भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० भारत में अंगरेज़ी राज
नवाब मोहम्मदअली अंगरेज़ों के ख़ास मददगारों में से था।
[हाशिया: हैदरअली का] अंगरेज़ों के बहकाने से मोहम्मदअली ने हैदर
[हाशिया: करनाटक विजय] अली के साथ सन्धि के पालन करने से इनकार
[हाशिया: करना] कर दिया। करनाटक के मामले में अंगरेज़
बराबर दख़ल देते रहते थे, जिसकी वजह से करनाटक की प्रजा
अत्यन्त दुखी और असन्तुष्ट थी। हैदरअली अपनी सेना सहित
जुलाई सन् १७८० में सब से पहले करनाटक की ओर बढ़ा।
करनाटक के क़िलों की रक्षा के लिए जगह जगह कम्पनी की सेनाएँ
नियुक्त थीं। यह सब सेनाएँ कर्नल कॉस्बी के अधीन थीं।
हैदरअली ने पहले की तरह अपनी सेना के कई हिस्से किए और
एक हिस्सा अपने अधीन, दूसरा अपने बड़े बेटे टीपू के, तीसरा
टीपू के छोटे भाई करीम साहब के और बाक़ी छोटे बड़े दस्ते
अन्य योग्य हिन्दू और मुसलमान सेनापतियों के अधीन करनाटक
के अनेक क़िलों को विजय करने के लिए अलग अलग दिशाओं
में रवाना कर दिए। करनाटक की दुखी प्रजा ने बड़े हर्ष के
साथ हर जगह हैदर का स्वागत किया। कर्नल कॉस्बी और
नवाब मोहम्मदअली की सेनाओं से जगह जगह हैदर की
लड़ाइयाँ हुईं, जिनमें अंगरेज़ों को हार पर हार खानी पड़ी। नवाब
मोहम्मदअली और उसके अंगरेज़ साथी हैदर की बढ़ती हुई बाढ़
को न रोक सके। क़िले पर क़िला और इलाक़े पर इलाक़ा हैदर के
हाथों में आता चला गया। इनमें एक मुख्य महमूद बन्दर का
क़िला था जिसे अब पोर्टो नोवो कहते हैं। महमूद बन्दर उन दिनों