बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिवेषलक्षणाध्यायः ४३७
अनेक वर्ण वाला, रक्त वर्ण वाला, रूक्ष, अखण्डित तथा गाड़ी, धनुष या त्रिभुज की तरह
आकृति वाला परिवेष अशुभ फल देने वाला होता है।।५।।
सकलं समग्रं गगनमाकाशमनुचरति गच्छति सकलगगनानुचारी। उदयात्प्रभृत्यस्तं
यावत्तिष्ठतीत्यर्थः। नैकाभो विविधकान्तिः। क्षतजसन्निभो रक्तवर्णः। रूक्षो निःस्नेहः।
असकलः खण्डः। शकटं प्रसिद्धम्। शरासनं चापम्। शृङ्गाटकं त्र्यस्रम्। तद्वत्स्थित-
स्तदाकारः। पापोऽनिष्टफलदः।।५।।
अन्यदप्याह—
शिखिगलसमेऽतिवर्षं बहुवर्णे नृपवधो भयं धूम्रे।
हरिचापनिभे युद्धान्यशोककुसुमप्रभे चापि ॥६॥
मयूरकण्ठ की तरह नील वर्ण का परिवेष अतिवृष्टि, अनेक वर्ण का परिवेष राजा
का नाश, धूम्र वर्ण का परिवेष भय, इन्द्रधनुष की तरह और अशोकपुष्प की तरह अति
लोहित कान्ति वाला परिवेष युद्ध करता है।।६।।
शिखिगलसमे मयूरकण्ठतुल्ये परिवेषे सत्यतिवर्षं प्रभूता वृष्टिर्भवति। बहुवर्णे नानारूपे
नृपस्य राज्ञो वधः। धूम्रवर्णे कृष्णश्यावे भयं भीतिर्भवति। हरिचापनिभे इन्द्र-धनुःसदृशे
युद्धानि भवन्ति। अशोककुसुमप्रभेऽशोकपुष्पसदृशकान्तौ अतिलोहिते। चशब्दा-द्युद्धान्येव
भवन्ति।।६।।
अन्यदप्याह—
वर्णेनैकेन यदा बहुलः स्निग्धः क्षुराभ्रकाकीर्णः।
स्वर्तौ सद्यो वर्षं करोति पीतश्च दीप्तार्कः ॥७॥
एक वर्ण वाला, अधिक निर्मल और उस्तरे के समान मेघों से व्याप्त परिवेष अपने
ऋतु में दिखाई दे तो शीघ्र वृष्टि करता है। यदि पीले वर्ण का परिवेष हो और उस समय
सूर्य के किरण तीक्ष्ण हों तो भी वृष्टि शीघ्र करता है।।७।।
एकेन वर्णेन यदा युक्तो बहुलो घनः। स्निग्धः सस्नेहः। क्षुराभ्रकाकीर्णः क्षुराकारैरभ्रैकरा-
कीर्णो व्याप्तस्तथाभूतः स्वर्तौवात्मीयर्तौ दृष्टस्तस्मिन्नेवाहनि वृष्टिं करोति। एतदुक्तं भवति—
चाषादिसदृशवर्णः शिशिरादित्र्वृतुषु सम्भूत एकवर्णः क्षुराभ्रकाकीर्णः सद्यो वर्ष करोति।
पीतः पीतवर्णो दीप्तस्तीक्ष्णश्चार्कः सूर्यो यस्मिन् सोऽपि चशब्दात् सद्यो वर्षं करोति।
अन्यदप्याह—
दीप्तमृगविहङ्गरुतः कलुषः सन्ध्यात्रयोत्थितोऽतिमहान्।
भयकृत् तडिदुल्कार्द्धर्हतो नृपं हन्ति शस्त्रेण ॥८॥
यदि सूर्य की तरफ मुख किये हुये मृग और पक्षीगण के शब्दयुत, रूक्ष, तीनों
सन्ध्याओं ( प्रातः, मध्याह्न और सायं ) में उत्पन्न और अतिविस्तृत परिवेष दिखाई दे तो
भय करने वाला होता है।।८।।
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