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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 504 में से

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पृष्ठ 330

श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
67. परिचय हैरान । नटताल
ऐसो खेल बन्यो मेरी माई, कैसे कहूँ कछु जान्यो न जाई ॥ टेक ॥
सुर नर मुनिजन अचरज आई, राम-चरण को भेद न पाई ॥ 1 ॥
मंदिर माहिं सुरति समाई, कोऊ है सो देहु दिखाई ॥ 2 ॥
मनहिं विचार करहु ल्यौ लाई, दिवा समान कहाँ ज्योति छिपाई ॥ 3 ॥
देह निरंतर शून्य ल्यौ लाई, तहं कौण रमे कौण सूता रे भाई ॥ 4 ॥
दादू न जाणै ये चतुराई, सोइ गुरु मेरा जिन सुधि पाई ॥ 5 ॥
68. निज घर परिचय । पंचम ताल
भाई रे घर ही में घर पाया ।
सहज समाइ रह्यो ता मांही, सतगुरु खोज बताया ॥ टेक ॥
ता घर काज सबै फिर आया, आपै आप लखाया ।
खोल कपाट महल के दीन्हें, स्थिर सुस्थान दिखाया ॥ 1 ॥
भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया ।
पिंड परे जहाँ जिव जावै, ता में सहज समाया ॥ 2 ॥
निश्चल सदा चलै नहिं कबहुँ, देख्या सब में सोई ।
ताही सौं मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥ 3 ॥
आदि अनन्त सोई घर पाया, अब मन अनत न जाई ।
दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥ 4 ॥
69. मानस तीर्थ । पंचम ताल
इत है नीर नहावन जोग, अनत हि भ्रम भूला रे लोग ॥ टेक ॥
तिहिं तट न्हाये निर्मल होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ ॥ 1 ॥
सुघट घाट अरु तिरबो तीर, बैठे तहाँ जगत-गुरु पीर ॥ 2 ॥
दादू न जाणै तिन का भेव, आप लखावै अंतर देव ॥ 3 ॥

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