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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 504 में से

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पृष्ठ 317

श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
विषया सौं रत गर्व गुमान, कुंजर काम बँधे अभिमान ॥ 2 ॥
लोभ मोह मद माया फंध, ज्यों जल मीन न चेतै अंध ॥ 3 ॥
दादू यहु तन यों ही जाइ, राम विमुख मर गये विलाइ ॥ 4 ॥
37 एकताल
मन मूरखा, तैं क्या किया ? कुछ पीव कारण वैराग न लिया,
रे तैं जप तप साधी क्या दिया ॥ टेक ॥
रे तैं करवत काशी कद सह्या, रे तूँ गंगा माहीं न बह्या,
रे तैं विरहनी ज्यों दुख ना सह्या ॥ 1 ॥
रे तैं पालै पर्वत ना गल्या, रे तैं आप ही आपा ना दह्या,
रे तैं पीव पुकारी कद कह्या ॥ 2 ॥
होइ प्यासे हरि जल ना पिया, रे तूँ वज्र न फाटो रे हिया।
धिक् जीवन दादू ये जिया ॥ 3 ॥
३४. यतिताल
क्या कीजै मनिखा जन्म को, राम न जपहि गँवारा रे ?
माया के मद मातो बहे, भूल रह्या संसारा रे ॥ टेक ॥
हिरदै राम न आवई, आवै विषय विकारा रे।
हरि मारग सूझै नहीं, कूप परत नहीं बारा रे ॥ 1 ॥
आपा अग्नि जु आप में, तातैं अहिनिशि जरै शरीरा रे।
भाव भक्ति भावै नहीं, पीवै न हरि जल नीरा रे ॥ 2 ॥
मैं मेरी सब सूझई, सूझै माया जालो रे।
राम नाम सूझै नहीं, अंध न सूझै कालो रे ॥ 3 ॥
ऐसैं ही जन्म गमाइया, जित आया तित जाये रे।
राम रसायन ना पिया, जन दादू हेत लगाये रे ॥ 4 ॥

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