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बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

उल्कालक्षणाध्यायः ४२७
यह प्रेत, शस्त्र, गदहा, ऊँट, नाक, बन्दर, दंष्ट्री (सूअर आदि), हल, मृग, गोह, साँप,
धूम के समान या दो शिर वाली होती है। ये सब पाप फल देने वाली होती हैं।।९।।
प्रेतः शवः। प्रहरणं खड्गादि। खरो गर्दभः। करभ उष्ट्रः। नक्रो जलप्राणी। कपि-
र्वानरः। दंष्ट्रिणो वराहादयः। लाङ्गलं हलम्। मृग आरण्यप्राणी। एषां सदृश्यः। तथा
गोधा प्राणिविशेषः। अहिः सर्पः। धूमः प्रसिद्धः। एषां सदृशरूपाः। एताः सर्वाः पापाः।
अनिष्टफला इत्यर्थः। या चोभयशिरस्का द्विशीर्षा सापि पापैव।।९।।
पुनरप्याह—
ध्वजझषगिरिकरिकमलेन्दुतुरंगसन्तप्तरजतहंसाभाः।
श्रीवृक्षवज्रशङ्खस्वस्तिकरूपाः शिवसुभिक्षाः ।।१०।।
ध्वज, मत्स्य, हाथी, पर्वत, कमल, चन्द्रमा, घोड़ा, तपी हुई चाँदी, हंस, श्रीवृक्ष
(नारियल), वज्र (हीरा या शस्त्र), शंख या स्वस्तिक (राजगृह की तरह) रूप
वाली उल्का दिखाई दे तो लोगों का कुशल और सुभिक्ष करती है।।१०।।
एवंविधाः सर्वाः शिवसुभिक्षाः, शिवं श्रेयः सुभिक्षं च कुर्वन्ति। कीदृश्यः ? ध्वजः
पताकाकृतिर्बहुपटविरचितः। झषो मीनः। गिरिः पर्वतः। करी हस्ती। कमलं पद्मम्।
इन्दुश्चन्द्रः। तुरगोऽश्वः। सन्तप्तरजतं गलितरौप्यम्। हंसः पक्षी। एतदाभाः एषां सदृश्यः।
तथा श्रीवृक्षः प्रसिद्धः। वज्रं हीरकं वज्रमायुधं वा। शङ्खः प्रसिद्धः। स्वस्तिकः संस्थानविशेषः।
एवंविधाश्चापि शिवसुभिक्षाः। तथा च काश्यपः—
नरेभतुरगवाश्मवृक्षेषु च पतेत् सदा।
ज्वलन्ती चक्रवद् दृश्या त्वशनी रावसंयुता।।
विद्युत्त्रासकरी भीमा शब्दयन्ती तटत्तटा।
बृहच्छीर्षाऽतिसूक्ष्मा च जीवेषु च पतेत्सदा।।
धनूंषि दश या दृश्या सा च धिष्ण्या प्रकीर्तिता।
ज्वलिताङ्गारसदृशी द्वौ हस्तौ सा प्रमाणतः।।
पञ्चताम्राकृतिश्चैव हस्तमात्रायता गता।
तिर्यगूर्ध्वमधो याति दह्यमानेव तारका।।
उल्का मूर्धनि विस्तीर्णा पतन्ती वर्धते तु सा।
तनुपुच्छा नृमात्रा तु बहुभेदसमावृता।।
आयुधप्रेतसदृशी जम्बुकोष्ट्रखराकृतिः।
धूम्रवर्णा तु पापाख्या विशीर्णा या तु मध्यमा।।
ध्वजपद्मेभहंसाभा पर्वताश्वसमप्रभा।
श्रीवृक्षशङ्खसदृशी या चोल्का सा शिवप्रदा।। इति।।१०।।
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४२८ बृहत्संहिता

अन्यदपि लक्षणमाह—
अम्बरमध्याद् बह्वयो निपतन्त्यो राजराष्ट्रनाशाय।
बम्भ्रमती गगनोपरि विभ्रममाख्याति लोकस्य ॥११॥
आकाश मध्य में बहुत तरह की होकर गिरती हुई उल्का राजा और राष्ट्र के नाश के
लिये होती है तथा जो उल्का आकाश में बार-बार भ्रमण करती है, वह लोगों की विपत्ति
को व्यक्त करती है॥११॥
अम्बरमध्यान्नभोऽन्तः। बह्व्यः प्रभूता अपि निपतन्त्यः सम्पत्तमाना राज्ञो नृपस्य
राष्ट्रस्य जनपदस्य च नाशाय भवन्ति। तथा च गगनोपरि आकाशे योल्का बम्भ्रमती अत्यर्थं
भ्रमति सा लोकस्य जनपदस्य विभ्रमं सम्भ्रममाकुलतामाख्याति कथयति॥११॥
अन्यदप्याह—
संस्पृशती चन्द्रार्कौ तद्विसृता वा सभूकम्पा च।
परचक्रागमनृपभयदुर्भिक्षावृष्टिभयजननी ॥१२॥
जो उल्का सूर्य या चन्द्र को स्पर्श करती है अथवा सूर्य या चन्द्र से निकल कर
भूकम्प करती हुई गिरती है, वह दूसरे राजा का आगमन, राजभय, दुर्भिक्ष और अवृष्टि
करती है।
योल्का चन्द्रार्कौ शशिसूर्यौ संस्पृशती। तौ संस्पृशति। तद्विसृता वा ताभ्यां चन्द्रा-
र्काभ्यां विसृता निर्गता। सभूकम्पा च भूकम्पसहिता। तस्याः पतमानाया भूकम्पमुत्पद्यते।
सा तथाभूता परचक्रागमं परचक्रस्यागमनम्। नृपभयं राजभयम्। दुर्भिक्षभयम्। अवृष्टिभयं
च जनयत्युत्पादयति॥१२॥
अन्यदप्याह—
पौरेतरघ्नमुल्कापसव्यकरणं दिवाकरहिमांश्वोः ।
उल्का शुभदा पुरतो दिवाकरविनिःसृता यातुः ॥१३॥
यदि उल्का सूर्य और चन्द्रमा के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे तो क्रम से पुर में रहने
वाले और बाहर रहने वाले का नाश करती है। जैसे—सूर्य के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे
तो पुरवासियों का और चन्द्र के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे तो बाहर रहने वालों का नाश
करती है। जो उल्का सूर्यकिरण से निकल कर गमन करने वालों के आगे गिरती है, वह
शुभ फल देने वाली होती है॥१३॥
दिवाकरहिमांश्वोरर्कचन्द्रयोः। उल्कापसव्यकरणम्। तयोरेवापसव्येन प्रदक्षिणेन गमनं
करोति। तत्पौरेतरघ्नम्, दिवाकरस्यापसव्यकरणं पौरघ्नं पौरान्नागरान् हन्ति। हिमांशोरुल्का-
पसव्यकरणमितरघ्नम्, इतरे यायिनस्तान् हन्ति। या च दिवाकरविनिःसृता दिवाकरात्
सूर्यान्निर्गता सा यातुर्जिगमिषोः पुरतोऽग्रतः पतिता शुभदा शुभं ददाति॥१३॥
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उल्कालक्षणाध्यायः ४२९
अन्यदप्याह—
शुक्ला रक्ता पीता कृष्णा चोल्का द्विजादिवर्णघ्नी।
क्रमशश्चैतान् हन्युर्मूर्धोरःपार्श्वपुच्छस्थाः ॥१४॥
सफेद, लाल, पीली और काली उल्का क्रम से ब्राह्मण आदि वर्णों का नाश करने
वाली होती है। जैसे—सफेद उल्का ब्राह्मणों का, लाल क्षत्रियों का, पीली वैश्यों का और
काली शूद्रों का नाश करती है तथा जो शिर से ठहरती है वह ब्राह्मणों का, जो बगल से
ठहरती है वह वैश्यों का एवं जो पूँछ से ठहरती है, वह शूद्रों का नाश करती है॥१४॥
शुक्लाद्या उल्का। क्रमशः परिपाट्या द्विजादिवर्णघ्नी द्विजाद्यान् ब्राह्मणाद्यान् वर्णांश्चतुरो
हन्ति घातयति। तद्यथा—शुक्ला ब्राह्मणान् हन्ति। रक्ता क्षत्रियान्। पीता वैश्यान्। कृष्णा
शूद्रान् इति। तथा मूर्धोरःपार्श्वपुच्छस्था उल्का एतानेव हन्युः। मूर्ध्ना तिष्ठतीति मूर्धस्था।
शिरसा या पतति सा ब्राह्मणान् हन्ति। एवमुरसा तिष्ठतीति उरःस्था वक्षस्था या पतति
