बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउल्कालक्षणाध्यायः ४२९
अन्यदप्याह—
शुक्ला रक्ता पीता कृष्णा चोल्का द्विजादिवर्णघ्नी।
क्रमशश्चैतान् हन्युर्मूर्धोरःपार्श्वपुच्छस्थाः ॥१४॥
सफेद, लाल, पीली और काली उल्का क्रम से ब्राह्मण आदि वर्णों का नाश करने
वाली होती है। जैसे—सफेद उल्का ब्राह्मणों का, लाल क्षत्रियों का, पीली वैश्यों का और
काली शूद्रों का नाश करती है तथा जो शिर से ठहरती है वह ब्राह्मणों का, जो बगल से
ठहरती है वह वैश्यों का एवं जो पूँछ से ठहरती है, वह शूद्रों का नाश करती है॥१४॥
शुक्लाद्या उल्का। क्रमशः परिपाट्या द्विजादिवर्णघ्नी द्विजाद्यान् ब्राह्मणाद्यान् वर्णांश्चतुरो
हन्ति घातयति। तद्यथा—शुक्ला ब्राह्मणान् हन्ति। रक्ता क्षत्रियान्। पीता वैश्यान्। कृष्णा
शूद्रान् इति। तथा मूर्धोरःपार्श्वपुच्छस्था उल्का एतानेव हन्युः। मूर्ध्ना तिष्ठतीति मूर्धस्था।
शिरसा या पतति सा ब्राह्मणान् हन्ति। एवमुरसा तिष्ठतीति उरःस्था वक्षस्था या पतति
सा क्षत्रियान्। पार्श्वाभ्यां तिष्ठतीति पार्श्वस्था सा वैश्यान्। पुच्छेन तिष्ठतीति पुच्छस्था सा
शूद्रान् हन्ति॥१४॥
अन्यदप्याह—
उत्तरदिगादिपतिता विप्रादीनामनिष्टदा रूक्षा।
ऋज्वी स्निग्धाखण्डा नीचोपगता च तद्वृद्ध्यै ॥१५॥
उत्तर आदि दिशाओं में पतित उल्का क्रम से ब्राह्मण आदि वर्णों को अशुभ फल देती
है। जैसे— उत्तर दिशा में गिरे तो ब्राह्मणों को, पूर्व में गिरे तो क्षत्रियों को, दक्षिण में गिरे
तो वैश्यों को और पश्चिम में गिरे तो शूद्रों को अशुभ फल देती है। यदि वह उल्का सीधी,
चिकनी, अखण्ड और आकाश के नीचे भाग में जाने वाली हो तो ब्राह्मण आदि वर्णों की
वृद्धि करती है॥१५॥
उत्तरदिगादिपतिता रूक्षा विप्रादीनां ब्राह्मणादीनां वर्णानामनिष्टदा अशुभदा। उत्तरस्यां
पतति सा ब्राह्मणानाम्। पूर्वस्यां क्षत्रियाणाम्। दक्षिणस्यां वैश्यानाम्। पश्चिमायां शूद्राणामिति।
तथा ऋज्वी या स्पष्टा स्निग्धा निर्मला अखण्डाऽशकला नीचोपगता नभसोऽधोगामिनी।
सा तद्वृद्ध्यै, तेषामेव ब्राह्मणादीनामुत्तरदिगादिपतिता वृद्ध्यै वृद्धये भवति॥१५॥
अन्यदप्याह—
श्वावारुणनीलासृग्दहनासितभस्मसन्निभा रूक्षा।
सन्ध्यादिनजा वक्रा दलिता च परागमभयाय ॥१६॥
श्याव (वानर के समान = 'श्यावः स्यात् कपिश' इत्यमरः), रक्त, नील, रुधिर
के समान, अग्नि के समान काली, भस्म की तरह, रूक्ष, सन्ध्याकाल में उत्पन्न, दिन में
उत्पन्न वक्र या खण्डित उल्का पुरवासियों को शत्रु के आगमन से भय कराती है।
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