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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 728 में से

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पृष्ठ 477

अथ परिवेषलक्षणाध्यायः
अथ परिवेषलक्षणं व्याख्यायते। तत्रादावेव स्वरूपप्रदर्शनार्थमाह—
सम्मूर्च्छिता रवीन्द्वोः किरणाः पवनेन मण्डलीभूताः ।
नानावर्णाकृतयस्तन्वभ्रे व्योम्नि परिवेषाः ॥१॥
वायु के द्वारा मण्डलीभूत सूर्य और चन्द्र के किरणस्वरूप, मेघ वाले आकाश में
प्रतिविम्बित होकर जो अनेक वर्ण के दिखाई देते हैं, उसी का नाम परिवेष है॥१॥
रवीन्द्रोरर्कचन्द्रयोः किरणा रश्मयः पवनेन वायुना मण्डलीभूता वृत्ताकाराः कृतास्ते
च तन्वभ्रे स्वल्पमेघे व्योम्नि आकाशे सम्मूर्च्छिताः प्रतिफलिता नानावर्णाकृतयो दृश्यन्ते।
नानाप्रकारो विचित्रो वर्ण आकृतिः संस्थानं येषां ते परिवेषा इत्युच्यन्ते ॥१॥
अथ तेषा संज्ञान्तराण्याह—
ते रक्तनीलपाण्डुरकापोताभ्राभशबलहरितशुक्लाः ।
इन्द्रयमवरुणनिर्ऋतिश्वसनेशपितामहाम्बुकृताः ॥२॥
वे परिवेष इन्द्र, यम, वरुण, निर्ऋति, वायु, शिव, ब्रह्मा और अग्निकृत क्रम से रक्त,
नील, थोड़ा-सा श्वेत, कबूतर के रङ्ग, मेघ वर्ण, शबल ( कृष्ण-श्वेत ), हरे और श्वेत वर्ण
के होते हैं। जैसे—इन्द्रकृत रक्त, यमकृत नील, वरुणकृत थोड़ा श्वेत, निर्ऋतिकृत कबूतर
के रङ्ग, वायुकृत मेघ वर्ण, शिवकृत शबल, ब्रह्माकृत हरा और अग्निकृत श्वेत वर्ण का
होता है॥२॥
ते परिवेषा रक्तादिवर्णा यथासंख्यमिन्द्रादिकृता भवन्ति। तद्यथा—रक्तवर्णः परिवेष
इन्द्रकृतः। नीलवर्णो यमकृतः। पाण्डुर ईषच्छुक्लो वरुणकृतः। कापोतः कपोतवर्णो
निर्ऋतिकृतः। अभ्राभो मेघाभः कृष्णवर्णः श्वसनकृतो वायुनोत्पादित इत्यर्थः। शबलः
कृष्णश्वेतशारवर्ण ईशकृतः शम्भुकृतः। हरितो नीलपीतः पितामहकृतो ब्रह्मकृतः। शुक्लः
श्वेतवर्णोऽम्बुकृतः सोऽपि वरुणकृत एव॥२॥
अन्यदप्याह—
धनदः करोति मेचकमन्योन्यगुणाश्रयेण चाप्यन्ये ।
प्रविलीयते मुहुर्मुहुरल्पफलः सोऽपि वायुकृतः ॥३॥
कुबेर मेचक ( मयूरकण्ठसदृश नील ) वर्ण का परिवेष करता है। अन्य ( इन्द्र
आदि ) मिले हुए रङ्ग के परिवेष करते हैं। जो परिवेष बार-बार उत्पन्न होकर नष्ट हो
जाय, वह वायुकृत थोड़ा फल देने वाला होता है॥३॥
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