सा क्षत्रियान्। पार्श्वाभ्यां तिष्ठतीति पार्श्वस्था सा वैश्यान्। पुच्छेन तिष्ठतीति पुच्छस्था सा
शूद्रान् हन्ति॥१४॥
अन्यदप्याह—
उत्तरदिगादिपतिता विप्रादीनामनिष्टदा रूक्षा।
ऋज्वी स्निग्धाखण्डा नीचोपगता च तद्वृद्ध्यै ॥१५॥
उत्तर आदि दिशाओं में पतित उल्का क्रम से ब्राह्मण आदि वर्णों को अशुभ फल देती
है। जैसे— उत्तर दिशा में गिरे तो ब्राह्मणों को, पूर्व में गिरे तो क्षत्रियों को, दक्षिण में गिरे
तो वैश्यों को और पश्चिम में गिरे तो शूद्रों को अशुभ फल देती है। यदि वह उल्का सीधी,
चिकनी, अखण्ड और आकाश के नीचे भाग में जाने वाली हो तो ब्राह्मण आदि वर्णों की
वृद्धि करती है॥१५॥
उत्तरदिगादिपतिता रूक्षा विप्रादीनां ब्राह्मणादीनां वर्णानामनिष्टदा अशुभदा। उत्तरस्यां
पतति सा ब्राह्मणानाम्। पूर्वस्यां क्षत्रियाणाम्। दक्षिणस्यां वैश्यानाम्। पश्चिमायां शूद्राणामिति।
तथा ऋज्वी या स्पष्टा स्निग्धा निर्मला अखण्डाऽशकला नीचोपगता नभसोऽधोगामिनी।
सा तद्वृद्ध्यै, तेषामेव ब्राह्मणादीनामुत्तरदिगादिपतिता वृद्ध्यै वृद्धये भवति॥१५॥
अन्यदप्याह—
श्वावारुणनीलासृग्दहनासितभस्मसन्निभा रूक्षा।
सन्ध्यादिनजा वक्रा दलिता च परागमभयाय ॥१६॥
श्याव (वानर के समान = 'श्यावः स्यात् कपिश' इत्यमरः), रक्त, नील, रुधिर
के समान, अग्नि के समान काली, भस्म की तरह, रूक्ष, सन्ध्याकाल में उत्पन्न, दिन में
उत्पन्न वक्र या खण्डित उल्का पुरवासियों को शत्रु के आगमन से भय कराती है।

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४३० बृहत्संहिता
श्यावा श्याववर्णा। अरुणा रक्ता। नीला नीलवर्णा। असृग्रुधिरं तद्वर्णा। दहनसन्निभा
अग्निवर्णा। असितसन्निभा कृष्णा। भस्मसन्निभा भस्मवर्णा। रूक्षा अनिर्मला। सन्ध्यादिनजा
सन्ध्याया दिने च जाता। वक्रा कुटिला। दलिता खण्डिता। एवंविधा परागमभयाय भवति।
पराणां शत्रूणामागमाद्यद् भयं तत् करोति॥१६॥
अन्यदप्याह—
नक्षत्रग्रहघातैस्तद्भक्तीनां क्षयाय निर्दिष्टा।
उदये घ्नती रवीन्दू पौरेतरमृत्यवेऽस्ते वा॥१७॥
यदि उल्का नक्षत्र या ग्रह का उपघात करे तो नक्षत्र व्यूह में उक्त उस नक्षत्र या ग्रह
के भक्तियों का नाश करती है। यदि सूर्य या चन्द्र को उदय या अस्त समय में हनन करे
तो क्रम से पुरवासियों और बाहर रहने वालों का नाश करती है। जैसे—सूर्य हत हो तो
पुरवासियों का और चन्द्र हत हो तो बाहर रहने वालों का नाश करती है॥१७॥
नक्षत्रोपघातैर्ग्रहोपघातैश्च तद्भक्तीनां नक्षत्राणां नक्षत्रव्यूहे ग्रहाणां च या भक्त्य उक्तास्तासां
क्षयाय विनाशाय निर्दिष्टा कथिता उक्ता। तथा च काश्यपः—
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव यद्युल्काध्वस्तधूमिताः।
तद्देशनाथनाशाय लोकानां सम्भ्रमाय च॥
तथा च समाससंहितायाम्—
उदगादिषु विप्रादीन् सितलोहितकृष्णवर्णांश्च।
घ्नन्ति ग्रहर्क्षघातैस्तद्भक्तीनां च नाशाय॥
रवीन्दू सूर्य्याचन्द्रमसौ उदये उदयसमये अस्ते अस्तसमये वा घ्नती पौरेतराणां मृत्यवे
भवति। पौरा नागराः। इतरे यायिनः। आदित्ये हते पौराणां चन्द्रे च यायिनामिति॥१७॥
अथ नक्षत्रोपतापेन फलमाह—
भाग्यादित्यधनिष्ठामूलेषूल्काहतेषु युवतीनाम्।
विप्रक्षत्रियपीडा पुष्यानिलविष्णुदेवेषु ॥१८॥
ध्रुवसौम्येषु नृपाणामुग्रेषु सदारुणेषु चौराणाम्।
क्षिप्रेषु कलाविदुषां पीडा साधारणे च हते ॥१९॥
पूर्वफल्गुनी, पुनर्वसु, धनिष्ठा या मूल नक्षत्र की योगतारा यदि उल्का से हत हो तो
युवती स्त्रियों को पीड़ा होती है। पुष्य, स्वाती या श्रवण नक्षत्र की योगतारा यदि उल्का
से हत हो तो ब्राह्मण और क्षत्रियों को पीड़ा होती है।
उत्तरफल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तरभाद्रपदा, रोहिणी, मृगशिर, चित्रा, अनुराधा या रेवती
नक्षत्र की योगतारा यदि उल्का से हत हो तो राजाओं को पीड़ा होती है। पूर्वफल्गुनी,
पूर्वाषाढा, पूर्वभाद्रपदा, भरणी, मघा, आर्द्रा, श्लेषा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र की योगतारा
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उल्कालक्षणाध्यायः ४३१
यदि उल्का से हत हो तो चोरों को पीड़ा होती है तथा अश्विनी, हस्त, अभिजित्, कृत्तिका
या विशाखा नक्षत्र की योगतारा यदि उल्का से हत हो तो कलाओं को जानने वालों को
पीड़ा होती है।।१८-१९।।
भाग्यं पूर्वफल्गुनी। आदित्यं पुनर्वसुः। धनिष्ठा। मूलम्। एतेषु नक्षत्रेषूल्काहतेषूल्कया
ताडितेषु। एतेषां योगतारा यद्युल्काहता भवति तदा युवतीनां स्त्रीणां पीडा भवति। तथा
पुष्यः। अनिलः स्वातिः। विष्णुदेवः श्रवणम्। एतेषूल्काहतेषु विप्राणां क्षत्रियाणां च पीडा
भवति।
रोहिण्युत्तराक्ष्यं ध्रुवाणि। मृगशिरश्चित्रानुराधा रेवतीति सौम्यानि मृदूनित्यर्थः। एतेषूल्काहतेषु
नृपाणां राज्ञां पीडा भवति। पूर्वत्रयं भरणी मघा च उग्राणि। आर्द्राश्लेषा-ज्येष्ठामूलानि
दारुणानि। एतेषूल्काहतेषु चौराणां तस्कराणां पीडा भवति। अश्विनी तिष्यं हस्तोऽभिजिदिति
क्षिप्राणि कृत्तिका विशाखा साधारणं तेषूल्काहतेषु कलाविदुषां कला-विषये गीतनृत्यचित्रवाद्ये
ये पण्डितास्तेषां पीडा भवति।।१८-१९।।
अन्यदप्याह—
कुर्वन्त्येताः पतिता देवप्रतिमासु राजराष्ट्रभयम्।
शक्रोपरि नृपतीनां गृहेषु तत्स्वामिनां पीडाम् ॥२०॥
आशाग्रहोपघाते तद्देश्यानां खले कृषिरतानाम्।
चैत्यतरौ सम्पतिता सत्कृतपीडां करोत्युल्का ॥२१॥
द्वारि पुरस्य पुरक्षयमथेन्द्रकीले जनक्षयोऽभिहितः।
ब्रह्मायतने विप्रान् विनिहन्याद् गोमिनो गोष्ठे ॥२२॥
उल्का यदि देवता की मूर्ति पर गिरे तो राजा और राष्ट्र को भय, इन्द्र के ऊपर गिरे
तो राजाओं को भय और घर पर गिरे तो गृहपति को पीड़ित करता है। दिक्पति ग्रह यदि
