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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 728 में से

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पृष्ठ 470

४२८ बृहत्संहिता

अन्यदपि लक्षणमाह—
अम्बरमध्याद् बह्वयो निपतन्त्यो राजराष्ट्रनाशाय।
बम्भ्रमती गगनोपरि विभ्रममाख्याति लोकस्य ॥११॥
आकाश मध्य में बहुत तरह की होकर गिरती हुई उल्का राजा और राष्ट्र के नाश के
लिये होती है तथा जो उल्का आकाश में बार-बार भ्रमण करती है, वह लोगों की विपत्ति
को व्यक्त करती है॥११॥
अम्बरमध्यान्नभोऽन्तः। बह्व्यः प्रभूता अपि निपतन्त्यः सम्पत्तमाना राज्ञो नृपस्य
राष्ट्रस्य जनपदस्य च नाशाय भवन्ति। तथा च गगनोपरि आकाशे योल्का बम्भ्रमती अत्यर्थं
भ्रमति सा लोकस्य जनपदस्य विभ्रमं सम्भ्रममाकुलतामाख्याति कथयति॥११॥
अन्यदप्याह—
संस्पृशती चन्द्रार्कौ तद्विसृता वा सभूकम्पा च।
परचक्रागमनृपभयदुर्भिक्षावृष्टिभयजननी ॥१२॥
जो उल्का सूर्य या चन्द्र को स्पर्श करती है अथवा सूर्य या चन्द्र से निकल कर
भूकम्प करती हुई गिरती है, वह दूसरे राजा का आगमन, राजभय, दुर्भिक्ष और अवृष्टि
करती है।
योल्का चन्द्रार्कौ शशिसूर्यौ संस्पृशती। तौ संस्पृशति। तद्विसृता वा ताभ्यां चन्द्रा-
र्काभ्यां विसृता निर्गता। सभूकम्पा च भूकम्पसहिता। तस्याः पतमानाया भूकम्पमुत्पद्यते।
सा तथाभूता परचक्रागमं परचक्रस्यागमनम्। नृपभयं राजभयम्। दुर्भिक्षभयम्। अवृष्टिभयं
च जनयत्युत्पादयति॥१२॥
अन्यदप्याह—
पौरेतरघ्नमुल्कापसव्यकरणं दिवाकरहिमांश्वोः ।
उल्का शुभदा पुरतो दिवाकरविनिःसृता यातुः ॥१३॥
यदि उल्का सूर्य और चन्द्रमा के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे तो क्रम से पुर में रहने
वाले और बाहर रहने वाले का नाश करती है। जैसे—सूर्य के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे
तो पुरवासियों का और चन्द्र के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे तो बाहर रहने वालों का नाश
करती है। जो उल्का सूर्यकिरण से निकल कर गमन करने वालों के आगे गिरती है, वह
शुभ फल देने वाली होती है॥१३॥
दिवाकरहिमांश्वोरर्कचन्द्रयोः। उल्कापसव्यकरणम्। तयोरेवापसव्येन प्रदक्षिणेन गमनं
करोति। तत्पौरेतरघ्नम्, दिवाकरस्यापसव्यकरणं पौरघ्नं पौरान्नागरान् हन्ति। हिमांशोरुल्का-
पसव्यकरणमितरघ्नम्, इतरे यायिनस्तान् हन्ति। या च दिवाकरविनिःसृता दिवाकरात्
सूर्यान्निर्गता सा यातुर्जिगमिषोः पुरतोऽग्रतः पतिता शुभदा शुभं ददाति॥१३॥
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