बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउल्कालक्षणाध्यायः ४३३
बर्हिपुच्छरूपिणी लोकसंक्षयावहा।
सर्पवत् प्रसर्पती योषितामनिष्टदा॥२६॥
हन्ति मण्डला पुरं छत्रवत् पुरोहितम्।
वंशगुल्मवत् स्थिता राष्ट्रदोषकारिणी॥२७॥
व्यालसूकरोपमा विस्फुलिङ्गमालिनी।
खण्डशोऽथवा गता सस्वना च पापदा॥२८॥
विपरीत ( जहाँ से आयी हो वहाँ ही लौट ) जाने वाली उल्का सेठों का, तिरछी
चलने वाली रानियों का, नीचे मुख वाली राजाओं का और ऊपर जाने वाली उल्का
ब्राह्मणों का नाश करती है। जो उल्का मोरपूँछ की तरह हो, वह लोगों का नाश करती है
और जो सर्प की तरह चलती है, वह स्त्रियों को अशुभ फल देने वाली होती है।
मण्डलाकृति वाली उल्का नगर का और छत्राकृति वाली पुरोहित का नाश करती है तथा
वंशगुल्माकारा ( बाँस की बीड़ के समान वाली ) उल्का राष्ट्रभय करती है। सर्प या
सूअर की तरह चिनगारियों की माला पहनी हुई ( चिनगारियों से व्याप्त शरीर वाली ),
खण्ड-खण्ड और शब्दसहित उल्का पाप फल देने वाली होती है॥२५-२८॥
या प्रतीपगा यत आगता तत्रैव गता सा श्रेष्ठिनो हन्ति। तिर्यगा तिर्यक्कृत्वा या
गता सा नृपाङ्गनां नृपस्त्रियं हन्ति। अधोमुखी अवाग्वदना नृपान् राज्ञो हन्ति। अथानन्तर-
मूर्ध्वगा ऊर्ध्वगामिनी ब्राह्मणान् द्विजान् हन्ति।
या चोल्का बर्हिपुच्छरूपिणी मयूरपुच्छाकारा सा लोकसंक्षयावहा, लोकानां जनानां
संक्षयं विनाशमावहति करोति। या च सर्पवत् प्रसर्पती उरगवद् गच्छन्ती सा योषितां
स्त्रीणामनिष्टदा अशुभप्रदा।
या च पतिता मण्डलाकारा भवति सा पुरं नगरं हन्ति नाशयति। या च छत्रवच्छत्राकारा
दृश्यते सा पुरोहितमाचार्यं हन्ति। या च वंशगुल्मवत् स्थिता वंशगुल्माकारा सा राष्ट्रस्य
दोषकारिणी भवति।
व्यालः सर्पः। सूकरो वराहः। तदुपमा तत्सदृशी। तथा विस्फुलिङ्गानामग्निकणानां
माला विद्यते यस्याः। अग्निकणैर्व्याप्तेत्यर्थः। अथवा खण्डशो गता बहुविधं विशीर्णा
सस्वना सशब्दा या च सा पापदा अशुभफलदा भवति॥२५-२८॥
अन्यदप्याह—
सुरपतिचापप्रतिमा राज्यं नभसि विलीना जलदान् हन्ति।
पवनविलोमा कुटिलं याता न भवति शस्ता विनिवृत्ता वा॥२९॥
इन्द्रधनुष की तरह तथा आकाश में उत्पन्न होकर शीघ्र विलीन होने वाली उल्का
मेघों का नाश करती है तथा वायु के प्रतिकूल टेढ़ी होकर चलने वाली और उत्पन्न होकर
नीचे की तरफ नहीं चलने वाली शुभ नहीं होती है॥२९॥
बृ० सं० प्र०-२८
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