उल्का से हत हों तो उस दिशा में रहने वाले मनुष्यों को, खलिहान में गिरे तो किसानों को
और छोटे मन्दिर के पास स्थित वृक्ष पर उल्का गिरे तो पूज्य व्यक्तियों को पीड़ित करता
है। पुरद्वार पर यदि उल्का गिरे तो पुर का, द्वार के किवाड़ पर गिरे तो पुरवासियों का,
ब्रह्मा के मन्दिर पर गिरे तो ब्राह्मणों का और गोष्ठ ( गायों के स्थान = गोठ ) पर गिरे तो
गायों का पालन करने वालों का नाश करती है॥२०-२२॥
कुर्वन्त्येता इति। एता उल्का देवप्रतिमासु सुरार्चासु पतिता राजभयं नृपभयं राष्ट्रभयं
जनपदभयं च कुर्वन्ति। शक्र इन्द्रस्तस्योपरि पतिता नृपतीनां राज्ञां भयं कुर्वन्ति। गृहेषु
वेश्मसु पतितास्तत्स्वामिनां गृहपतीनां पीडां कुर्वन्ति।
आशा दिशः। ग्रहाः सूर्यादयः। आशाग्रहा दिक्पतयो ग्रहाः। ते च—'प्रागाद्या
रविशुक्ललोहिततमः सौरेन्दुवित्सूरयः' इत्युक्तास्तेषामुपघाते उल्कापीडने तद्देश्यानां तद्दिग्नि-
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४३२ बृहत्संहिता
वासिनां तस्यां दिशि ये जना निवसन्ति तेषां पीडां कुर्वन्ति। अथवा आशा दिशस्तासां
यान्ति तद्देशयानां ग्रहदेशनिवासिनाम्। खले कृषिरतानाम्। खलमूलूखा यत्र धान्यं स्थाप्यते
तदुपघाते कृषिरतानां कृषिजीविनां पीडा भवति। चैत्यतरुः प्रधानवृक्षः। तत्र पतितोल्का
सत्कृतानां पूजितानां पीडां करोति।
पुरस्य द्वारि पतिता पुरक्षयं पुरविनाशं करोति। अथेन्द्रकीले द्वारार्गले पतिता तदा
जनानां क्षयोऽभिहित उक्तः। जननाशो भवति। ब्रह्मायतने पितामहो यत्र देवस्तत्र पतिता
विप्रान् ब्राह्मणान् विनिहन्याद् घातयेत्। गोष्ठे गोस्थाने यत्र गावो निवसन्ति तत्र पतिता
गोमिनो गावो येषां सन्ति तान् विनिहन्यान्नाशयेदिति।।२०-२२।।
अथान्यद्विशेषमाह—
क्ष्वेडास्फोटितवादितगीतोत्कृष्टस्वना भवन्ति यदा।
उल्कानिपातसमये भयाय राष्ट्रस्य सनृपस्य ॥२३॥
यदि उल्कापात के समय में क्ष्वेडा (वीरों का गर्जन = 'क्ष्वेडा तु सिंहनादः
स्या'दित्यमरः), आस्फोटित (छाती पर एक भुजा रखकर दूसरे हाथ से ताडन का
शब्द), वाद्य और गान का उद्घोषित शब्द हो तो राजा और राष्ट्र दोनों को भय के लिये
होता है।।२३।।
क्ष्वेडा क्ष्वेडितम्। आस्फोटितं करास्फोटः। वक्षःस्थस्य बाहोर्द्वितीयेन हस्तेन ताडनं
करास्फोटः। वादितं वाद्यशब्दः। गीतं प्रसिद्धम्। एषामुत्कृष्टा उद्घोषिताः स्वनाः शब्दा
यदा भवन्ति, कदा? उल्कानिपातसमये, उल्कानिपातकाले, तदा राष्ट्रस्य सनृपस्य नृपति-
सहितस्य भयाय भवन्ति।।२३।।
अन्यदप्याह—
यस्याश्चिरं तिष्ठति खेऽनुषङ्गो दण्डाकृतिः सा नृपतेर्भयाय।
या चोह्यते तन्तुधृतेव खस्था या वा महेन्द्रध्वजतुल्यररूपा ॥२४॥
जिस उल्का की आसक्ति आकाश में अधिक देर तक रहे, जो दण्डाकार दिखाई दे,
जो आकाश में डोरी से बँधी हुई की तरह स्थिर रहे, जो इन्द्रधनुष की तरह दिखाई दे वह
सब राजभय के लिये होती है।।२४।।
यस्या उल्कायाः खे नभसि। चिरं चिरकालम्। अनुषङ्ग आसक्तिस्तिष्ठति। तथा
दण्डाकृतिर्दण्डाकारा च या दृश्यते सा नृपते राज्ञो भयाय भवति। या चोल्का खस्था
आकाशस्थिता तन्तुधृतेव, तन्तुना ध्रियमाणेनेवोह्यते धार्यते सापि नृपतेर्भयाय भवति।
या च महेन्द्रध्वजस्येन्द्रचिह्नस्य तुल्यरूपा तदाकारा सापि नृपतेर्भयाय भवति।।२४।।
अन्यदप्याह—
श्रेष्ठिनः प्रतीपगा तिर्यगा नृपाङ्गनानाम्।
हन्त्यधोमुखी नृपान् ब्राह्मणानथोर्ध्वगा ॥२५॥
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उल्कालक्षणाध्यायः ४३३
बर्हिपुच्छरूपिणी लोकसंक्षयावहा।
सर्पवत् प्रसर्पती योषितामनिष्टदा॥२६॥
हन्ति मण्डला पुरं छत्रवत् पुरोहितम्।
वंशगुल्मवत् स्थिता राष्ट्रदोषकारिणी॥२७॥
व्यालसूकरोपमा विस्फुलिङ्गमालिनी।
खण्डशोऽथवा गता सस्वना च पापदा॥२८॥
विपरीत ( जहाँ से आयी हो वहाँ ही लौट ) जाने वाली उल्का सेठों का, तिरछी
चलने वाली रानियों का, नीचे मुख वाली राजाओं का और ऊपर जाने वाली उल्का
ब्राह्मणों का नाश करती है। जो उल्का मोरपूँछ की तरह हो, वह लोगों का नाश करती है
और जो सर्प की तरह चलती है, वह स्त्रियों को अशुभ फल देने वाली होती है।
मण्डलाकृति वाली उल्का नगर का और छत्राकृति वाली पुरोहित का नाश करती है तथा
वंशगुल्माकारा ( बाँस की बीड़ के समान वाली ) उल्का राष्ट्रभय करती है। सर्प या
सूअर की तरह चिनगारियों की माला पहनी हुई ( चिनगारियों से व्याप्त शरीर वाली ),
खण्ड-खण्ड और शब्दसहित उल्का पाप फल देने वाली होती है॥२५-२८॥
या प्रतीपगा यत आगता तत्रैव गता सा श्रेष्ठिनो हन्ति। तिर्यगा तिर्यक्कृत्वा या
गता सा नृपाङ्गनां नृपस्त्रियं हन्ति। अधोमुखी अवाग्वदना नृपान् राज्ञो हन्ति। अथानन्तर-
मूर्ध्वगा ऊर्ध्वगामिनी ब्राह्मणान् द्विजान् हन्ति।
या चोल्का बर्हिपुच्छरूपिणी मयूरपुच्छाकारा सा लोकसंक्षयावहा, लोकानां जनानां
संक्षयं विनाशमावहति करोति। या च सर्पवत् प्रसर्पती उरगवद् गच्छन्ती सा योषितां
स्त्रीणामनिष्टदा अशुभप्रदा।
या च पतिता मण्डलाकारा भवति सा पुरं नगरं हन्ति नाशयति। या च छत्रवच्छत्राकारा
दृश्यते सा पुरोहितमाचार्यं हन्ति। या च वंशगुल्मवत् स्थिता वंशगुल्माकारा सा राष्ट्रस्य
दोषकारिणी भवति।
व्यालः सर्पः। सूकरो वराहः। तदुपमा तत्सदृशी। तथा विस्फुलिङ्गानामग्निकणानां
माला विद्यते यस्याः। अग्निकणैर्व्याप्तेत्यर्थः। अथवा खण्डशो गता बहुविधं विशीर्णा
सस्वना सशब्दा या च सा पापदा अशुभफलदा भवति॥२५-२८॥
अन्यदप्याह—
सुरपतिचापप्रतिमा राज्यं नभसि विलीना जलदान् हन्ति।
पवनविलोमा कुटिलं याता न भवति शस्ता विनिवृत्ता वा॥२९॥
इन्द्रधनुष की तरह तथा आकाश में उत्पन्न होकर शीघ्र विलीन होने वाली उल्का
मेघों का नाश करती है तथा वायु के प्रतिकूल टेढ़ी होकर चलने वाली और उत्पन्न होकर
