बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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अन्यदप्याह—
विदिगुद्भूतं दिक्स्वामिनाशनं व्यभ्रजं मरककारि ।
पाटलपीतकनीलैः शस्त्राग्निक्षुत्कृता दोषाः ॥४॥
विदिशा ( ईशान, आग्नेय, नैर्ऋत्य और वायव्य ) में यदि इन्द्रधनुष दिखाई दे तो
उस दिशा के स्वामी ( ८६ वें अध्याय के ३४ वें पद्य में उक्त ) का नाश होता है। थोड़ा
लाल, पीला और नीला इन्द्रधनुष हो तो क्रम से शस्त्रदोष, अग्निदोष और दुर्भिक्ष करता है।
जैसे थोड़ा लाल हो तो शस्त्रदोष, पीला हो तो अग्निदोष और नीला हो तो दुर्भिक्ष करता है।
विदिगुद्भूतं विदिकिस्थितमिन्द्रचापं दिक्स्वामिनाशनम्। तस्यां दिशि यः स्वामी स
नश्यति। दिगधिपतीन् शाकुने वक्ष्यति—
राजा कुमारो नेता च दूतः श्रेष्ठी चरो द्विजः।
गजाध्यक्षश्च पूर्वाद्याः क्षत्रियाद्याश्चतुर्दिशम्।। इति।
एवं व्यभ्रजं मरककारि, विगताभ्रे गगने यदुत्पन्नमिन्द्रचापं तन्मरककारि मरकं करोति।
पाटलो वर्णः कृष्णलोहितः। पीतकः पीतवर्णः। नीलो नीलवर्णः। एतैर्वर्णैर्यदि युक्त-
मिन्द्रधनुर्भवति तदा यथासङ्ख्येन शस्त्राग्निक्षुत्कृता दोषा भवन्ति। पाटलवर्णे शस्त्रकृता
दोषाः। पीते अग्निकृता दोषाः। नीले क्षुत्कृता दुर्भिक्षजा इति।।४।।
अन्यदप्याह—
जलमध्येऽनावृष्टिर्भुवि सस्यवधस्तरौ स्थिते व्याधिः ।
वाल्मीके शस्त्रभयं निशि सचिववधाय धनुरैन्द्रम् ॥५॥
यदि जल में इन्द्रधनुष दिखाई दे तो अनावृष्टि, पृथ्वी पर दिखाई दे तो धान्यों का
नाश, वृक्ष पर दिखाई दे तो व्याधि, वल्मीक ( वमई = दीवड़ा की भीड़ ) पर दिखाई दे
तो शस्त्रभय और रात्रि में दिखाई दे तो मन्त्री का मरण होता है।।५।।
ऐन्द्रं धनुरिन्द्रचापं जलमध्ये यदा दृश्यते तदा अनावृष्टिरवर्षणं भवति। भुवि भूमौ
दृश्यते तदा सस्यानां वधो नाशो भवति। तरौ वृक्षे स्थिते इन्द्रचापे व्याधिः पीडा भवति।
वाल्मीके वल्मीककृते मृत्स्तूपे शस्त्रभयं भवति। निशि रात्राविन्द्रधनुः सचिवस्य मन्त्रिणो
वधाय मरणाय भवति।।५।।
अथ दिग्वशेन फलमाह—
वृष्टिं करोत्यवृष्ट्यां वृष्टिं वृष्ट्यां निवारयत्यैन्द्रयाम् ।
पश्चात् सदैव वृष्टिं कुलिशभृतश्चापमाचष्टे ॥६॥
यदि अनावृष्टि के समय पूर्व दिशा में इन्द्रधनुष दिखाई दे तो वृष्टि और वृष्टि के समय
दिखाई दे तो अनावृष्टि करता है तथा पश्चिम दिशा में स्थित इन्द्रधनुष सदा वृष्टि को करता
है।।६।।
कुलिशभृत इन्द्रस्य चापमैन्द्रयां पूर्वस्यां दिशि दृष्टमवृष्ट्यामनावृष्ट्यां वृष्टिं वर्षणं