बाजन लागे, जिह्वाहीणैं कीरति गाई ॥ 2 ॥
कहा कहूँ कुछ वरणि न जाई, अविगति अंतर ज्योति जगाई ।
दादू उनको मरम न जानै, आप सुरंगे बैन बजाई ॥ 3 ॥
72. राज मृगांक ताल
नीके राम कहत है बपुरा ।
घर मांही घर निर्मल राखै, पंचों धोवै काया कपरा ॥ टेक ॥
सहज समर्पण सुमिरण सेवा, तिरवेणी तट संजम सपरा ।
सुन्दरी सन्मुख जागण लागी, तहँ मोहन मेरा मन पकरा ॥ 1 ॥
बिन रसना मोहन गुण गावै, नाना वाणी अनुभव अपरा ।
दादू अनहद ऐसे कहिये, भक्ति तत्त यहु मारग सकरा ॥ 2 ॥
73. मनसा गायत्री। राज मृगांक ताल
अवधू ! कामधेनु गहि राखी,
वश कीन्हीं तब अमृत स्रवै, आगै चार न नाखी ॥ टेक ॥
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