नीचे की तरफ नहीं चलने वाली शुभ नहीं होती है॥२९॥
बृ० सं० प्र०-२८
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४३४ बृहत्संहिता
या चोल्का सुरपतिचापप्रतिमा इन्द्रधनुःसदृशी सा राज्यं निहन्ति नाशयति। या च
नभस्याकाशे विलीना उत्पन्ना सती तत्रैवादर्शनं गता सा जलदान् मेघान् हन्ति। या च
पवनविलोमा सम्मुखवाता कुटिलं याता वक्रं कृत्वा गता सा शस्ता न भवति। विनि-
वृत्ता वा उत्पन्ना सत्यधो न गता सा न शस्तेति न प्रशस्ता भवति॥२९॥
अत्रापि विशेषमाह—
अभिभवति यतः पुरं बलं वा भवति भयं तत एव पार्थिवस्य।
निपतति च यया दिशा प्रदीप्ता जयति रिपूनचिरात्तया प्रयातः ॥३०॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायामुल्का-
लक्षणाध्यायस्त्रयस्त्रिंशः ॥३३॥
जिस ओर से आकर उल्का पुर या सेना के ऊपर गिरती है, उसी दिशा से राजा को
भय होता है और जिस दिशा को प्रकाशित करती हुई गिरती है, उस दिशा में गमन करने
वाला राजा शीघ्र ही शत्रुओं का नाश करता है॥३०॥
इति 'विमला'हिन्दीटीकायामुल्कालक्षणाध्यायस्त्रयस्त्रिंशः ॥३३॥
यतो यस्यां दिशि पुरं बलं वा अभिभवति तत एव तस्यामेव दिशि पार्थिवस्य राज्ञो
भयं भीतिर्भवति। यया च दिशा प्रदीप्ता समुज्ज्वलिता निपतति तया प्रयातो गतो राजा
अचिराच्छीघ्रमेव रिपूनरीन् जयति। तथा च काश्यपः—
पार्थिवे प्रस्थिते दीप्ता पतत्युल्का महास्वना।
तां दिशं सिद्ध्यते सिद्धिं विजयं लभते चिरात्॥
अत्र च तात्कालिकलग्नग्रहसंयोगाच्छकुनिरुतश्रवणाच्च फलमूह्यम्। तथा च समास-
संहितायाम्—
क्रूरग्रहर्क्षलग्नक्षणतिथिकरणप्रभाञ्जनैर्दीप्तैः।
दीप्ताण्डजमृगविरुतैर्निर्घातक्षितिविमर्दैश्च ॥ इति॥३०॥
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृत्तावुल्का-
लक्षणं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३३॥
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अथ परिवेषलक्षणाध्यायः
अथ परिवेषलक्षणं व्याख्यायते। तत्रादावेव स्वरूपप्रदर्शनार्थमाह—
सम्मूर्च्छिता रवीन्द्वोः किरणाः पवनेन मण्डलीभूताः ।
नानावर्णाकृतयस्तन्वभ्रे व्योम्नि परिवेषाः ॥१॥
वायु के द्वारा मण्डलीभूत सूर्य और चन्द्र के किरणस्वरूप, मेघ वाले आकाश में
प्रतिविम्बित होकर जो अनेक वर्ण के दिखाई देते हैं, उसी का नाम परिवेष है॥१॥
रवीन्द्रोरर्कचन्द्रयोः किरणा रश्मयः पवनेन वायुना मण्डलीभूता वृत्ताकाराः कृतास्ते
च तन्वभ्रे स्वल्पमेघे व्योम्नि आकाशे सम्मूर्च्छिताः प्रतिफलिता नानावर्णाकृतयो दृश्यन्ते।
नानाप्रकारो विचित्रो वर्ण आकृतिः संस्थानं येषां ते परिवेषा इत्युच्यन्ते ॥१॥
अथ तेषा संज्ञान्तराण्याह—
ते रक्तनीलपाण्डुरकापोताभ्राभशबलहरितशुक्लाः ।
इन्द्रयमवरुणनिर्ऋतिश्वसनेशपितामहाम्बुकृताः ॥२॥
वे परिवेष इन्द्र, यम, वरुण, निर्ऋति, वायु, शिव, ब्रह्मा और अग्निकृत क्रम से रक्त,
नील, थोड़ा-सा श्वेत, कबूतर के रङ्ग, मेघ वर्ण, शबल ( कृष्ण-श्वेत ), हरे और श्वेत वर्ण
के होते हैं। जैसे—इन्द्रकृत रक्त, यमकृत नील, वरुणकृत थोड़ा श्वेत, निर्ऋतिकृत कबूतर
के रङ्ग, वायुकृत मेघ वर्ण, शिवकृत शबल, ब्रह्माकृत हरा और अग्निकृत श्वेत वर्ण का
होता है॥२॥
ते परिवेषा रक्तादिवर्णा यथासंख्यमिन्द्रादिकृता भवन्ति। तद्यथा—रक्तवर्णः परिवेष
इन्द्रकृतः। नीलवर्णो यमकृतः। पाण्डुर ईषच्छुक्लो वरुणकृतः। कापोतः कपोतवर्णो
निर्ऋतिकृतः। अभ्राभो मेघाभः कृष्णवर्णः श्वसनकृतो वायुनोत्पादित इत्यर्थः। शबलः
कृष्णश्वेतशारवर्ण ईशकृतः शम्भुकृतः। हरितो नीलपीतः पितामहकृतो ब्रह्मकृतः। शुक्लः
श्वेतवर्णोऽम्बुकृतः सोऽपि वरुणकृत एव॥२॥
अन्यदप्याह—
धनदः करोति मेचकमन्योन्यगुणाश्रयेण चाप्यन्ये ।
प्रविलीयते मुहुर्मुहुरल्पफलः सोऽपि वायुकृतः ॥३॥
कुबेर मेचक ( मयूरकण्ठसदृश नील ) वर्ण का परिवेष करता है। अन्य ( इन्द्र
आदि ) मिले हुए रङ्ग के परिवेष करते हैं। जो परिवेष बार-बार उत्पन्न होकर नष्ट हो
जाय, वह वायुकृत थोड़ा फल देने वाला होता है॥३॥
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४३६ बृहत्संहिता
धनदो वैश्रवणो मेचकं मयूरकण्ठसदृशवर्णं परिवेषं करोति। अन्य इन्द्रादयोऽन्योन्य-
गुणाश्रयेण रक्ताद्या ये गुणा उक्तास्तेषां गुणानामन्योन्यं परस्परं समाश्रयेण कुर्वन्ति। अतोऽपि
बहुवर्णता दृश्यते। यः पुनर्मुहुर्मुहुः प्रतिक्षणं प्रविलीयते नश्यति सोऽपि परिवेषो वायुकृतो-
ऽनिलोत्पादितोऽल्पफलदश्च भवति। तथा च काश्यपः—
सितपीतेन्द्रनीलाभा रक्ताकापोतबभ्रवः।
शबला बर्हिवर्णाश्च विज्ञेयास्ते शुभप्रदाः।।
ऐन्द्रयाम्याप्याप्यनैर्ऋत्यवारुणाः सौम्यवह्निजाः।
दृश्यादृश्येन भावेन वायव्यः सोऽपि कष्टदः।। इति।।३।।
अथ वस्तुवशेन शुभफलमाह—
चाषशिखिरजततैलक्षीरजलाभः स्वकालसम्भूतः।
अविकलवृत्तः स्निग्धः परिवेषः शिवसुभिक्षकरः ॥४॥
नीलकण्ठ, मयूर, चाँदी, तेल, दूध और जल के समान कान्ति वाला परिवेष यदि
क्रम से स्वकाल (शिशिर आदि ऋतुओं) में उत्पन्न; जैसे—शिशिर ऋतु में नीलकण्ठ
की तरह कान्ति वाला, वसन्त में मयूर की तरह कान्ति वाला, ग्रीष्म में चाँदी की तरह
कान्ति वाला, वर्षा ऋतु में तेल की तरह कान्ति वाला, शरद् ऋतु में दूध की तरह कान्ति
वाला और हेमन्त ऋतु में जल के समान कान्ति वाला होकर अखण्ड मण्डलाकार और
निर्मल हो तो लोगों का कुशल और सुभिक्ष करता है।।४।।
चाषः पक्षी। शिखी मयूरः। रजतं रूप्यम्। तैलं तिलतैलम्। क्षीरं गोक्षीरम्। जलं
पानीयम्। एषां सदृशी आभा कान्तिर्यस्य सः। स्वकालसम्भूतः, स्वकाले शिशिरादि ऋतुषट्सु
सम्भूत उत्पन्नः। क्रमेण तुल्यवर्णः। एतदुक्तं भवति—चाषवर्णो नीलाभः शिशिरतौ
शोभनः परिवेषः। मयूरवर्णो विचित्रो वसन्ते। रूप्यवर्णः शुक्लो ग्रीष्मे। तैलवर्णो वर्षासु।
