बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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नाश होता है। जैसे—प्रतिपदा में परिवेष दिखाई दे तो ब्राह्मणों का, द्वितीया में दिखाई दे
तो क्षत्रियों का, तृतीया में दिखाई दे तो वैश्यों का और चतुर्थी में दिखाई दे तो शूद्रों का
नाश होता है। यदि पञ्चमी में परिवेष दिखाई दे तो श्रेणी ( समान जातियों के संघ ) का,
षष्ठी में दिखाई दे तो नगर का और सप्तमी में दिखाई दे तो कोश का अशुभ करने वाला
होता है। यदि अष्टमी में परिवेष दिखाई दे तो युवराज का तथा नवमी, दशमी और एकादशी
में दिखाई दे तो राजा का अशुभ करने वाला होता है। द्वादशी में नगर का अवरोध और
त्रयोदशी में सेनाओं में आकुलता होती है। यदि चतुर्दशी में दिखाई दे तो रानी को और
पूर्णिमा में राजा को पीड़ा होती है।।१९-२१।।
क्रमशः क्रमेण प्रतिपदादिषु चतुर्षु दिवसेषु परिवेषो दृष्टो विप्रक्षत्रियविट्शूद्रहा भवति।
तद्यथा—प्रतिपदि दृष्टो विप्रान् हन्ति। द्वितीयायां क्षत्रियान् हन्ति। तृतीयायां वैश्यान्। चतुर्थ्यां
शूद्रान् इति। श्रेणीपुरकोशानामिति, बहूनां समानजातीयानां सङ्घः श्रेणी। पञ्चम्यां दृष्टः
श्रेण्या अशुभकारी। षष्ठ्यां पुरस्य नगरस्य। सप्तम्यां कोशस्य गजस्य।
युवराजस्याष्टम्य़ामिति। अष्टम्यां दृष्टो युवराजस्य दोषकरः। परतोऽनन्तरं त्रिषु
दिनेषु नवमीदशम्येकादशीषु पार्थिवस्य राज्ञो दोषकरो न शुभः। द्वादश्यां पुररोधो नगर-
वेष्टनम्। त्रयोदश्यां सैन्यक्षोभ आकुलता।
चतुर्दश्यामभ्युत्थित उत्पन्नः परिवेषो नरपते राज्ञः पत्न्याः पीडां करोति। पञ्चदश्यां
मनुजाधिपस्य राज्ञः पीडां करोति।।१९-२१।।
अधुना परिवेषरेखावशेन शुभाशुभफलमाह—
नागरकाणामभ्यन्तरस्थिता यायिनां च बाह्यस्था।
परिवेषमध्यरेखा विज्ञेयाक्रन्दसाराणाम् ।।२२।।
रक्तः श्यामो रूक्षश्च भवति येषां पराजयस्तेषाम्।
स्निग्धः श्वेतो द्युतिमान् येषां भागो जयस्तेषाम् ।।२३।।
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां परिवेष-
लक्षणाध्यायश्चतुस्त्रिंशः ।।३४।।
यदि परिवेष के अन्दर रेखा दिखाई दे तो नगरवासियों का, बाहर दिखाई दे तो गमन
करने वाले विजयेच्छु राजाओं का और परिवेष के मध्य में रेखा दिखाई दे तो आक्रन्द
( 'आक्रन्दो दारुणे रणे' इत्यमरः। भयङ्कर युद्ध ) की सार वस्तुओं ( सेनाओं ) का
शुभाशुभ करने वाली होती है। जिसके भाग में लाल, काला या रूक्ष वर्ण का परिवेष हो,
उसकी पराजय होती है। जैसे—परिवेष के अन्दर लाल, काला, रूक्ष हो तो नगरवासियों
की, बाहर में हो तो गमन करने वाले विजयेच्छु राजाओं की और परिवेष मध्य में लाल,
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