भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैदरअली ३४१
भारत की विदेशी तिजारत का एक ज़बरदस्त केन्द्र था। दूर दूर
के व्यापारी वहाँ पर जमा होते थे और करोड़ों रुपए का माल
महमूद बन्दर की मण्डियों में भरा रहता था। अंगरेज़ी सेना
महमूद बन्दर की रक्षा के लिए मौजूद थी। करीम साहब ने सेना
सहित महमूद बन्दर पर हमला करके उसे अंगरेज़ी सेना से विजय
किया। क़िले और नगर पर क़ब्ज़ा कर लिया और वहाँ से करोड़ों
का माल लाकर अपने बाप के सामनें पेश किया। इसी तरह की
अनेक विजय टीपू और दूसरे सेनापतियों ने कीं। यहाँ तक कि
स्वयं हैदरअली की सेना बढ़ते बढ़ते करनाटक की राजधानी
अरकाट के निकट जा पहुँची और नवाब मोहम्मद अली को भाग
कर मद्रास में पनाह लेनी पड़ी।
१० अगस्त सन् १७८० को हैदर के कुछ सवार बढ़ते बढ़ते
मद्रास के निकट फिर सेण्ट टामस की पहाड़ी
[हैदरअली फिर] पर जा पहुँचे। हैदर की मुख्य सेना अभी तक
[मद्रास की ओर] करनाटक की राजधानी के आसपास थी, तब
भी मद्रास फिर ख़तरे में था। दो बड़ी सेनाएँ हैदर को परास्त
करने के लिए तैयार की गईं। इनमें पहली जनरल मनरो के अधीन
मद्रास से रवाना हुई और दूसरी कर्नल बेली के अधीन गुण्टूर से
राजधानी अरकाट की ओर चली। इनके अलावा तीन नई सेनाएँ
गुण्टूर, पुदुडुचरी और त्रिचन्नपल्ली में तैयार की गईं।
हैदर ने सबसे पहले टीपू को कर्नल बेली के मुक़ाबले के लिए
गुण्टूर की ओर रवाना किया। मार्ग में १० सितम्बर सन् १७८०