क्षीरवर्णः शरदि। जलाभो हेमन्त इति। एवं स्वकालसम्भूतः। तथा अविकलवृत्तोऽखण्डः
परिवर्तुलः। स्निग्धो निर्मलः। एवंविधः परिवेषः शिवसुभिक्षकरः। शिवं श्रेयः सुभिक्षं च
करोति। तथा च काश्यपः—
शिशिरे चाषवर्णश्च वसन्ते शिखिसन्निभः।
ग्रीष्मे रजतसङ्काशः प्रावृट्‌तैलसमप्रभः।।
गोक्षीरसदृशः शस्तः परिवेषः शरत्स्मृतः।
हेमन्ते जलसङ्काशः स्वकाले शुभदः स्मृतः।। इति।।४।।
अन्यदप्याह—
सकलगगनानुचारी नैकाभः क्षतजसन्निभो रूक्षः।
असकलशकटशरासनशृङ्गाटकवत् स्थितः पापः ॥५॥
सम्पूर्ण आकाश में गमन करने वाला (उदय से अस्त तक स्थिर रहने वाला),
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परिवेषलक्षणाध्यायः ४३७
अनेक वर्ण वाला, रक्त वर्ण वाला, रूक्ष, अखण्डित तथा गाड़ी, धनुष या त्रिभुज की तरह
आकृति वाला परिवेष अशुभ फल देने वाला होता है।।५।।
सकलं समग्रं गगनमाकाशमनुचरति गच्छति सकलगगनानुचारी। उदयात्प्रभृत्यस्तं
यावत्तिष्ठतीत्यर्थः। नैकाभो विविधकान्तिः। क्षतजसन्निभो रक्तवर्णः। रूक्षो निःस्नेहः।
असकलः खण्डः। शकटं प्रसिद्धम्। शरासनं चापम्। शृङ्गाटकं त्र्यस्रम्। तद्वत्स्थित-
स्तदाकारः। पापोऽनिष्टफलदः।।५।।
अन्यदप्याह—
शिखिगलसमेऽतिवर्षं बहुवर्णे नृपवधो भयं धूम्रे।
हरिचापनिभे युद्धान्यशोककुसुमप्रभे चापि ॥६॥
मयूरकण्ठ की तरह नील वर्ण का परिवेष अतिवृष्टि, अनेक वर्ण का परिवेष राजा
का नाश, धूम्र वर्ण का परिवेष भय, इन्द्रधनुष की तरह और अशोकपुष्प की तरह अति
लोहित कान्ति वाला परिवेष युद्ध करता है।।६।।
शिखिगलसमे मयूरकण्ठतुल्ये परिवेषे सत्यतिवर्षं प्रभूता वृष्टिर्भवति। बहुवर्णे नानारूपे
नृपस्य राज्ञो वधः। धूम्रवर्णे कृष्णश्यावे भयं भीतिर्भवति। हरिचापनिभे इन्द्र-धनुःसदृशे
युद्धानि भवन्ति। अशोककुसुमप्रभेऽशोकपुष्पसदृशकान्तौ अतिलोहिते। चशब्दा-द्युद्धान्येव
भवन्ति।।६।।
अन्यदप्याह—
वर्णेनैकेन यदा बहुलः स्निग्धः क्षुराभ्रकाकीर्णः।
स्वर्तौ सद्यो वर्षं करोति पीतश्च दीप्तार्कः ॥७॥
एक वर्ण वाला, अधिक निर्मल और उस्तरे के समान मेघों से व्याप्त परिवेष अपने
ऋतु में दिखाई दे तो शीघ्र वृष्टि करता है। यदि पीले वर्ण का परिवेष हो और उस समय
सूर्य के किरण तीक्ष्ण हों तो भी वृष्टि शीघ्र करता है।।७।।
एकेन वर्णेन यदा युक्तो बहुलो घनः। स्निग्धः सस्नेहः। क्षुराभ्रकाकीर्णः क्षुराकारैरभ्रैकरा-
कीर्णो व्याप्तस्तथाभूतः स्वर्तौवात्मीयर्तौ दृष्टस्तस्मिन्नेवाहनि वृष्टिं करोति। एतदुक्तं भवति—
चाषादिसदृशवर्णः शिशिरादित्र्वृतुषु सम्भूत एकवर्णः क्षुराभ्रकाकीर्णः सद्यो वर्ष करोति।
पीतः पीतवर्णो दीप्तस्तीक्ष्णश्चार्कः सूर्यो यस्मिन् सोऽपि चशब्दात् सद्यो वर्षं करोति।
अन्यदप्याह—
दीप्तमृगविहङ्गरुतः कलुषः सन्ध्यात्रयोत्थितोऽतिमहान्।
भयकृत् तडिदुल्कार्द्धर्हतो नृपं हन्ति शस्त्रेण ॥८॥
यदि सूर्य की तरफ मुख किये हुये मृग और पक्षीगण के शब्दयुत, रूक्ष, तीनों
सन्ध्याओं ( प्रातः, मध्याह्न और सायं ) में उत्पन्न और अतिविस्तृत परिवेष दिखाई दे तो
भय करने वाला होता है।।८।।
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४३८ बृहत्संहिता
दीप्तैः सूर्याभिमुखैर्मृगैरारण्यैर्विहङ्गैश्च पक्षिभी रुतः कृतः शब्दः। कलुषोऽनिर्मलः।
सन्ध्यात्रयोत्थितो दिनस्य प्राङ्मध्यान्तसन्ध्यासूत्पन्नः। उदयमध्याह्नास्तमयेषु दृश्यत इत्यर्थः।
अतिमहानतिविस्तीर्णस्तथाभूतो भयकृद्भयं करोति। तथा च गर्गः—
उदयास्तमयोर्मध्ये सूर्यचन्द्रमसोर्द्वयोः।
परिवेषः प्रदृश्येत तद्राष्ट्रमवसीदति।।
तडिदुल्काद्यैर्हतो नृपं हन्ति शस्त्रेण। तडिद् विद्युत्। उल्का प्रसिद्धा। आद्यग्रहणा-
दिव्यान्तरिक्षभौमा उत्पाताः। एतैस्तडिदुल्काद्युत्पातैर्हतो नृपं राजानं शस्त्रेण हन्ति घातयति।
अन्यदप्याह—
प्रतिदिनमर्कहिमांश्वोरहर्निशं रक्तयोनिरिन्द्रवधः।
परिविष्टयोरभीक्ष्णं लग्नास्तमयस्थयोस्तद्वत् ॥९॥
यदि प्रत्येक दिन सूर्य का और रात्रि में चन्द्र का रक्त वर्ण का परिवेष दिखाई दे तो
राजा का नाश करता है तथा सदा उदय या अस्त काल में सूर्य या चन्द्र का परिवेष दिखाई
दे तो भी राजा का नाश करता है ॥९॥
अर्क आदित्यः। हिमांशुश्चन्द्रः। तयोरर्कहिमांश्वोः प्रतिदिनमहर्निशमहोरात्रं रक्तयोर्लो-
हितवर्णयोः सूर्यो लोहितवर्णोऽहनि चन्द्रो निशि यदि दृश्यते तदा नरेन्द्रवधो राज्ञो मरणं
भवति। परिविष्टयोरभीक्ष्णं तथा लग्नास्तमयस्थयोः। लग्नग्रहणेनोदयकाल उच्यते। अर्क-
चन्द्रयोरुदयास्तमयस्थयोरभीक्ष्णं पुनः पुनः परिविष्टयोस्तद्वत्तेन प्रकारेण नरेन्द्रवध इत्यर्थः।
तथा च गर्गः—
दिवा सूर्ये परिवेषो रात्रौ चन्द्रे यदा भवेत्।
एकस्मिंश्चेदहोरात्रे तदा नश्यति पार्थिवः।।
एतेन विधिना नित्यं सप्ताहं परिविष्यते।
सर्वभूतविनाशः स्यात्तस्मिन्नुत्पातदर्शने।।
अत्र केचिल्लग्नास्तनभःस्थयोरिति पठन्ति। नभःशब्देन मध्याह्नकाल उच्यते। उदय-
मध्याह्नास्तमयेषु यदि दृश्यते तदा नरेन्द्रवधः। तथा च समाससंहितायाम्—
शृङ्गाटकचापविकारसन्निभः परुषमूर्तिरतिबहुलः।
सकलगगनानुचारी बहुवर्णश्चावलम्बी च।।
द्वित्रिगुणः खण्डो वा सन्ध्यात्रयमुत्थितो ग्रहच्छादी।
परिवेषः पापफलो ग्रहरोधी हन्ति तद्भक्तीः।।
स्निग्धो मधुघृतशिखिचाषपत्रनीलोत्पलाब्जरजतनिभः।
क्षेमसुभिक्षाय भवेत् परिवेषोऽर्कस्य शशिनो वा।। इति॥९॥
अन्यदप्याह—
सेनापतेर्भयकरो द्विमण्डलो नातिशस्त्रकोपकरः।
त्रिप्रभृति शस्त्रकोपं युवराजभयं नगररोधम् ॥१०॥

परिवेशलक्षणाध्यायः ४३९
दो मण्डल वाला परिवेष सेनापति को भय करने वाला होता है; किन्तु अधिक
शस्त्रभय करने वाला नहीं होता। तीन आदि (तीन, चार, पाँच) मण्डल वाला परिवेष
शस्त्रकोप, युवराज को भय और शत्रुओं से नगर का अवरोध कराता है॥१०॥
द्वे मण्डले यस्यासौ द्विमण्डलः परिवेषः सेनापतेश्चमूनाथस्य भयं भीतिं करोति।
नातिशस्त्रकोपकरः, अतिशस्त्रकोपं च न करोति; ईषत्करोतीत्यर्थः। त्रिप्रभृति शस्त्रकोप-
मिति, त्रिप्रभृतीनि मण्डलानि त्रीणि चत्वारि पञ्चधा शस्त्रकोपम्। युवराजोऽर्धभोगी राजा।
युवराजस्य च भयम्। नगरस्य पुरस्य रोधं वेष्टनं च करोति। तथा च गर्गः—
द्विमण्डलपरीवेषः सेनापतिभयङ्करः।
युद्धे सुदारुणं कुर्याद् दृश्यते मण्डलैस्त्रिभिः॥ इति॥१०॥
अन्यद्विशेषमाह—
वृष्टिस्त्र्यहेण मासेन विग्रहो वा ग्रहेन्दुभनिरोधे।
होराजन्माधिपयोर्जन्मर्क्षे वाऽशुभो राज्ञः ॥११॥
यदि भौमादि कोई ग्रह, चन्द्र, कोई नक्षत्र—ये तीनों एक परिवेष में गत हों तो तीन
दिन में वृष्टि और एक मास में लड़ाई होती है। जिस राजा का जन्मलग्नेश, जन्मराशीश
या जन्मनक्षत्र परिवेष में हो, उस राजा को अशुभ फल होता है॥११॥
ग्रहेन्दुभनिरोधे। ग्रहा भौमादयः। इन्दुश्चन्द्रः। भानि नक्षत्राणि। एषां निरोधे परिवेष्टने।
एतदुक्तं भवति—चन्द्रपरिवेषमध्यगते ग्रहनक्षत्रे यदा भवतस्तदा त्र्यहेण दिनत्रयेण वृष्टि-
र्भवति। मासेन त्रिंशदहोरात्रेण वा विग्रहः कलहो भवति। तथा च गर्गः—
त्रीणि यत्रावरुध्येरन्नक्षत्रं चन्द्रमा ग्रहः।
त्र्यहेण वर्षतीन्द्रश्च मासाद्वा जायते भयम् ।।
होराजन्माधिपयोरिति। राज्ञो नृपस्य होराजन्माधिपयोः, होराधिपो जन्मलग्नपः,
जन्माधिपो राश्यधिपः, तयोस्तथा जन्मर्क्षे च जन्मनक्षत्रे निरुद्धे सति राज्ञो नृपस्याशुभः।
ग्रहाणां परिवेषगतानां फलमाह—
परिवेषमण्डलगतो रवितनयः क्षुद्रधान्यनाशकरः।
जनयति च वातवृष्टिं स्थावरकृषिकृन्निहन्ता च ॥१२॥
भौमे कुमारबलपतिसैन्यानां विद्रवोऽग्निशस्त्रभयम्।
जीवे परिवेषगते पुरोहितामात्यनृपपीडा ॥१३॥
मन्त्रिस्थावरलेखकपरिवृद्धिश्चन्द्रेजे सुवृष्टिश्च।
शुक्रे यायिक्षत्रियराज्ञीपीडा प्रियं चान्नम् ॥१४॥
क्षुदनलमृत्युनराधिपशस्त्रेभ्यो जायते भयं केतौ।
परिविष्टे गर्भभयं राहौ व्याधिर्नृपभयं च ॥१५॥
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४४० बृहत्संहिता
यदि परिवेश मण्डल में शनि पड़ा हो तो छोटे धान्यों (कौनी आदि) का नाश,
वायुयुत वृष्टि, स्थावर (वृक्ष आदि) की हानि और किसानों का नाश करता है। मंगल
पड़ा हो तो कुमार, सेनापति और सेनाओं को व्याकुल, अग्निभय और शस्त्रभय करता है।
बृहस्पति पड़ा हो तो पुरोहित, मन्त्री और राजाओं को पीड़ा होती है। बुध पड़ा हो तो
मन्त्री, स्थावर (वृक्ष आदि) और लेखक की वृद्धि तथा सुन्दर वृष्टि होती है। शुक्र पड़ा
हो तो गमन करने वाले क्षत्रियों तथा रानियों को पीड़ा और दुर्भिक्ष होता है। केतु पड़ा हो
तो दुर्भिक्ष, अग्नि, मरण राजा और शस्त्र का भय होता है तथा परिवेश मण्डल में यदि राहु
पड़ा हो तो गर्भभय, व्याधि और राजभय होता है।।१२-१५।।
रवितनयः सौरः परिवेषमण्डलमध्यगतः क्षुद्रधान्यानां प्रियङ्गवादीनां नाशकः।
तथा वातवृष्टिं वातसंयुक्तां वृष्टिं जनयत्युत्पादयति। स्थावराणां वृक्षादीनां कृषिकराणां
च निहन्ता नाशकरो भवति।
भौम इति। भौमे परिवेषमध्यगते कुमाराणां तथा बलपतीनां चमूनाथानां सैन्यानां
च विद्रव आकुलता, अग्निभयं शस्त्रभयं च भवति। जीवे बृहस्पतौ परिवेषमध्यगते पुरोहित-
स्याऽऽचार्यस्यामात्यानां मन्त्रिणां नृपाणां राज्ञां च पीडा भवति।
चन्द्रजे बुधे परिविष्टे मन्त्रिणां सचिवानां स्थावराणां वृक्षादीनां लेखकानां लिपिकराणां
च परिवृद्धिर्भवति। सुवृष्टिः शोभना वृष्टिश्च भवति। शुक्रे परिवेषमण्डलगते यायिनां जिगमि-
षूणां क्षत्रियाणां क्षत्रियजातीनां राज्ञा नृपमहिष्याश्च पीडा भवति। प्रियं चान्नम्। दुर्भिक्षं
भवतीत्यर्थः।
केतौ परिवेषमध्यगते क्षुद् दुर्भिक्षम्। अनलोऽग्निः। मृत्युर्मरणम्। नराधिपो राजा।
शस्त्रमायुधम्। एभ्यो भयं भीतिर्जायते उत्पद्यते। राहौ परिविष्टे परिवेषमध्यगते गर्भाणां
भयम्। व्याधिः। नृपभयं नृपस्य राज्ञो भयं च भवति। तथा च समाससंहितायाम्—
बलपपुरोहितनरपतिकृषिकृत्पीडा क्रमेण परिविष्टैः।
कुजगुरुसितार्कपुत्रैः सौम्येन तु मन्त्रिपरिवृद्धिः।।
केतोः शस्त्रोद्योगो राहोः परिवेषणेन रोगभयम्।
युद्धक्षुद्भयनृपतेर्नाशं व्याध्यादिभिः क्रमश:।। इति।।१२-१५।।
अथ द्व्यादिषु ग्रहेषु परिवेषमध्यगतेषु फलमाह—
युद्धानि विजानीयात् परिवेषाभ्यन्तरे द्वयोर्ग्रहयोः ।
दिवसकृतः शशिनो वा क्षुद्वृष्टिभयं त्रिषु प्रोक्तम् ।।१६।।
याति चतुर्षु नरेन्द्रः सामात्यपुरोहितो वशं मृत्योः ।
प्रलयमिव विद्धि जगतः पञ्चादिषु मण्डलस्थेषु ।।१७।।
यदि सूर्य या चन्द्र के परिवेश में दो ताराग्रह स्थित हों तो युद्ध, तीन हों तो दुर्भिक्ष और
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परिवेषलक्षणाध्यायः ४४१
अवृष्टि का भय, चार हों तो मन्त्री और पुरोहित के साथ राजा की मृत्यु और सूर्य या चन्द्र
के परिवेष में पाँच आदि ग्रह हों तो संसार का प्रलय ही जानना चाहिये।।१६-१७।।
दिवसकृत आदित्यस्य शशिनश्चन्द्रस्य वा द्वयोस्ताराग्रहयोः परिवेषाभ्यन्तरे स्थितयो-
र्युद्धानि संग्रामान् विजानीयाद् विन्द्यात्। त्रिषु ग्रहेषु परिवेषमध्यगतेषु क्षुद् दुर्भिक्षभयम्।
अवृष्टिभयं च प्रोक्तं कथितम्।
यातीति । चतुर्षु ताराग्रहेषु परिवेषमण्डलमध्यगतेषु नरेन्द्रो राजा सामात्यपुरोहितः,
अमात्या मन्त्रिणः, पुरोहित आचार्यस्तैः सहितो मृत्योर्वशं याति। म्रियत इत्यर्थः। पञ्चादिषु
पञ्चसु षट्सु वा मण्डलस्थेषु परिवेषमध्यवर्तिषु जगतो विश्वस्य प्रलयं संहारमिव विद्धि
जानीहि ।।१६-१७।।
अधुना ताराग्रहाणां नक्षत्राणां वा पृथक्परिविष्टानां फलमाह—
ताराग्रहस्य कुर्यात् पृथगेव समुत्थितो नरेन्द्रवधम्।
नक्षत्राणामथवा यदि केतोर्नोदयो भवति ।।१८।।
यदि केतु का उदय न हुआ हो तब ताराग्रह या नक्षत्र अलग-अलग परिवेषयुत हों तो
राजा का नाश करते हैं।।१८।।
पृथक्ताराग्रहस्य भौमादेः। नक्षत्राणामश्विन्यादीनां वा परिवेषः समुत्थित उत्पन्नो नरेन्द्रस्य
राज्ञो वधं मरणं कुर्यात्। अथवा विकल्पे। यदि केतोरुदयो न भवति तदैवम्। केतूदये
तु पुरस्तत्फलमेव न ताराग्रहादिपरिवेषकृतम्। तथा च काश्यपः—
परिवेषाभ्यन्तरगौ द्वौ ग्रहौ यायिनागरौ।
युद्धं च भवति क्षिप्रं घोररूपं सुदारुणम्।।
मण्डलान्तरिताः पञ्च जगतः संक्षयावहाः।
अथ ताराग्रहस्यैव नक्षत्राणामथापि वा।।
परिवेषो यदा दृश्यस्तदा नरपतेर्वधः।
यदि केतूदयो न स्यादन्यथा तद्वदेत् फलम्।। इति।।१८।।
अधुना तिथिक्रमेण परिवेषफलान्याह—
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रहा भवेत् प्रतिपदादिषु क्रमशः।
श्रेणीपुरकोशानां पञ्चम्यादिष्वशुभकारी ।।१९।।
युवराजस्याष्टम्यां परतस्त्रिषु पार्थिवस्य दोषकरः।
पुररोधो द्वादश्यां सैन्यक्षोभस्त्रयोदश्याम् ।।२०।।
नरपतिपत्नीपीडां परिवेषोऽभ्युत्थितश्चतुर्दश्याम्।
कुर्यात्तु पञ्चदश्यां पीडां मनुजाधिपस्यैव ।।२१।।
प्रतिपदा आदि चार तिथियों में यदि परिवेष दिखाई दे तो ब्राह्मण आदि चार वर्णों का
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४४२ बृहत्संहिता
नाश होता है। जैसे—प्रतिपदा में परिवेष दिखाई दे तो ब्राह्मणों का, द्वितीया में दिखाई दे
तो क्षत्रियों का, तृतीया में दिखाई दे तो वैश्यों का और चतुर्थी में दिखाई दे तो शूद्रों का
नाश होता है। यदि पञ्चमी में परिवेष दिखाई दे तो श्रेणी ( समान जातियों के संघ ) का,
षष्ठी में दिखाई दे तो नगर का और सप्तमी में दिखाई दे तो कोश का अशुभ करने वाला
होता है। यदि अष्टमी में परिवेष दिखाई दे तो युवराज का तथा नवमी, दशमी और एकादशी
में दिखाई दे तो राजा का अशुभ करने वाला होता है। द्वादशी में नगर का अवरोध और
त्रयोदशी में सेनाओं में आकुलता होती है। यदि चतुर्दशी में दिखाई दे तो रानी को और
पूर्णिमा में राजा को पीड़ा होती है।।१९-२१।।
क्रमशः क्रमेण प्रतिपदादिषु चतुर्षु दिवसेषु परिवेषो दृष्टो विप्रक्षत्रियविट्शूद्रहा भवति।
तद्यथा—प्रतिपदि दृष्टो विप्रान् हन्ति। द्वितीयायां क्षत्रियान् हन्ति। तृतीयायां वैश्यान्। चतुर्थ्यां
शूद्रान् इति। श्रेणीपुरकोशानामिति, बहूनां समानजातीयानां सङ्घः श्रेणी। पञ्चम्यां दृष्टः
श्रेण्या अशुभकारी। षष्ठ्यां पुरस्य नगरस्य। सप्तम्यां कोशस्य गजस्य।
युवराजस्याष्टम्य़ामिति। अष्टम्यां दृष्टो युवराजस्य दोषकरः। परतोऽनन्तरं त्रिषु
दिनेषु नवमीदशम्येकादशीषु पार्थिवस्य राज्ञो दोषकरो न शुभः। द्वादश्यां पुररोधो नगर-
वेष्टनम्। त्रयोदश्यां सैन्यक्षोभ आकुलता।
चतुर्दश्यामभ्युत्थित उत्पन्नः परिवेषो नरपते राज्ञः पत्न्याः पीडां करोति। पञ्चदश्यां
मनुजाधिपस्य राज्ञः पीडां करोति।।१९-२१।।
अधुना परिवेषरेखावशेन शुभाशुभफलमाह—
नागरकाणामभ्यन्तरस्थिता यायिनां च बाह्यस्था।
परिवेषमध्यरेखा विज्ञेयाक्रन्दसाराणाम् ।।२२।।
रक्तः श्यामो रूक्षश्च भवति येषां पराजयस्तेषाम्।
स्निग्धः श्वेतो द्युतिमान् येषां भागो जयस्तेषाम् ।।२३।।
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां परिवेष-
लक्षणाध्यायश्चतुस्त्रिंशः ।।३४।।
यदि परिवेष के अन्दर रेखा दिखाई दे तो नगरवासियों का, बाहर दिखाई दे तो गमन
करने वाले विजयेच्छु राजाओं का और परिवेष के मध्य में रेखा दिखाई दे तो आक्रन्द
( 'आक्रन्दो दारुणे रणे' इत्यमरः। भयङ्कर युद्ध ) की सार वस्तुओं ( सेनाओं ) का
शुभाशुभ करने वाली होती है। जिसके भाग में लाल, काला या रूक्ष वर्ण का परिवेष हो,
उसकी पराजय होती है। जैसे—परिवेष के अन्दर लाल, काला, रूक्ष हो तो नगरवासियों
की, बाहर में हो तो गमन करने वाले विजयेच्छु राजाओं की और परिवेष मध्य में लाल,
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परिवेषलक्षणाध्यायः ४४३
काला या रूक्ष दिखाई दे तो सेनाओं की पराजय होती है तथा जिनका भाग निर्मल, श्वेत
और कान्तियुक्त हो उनकी विजय होती है।।२२-२३।।
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां परिवेषलक्षणाध्यायश्चतुस्त्रिंशः ॥३४॥
परिवेषे वर्णत्रयेण रेखात्रयं दृश्यते प्रायेण। तत्र द्वे रेखे बहिर्वर्तिन्यावतिक्रम्य या
स्थिता रेखा साऽभ्यन्तरस्थिता सा च नागरकाणां नृपाणां शुभाशुभकारी ज्ञेया। तथा
बाह्यस्था रेखा यायिनां जिगमिषूणां राज्ञाम्। परिवेषमध्यगता रेखा आक्रन्दसाराणां शुभा-
शुभकारी विज्ञेया।
कथमित्याह—रक्त इति। येषां नागरकादीनां भागो रक्तोऽतिलोहितवर्णः, श्यामः
कृष्णवर्णः, रूक्षोऽनिर्मलश्च तेषां पराजयो भवति। येषां भागः स्निग्धो निर्मलः, श्वेतः
शुक्लवर्णः, द्युतिमान् दीप्तिमान्। तेषां जयो भवति।।२२-२३।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ परिवेषलक्षणं
नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३४॥
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अथेन्द्रायुधलक्षणाध्यायः
अथेन्द्रायुधलक्षणं व्याख्यायते। तत्रादावेव तत्सम्भवप्रदर्शनार्थमाह—
सूर्यस्य विविधवर्णाः पवनेन विघट्टिताः कराः साभ्रे।
वियति धनुःसंस्थाना ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनुः ॥१॥
मेघयुत आकाश में वायु से सूर्यकिरण टकरा कर अनेक वर्णयुत धनुषाकार जो
दिखाई देता है, लोग उसी को इन्द्रधनुष कहते हैं॥१॥
सूर्यस्यादित्यस्य करा रश्मयः। साभ्रे समेघे वियत्याकाशे। पवनेन वायुना विघट्टिता
रुद्धास्ते च धनुःसंस्थानाश्चापाकारा विविधवर्णा नानारूपा ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनुरिति लोके
दृश्यते॥१॥
अत्रैव परमतं शुभाशुभं च फलमाह—
केचिदनन्तकुलोरगनिःश्वासोद्भूतमाहुराचार्याः ।
तद्यायिनां नृपाणामभिमुखमजयावहं भवति ॥२॥
किसी-किसी ( काश्यप आदि ) आचार्य का मत है कि नागराज के कुल में उत्पन्न
सर्पों के निःश्वास से यह ( इन्द्रधनुष ) उत्पन्न होता है। यदि इसको सम्मुख करके राजा
लोग गमन करें तो उनकी पराजय होती है॥२॥
केचिदाचार्याः काश्यपादयोऽनन्तकुले अनन्तस्य नागराजस्य कुले वंशे ये जाता
उरगाः सर्पास्तेषां निःश्वास उच्छ्वसनं तदुद्भूतं तदुत्पन्नमाहुरुक्तवन्तः। तथा च काश्यपः—
अनन्तकुलजाता ये पन्नगाः कामरूपिणः।
तेषां निःश्वाससम्भूतमिन्द्रचापं प्रचक्षते॥
तदिन्द्रधनुर्यायिनां नृपाणां राज्ञामभिमुखं सम्मुखमजयावहं पराजयदं भवति इति॥२॥
अन्यदप्याह—
अच्छिन्नमवनिगाढं द्युतिमत् स्निग्धं घनं विविधवर्णम्।
द्विरुदितमनुलोमं च प्रशस्तमम्भः प्रयच्छति च ॥३॥
अखण्ड, पृथ्वी में लगा हुआ, उज्ज्वल, निर्मल, अविकल, अनेक वर्णयुत, दो बार
उदित या पश्चिम में स्थित इन्द्रधनुष दिखाई दे तो शुभ फल और बहुत वृष्टि करने वाला
होता है।
विशेष—यहाँ पर कोई-कोई अनुलोम का अर्थ दक्षिण दिशा में और दूसरा उत्तर
दिशा में—ऐसा कहते हैं॥३॥
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इन्द्रायुधलक्षणाध्यायः ४४५
अच्छिद्रमखण्डम्। अवनिगाढं भूमौ लग्नम्। भूतलं भित्त्वेवोत्थितमित्यर्थः। द्युतिम-
दत्युज्ज्वलम्। स्निग्धमरूक्षं सुकान्तिमित्यर्थः। घनमविकलम्। विविधवर्णं नानाप्रकारै
रक्तनीलसिताद्यैर्वर्णैर्युक्तम्। द्विरुक्तं द्विधा स्थितम्। चकारः समुच्चये। न केवलमनन्तरोक्त-
प्रतिपादितलक्षणसंयुक्तम्। यावद् द्विरुदितमनुलोमं पश्चाद्द्वयवस्थितम्। एवंविधं प्रशस्त-
मिष्टफलसूचकम्। अम्भः प्रयच्छति च पानीयं ददातीति।
अत्र केचित् शक्रचापस्यैवमनुलोमतां वर्णयन्ति। यथैकं दक्षिणदिक्स्थमपरं चोत्तर-
दिक्स्थं तयोर्यदा प्रतिलोमता तदा द्विरुदितस्यानिष्टं फलम्। यदा त्वेकदिगवस्थितौ तौ
तदानुलोमौ। तत्रेष्टफलमिति। तथा च ऋषिपुत्र आह—
द्विरुत्तरमविच्छिन्नं स्निग्धमिन्द्रायुधं महत्।
पृष्ठतो विजयाय स्याद्विच्छिन्नं परुषं न तु॥
तथा च नन्दी आह—
बहुवर्णमविच्छिन्नं द्विरुन्नतं स्निग्धममरपतिचापम्।
पश्चात् पार्श्वे वापि प्रयाणकाले रिपुवधाय॥
तथा च बृहस्पतिः—
नीलताम्रमविच्छिन्नं द्विगुणं सिद्धमायतम्।
पृष्ठतः पार्श्वयोर्वापि जयायेन्द्रधनुर्भवेत्॥
तथा च गर्गोक्तमयूरचित्रेके पठ्यते—
पूर्वस्यां दिशि संग्रामे भवतीन्द्रधनुर्यदि।
पश्चिमे च प्रयातानां जयस्तत्र न संशयः॥
येषां प्रवृत्ते संग्रामे पश्चादिन्द्रधनुर्भवेत्।
पूर्वेण तु प्रयातानां जयस्तत्र न संशयः॥
येषां प्रवृत्ते संग्रामे वामपार्श्वे च पृष्ठतः।
धनुः प्रादुर्भवेदैन्द्रं जयस्तेषां न संशयः॥
येषां प्रवृत्ते संग्रामे पुरस्ताद्दक्षिणेन वा।
धनुः प्रादुर्भवेदैन्द्रं वधं तेषां विनिर्दिशेत्॥
पश्चिमे तु दिशो भागे भवतीन्द्रधनुर्यदि।
समेघगगनं स्निग्धं वैदूर्यविमलद्युति॥
विद्युच्च निर्मला भाति पूर्वे वायुर्यदा भवेत्।
सप्तरात्रं महावर्षं निर्दिशेद्दैवचिन्तकः॥
यद्येवं तदा द्वितीयं व्याख्यानमशोभनं पूर्वमेव ज्यायः। पश्चात् स्थितमनुलोममिति॥३॥
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४४६ बृहत्संहिता
अन्यदप्याह—
विदिगुद्भूतं दिक्स्वामिनाशनं व्यभ्रजं मरककारि ।
पाटलपीतकनीलैः शस्त्राग्निक्षुत्कृता दोषाः ॥४॥
विदिशा ( ईशान, आग्नेय, नैर्ऋत्य और वायव्य ) में यदि इन्द्रधनुष दिखाई दे तो
उस दिशा के स्वामी ( ८६ वें अध्याय के ३४ वें पद्य में उक्त ) का नाश होता है। थोड़ा
लाल, पीला और नीला इन्द्रधनुष हो तो क्रम से शस्त्रदोष, अग्निदोष और दुर्भिक्ष करता है।
जैसे थोड़ा लाल हो तो शस्त्रदोष, पीला हो तो अग्निदोष और नीला हो तो दुर्भिक्ष करता है।
विदिगुद्भूतं विदिकिस्थितमिन्द्रचापं दिक्स्वामिनाशनम्। तस्यां दिशि यः स्वामी स
नश्यति। दिगधिपतीन् शाकुने वक्ष्यति—
राजा कुमारो नेता च दूतः श्रेष्ठी चरो द्विजः।
गजाध्यक्षश्च पूर्वाद्याः क्षत्रियाद्याश्चतुर्दिशम्।। इति।
एवं व्यभ्रजं मरककारि, विगताभ्रे गगने यदुत्पन्नमिन्द्रचापं तन्मरककारि मरकं करोति।
पाटलो वर्णः कृष्णलोहितः। पीतकः पीतवर्णः। नीलो नीलवर्णः। एतैर्वर्णैर्यदि युक्त-
मिन्द्रधनुर्भवति तदा यथासङ्ख्येन शस्त्राग्निक्षुत्कृता दोषा भवन्ति। पाटलवर्णे शस्त्रकृता
दोषाः। पीते अग्निकृता दोषाः। नीले क्षुत्कृता दुर्भिक्षजा इति।।४।।
अन्यदप्याह—
जलमध्येऽनावृष्टिर्भुवि सस्यवधस्तरौ स्थिते व्याधिः ।
वाल्मीके शस्त्रभयं निशि सचिववधाय धनुरैन्द्रम् ॥५॥
यदि जल में इन्द्रधनुष दिखाई दे तो अनावृष्टि, पृथ्वी पर दिखाई दे तो धान्यों का
नाश, वृक्ष पर दिखाई दे तो व्याधि, वल्मीक ( वमई = दीवड़ा की भीड़ ) पर दिखाई दे
तो शस्त्रभय और रात्रि में दिखाई दे तो मन्त्री का मरण होता है।।५।।
ऐन्द्रं धनुरिन्द्रचापं जलमध्ये यदा दृश्यते तदा अनावृष्टिरवर्षणं भवति। भुवि भूमौ
दृश्यते तदा सस्यानां वधो नाशो भवति। तरौ वृक्षे स्थिते इन्द्रचापे व्याधिः पीडा भवति।
वाल्मीके वल्मीककृते मृत्स्तूपे शस्त्रभयं भवति। निशि रात्राविन्द्रधनुः सचिवस्य मन्त्रिणो
वधाय मरणाय भवति।।५।।
अथ दिग्वशेन फलमाह—
वृष्टिं करोत्यवृष्ट्यां वृष्टिं वृष्ट्यां निवारयत्यैन्द्रयाम् ।
पश्चात् सदैव वृष्टिं कुलिशभृतश्चापमाचष्टे ॥६॥
यदि अनावृष्टि के समय पूर्व दिशा में इन्द्रधनुष दिखाई दे तो वृष्टि और वृष्टि के समय
दिखाई दे तो अनावृष्टि करता है तथा पश्चिम दिशा में स्थित इन्द्रधनुष सदा वृष्टि को करता
है।।६।।
कुलिशभृत इन्द्रस्य चापमैन्द्रयां पूर्वस्यां दिशि दृष्टमवृष्ट्यामनावृष्ट्यां वृष्टिं वर्षणं