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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

२८६ भारत में अंग्रेज़ी राज
सन्धि पर क़ायम रहना चाहता था; किन्तु वारन हेस्टिंग्स और
उसके साथियों को इंगलिस्तान से विश्वासघात करने की आज्ञा
मिल चुकी थी।
कम्पनी की सेनाएँ अभी पूना के लिए रवाना भी न हो पाई थीं
कि पूना मन्त्रि मण्डल के फिर से बदलने की ख़बर कलकत्ते पहुँची।
मालूम होता है कि अंग्रेज़ों के नाम मोरोबा के पत्र का हाल किसी
प्रकार खुल गया। मोरोबा अहमदनगर के क़िले में क़ैद कर दिया
गया। नाना फड़नवीस अब पेशवा का प्रधान मन्त्री नियुक्त हुआ।
सखाराम बापू बहुत बूढ़ा था, वह अब दरबार के कामों से अलग
रहता था, उसमें और नाना में फिर से प्रेम हो गया। पूना दरबार
में कोई भी अब हत्यारे राघोबा के पक्ष में न था। किन्तु कम्पनी
की दुरंगी नीति जारी रही। एक ओर मॉस्टिन पूना दरबार में
रह कर नाना फड़नवीस और उसके साथियों को यह विश्वास
दिलाता रहा कि अंग्रेज़ पुरन्धर की सन्धि पर क़ायम रहना चाहते
हैं और शीघ्र उसकी सब शर्तों को पूरा कर देंगे, और दूसरी ओर
वारन हेस्टिंग्स पुरन्धर की इस सन्धि के ख़िलाफ़ राघोबा को
पेशवा बनाने के लिए बम्बई, मद्रास और कलकत्ते से सेनाएँ भेजने
की ज़बरदस्त तैयारियाँ करता रहा।
वारन हेस्टिंग्स ने जो सेना कलकत्ते में तैयार की वह मई सन्
१७७८ में कर्नल लेस्ली के अधीन बंगाल से
[हाशिया: कलकत्ते से अंग्रेज़ी सेना का कूच] चली। इस सेना को भोंसले, होलकर, सींधिया
इत्यादि कई भारतीय नरेशों के इलाक़ों से होकर

पहला मराठा युद्ध २८७

गुज़रना था। इनमें से भौंसले, होलकर और सींधिया तीनों
महाराष्ट्र मण्डल के सदस्य थे। यदि इन नरेशों को अंगरेज़ी
सेना का असली उद्देश मालूम होता तो उस सेना का पूना तक
पहुँच सकना असम्भव होता। इसलिए वारन हेस्टिंग्स ने इन
तीनों को धोखे में रखने के लिए उनके साथ गुप्त पत्र व्यवहार शुरू
कर दिया।
सबसे पहले उसने इन सब नरेशों पर यह ज़ाहिर किया कि
फ्रान्स की सेना भारत के पच्छिमी तट पर हमला करने वाली है
और बंगाल से कम्पनी की सेना केवल फ्रान्सीसियों से अपने इलाक़े
की हिफ़ाज़त करने के लिए भेजी जा रही है, उसका उद्देश किसी
भारतीय नरेश से युद्ध करना नहीं है। इसके अलावा बरार के
राजा मूदाजी भौंसले के साथ उसने एक और ख़ासी सुन्दर चाल
चली। हाल ही में सतारा के राजा की मृत्यु हो चुकी थी, उसके
कोई औलाद न थी। भौंसले कुल की उत्पत्ति शिवाजी के वंश से
थी। वारन हेस्टिंग्स ने मूदाजी भौंसले को उकसाया कि आप
सतारा की गद्दी पर अपना हक़ जमाइए, कम्पनी आपकी मदद
करेगी। वारन हेस्टिंग्स का मतलब यह था कि सतारा की अधिकार
शून्य गद्दी पर एक प्रबल नरेश को बैठाकर पेशवा दरबार के अधि-
कारों को तोड़ दिया जावे, मराठा मण्डल में फूट डाल दी जावे
और फिर मूदाजी को अवध के नवाब वज़ीर की तरह अपने हाथों
में रक्खा जावे।

२८८ भारत में अंगरेज़ी राज
इस काम के लिए एक अंगरेज़ दूत एलयाॅट को बरार के राजा
[बरार के राजा को] के पास भेजा गया। एक अंगरेज़ इतिहास लेखक
[फोड़ने के प्रयत्न] लिखता है :—
“मिस्टर एलयाॅट को इस काम के लिए नियुक्त
किया गया कि तुम जाकर बरार के राजा को मराठा मण्डल से फोड़ो।
एलयाॅट के द्वारा बरार के राजा से बातचीत की गई। एलयाॅट को यह अधिकार
दिया गया कि तुम राजा से कह दो कि गवरनर जनरल अपनी पूरी शक्ति से
सतारा के राजा का तमाम इलाक़ा और पेशवा की पदवी आपको दिलवाने के
लिए तैयार है ।”*
किन्तु मूदाजी ने किसी वजह से वारन हेस्टिंग्स की इस सलाह
को स्वीकार न किया। वारन हेस्टिंग्स की चाल पूरी तरह न चल
सकी। इस पत्र व्यवहार से उसे इतना लाभ अवश्य हुआ कि
बंगाल की सेना शान्ति के साथ बरार के इलाक़े से गुज़र सकी।
होलकर और सींधिया दोनों मालूम होता है फ़्रान्सीसी हमले
के धोखे में आगए। इसके अलावा वे उस समय पूना में थे, इस
लिए उन्होंने इस सेना को अपने राज्यों में से गुज़रने की इजाज़त
दे दी।

  • “Overtures were made to the Raja of Berar through Mr. Elliot, who
    was deputed, with the view of detaching him from the confederacy, and who
    was empowered to offer him the full support of the Governor-General in his
    claims to the possessions of the Raja of Sattara, and to the situation of
    Peshwa.”—Origin of the Pindaries etc., by an Officer in the service of the
    Honorable East India Company, 1818.

पहला मराठा युद्ध २८६
वारेन हेस्टिंग्स ने ठीक यही धोखा नाना फड़नवीस को देना
चाहा और उससे यह इजाज़त मांगी कि पेशवा
[नाना फड़नवीस का अंगरेज़ी सेना को रोकना] के इलाके में से कम्पनी की सेना को जाने दिया
जावे। किन्तु नाना फड़नवीस ताड़ गया,
उसने कम्पनी की सेना के आगे बढ़ने पर एत-
राज़ किया, और जब देखा कि एतराज़ों का कोई फल नहीं हुआ
और अंगरेज़ी सेना बढ़ती चली आ रही है तो मजबूर होकर युद्ध की
तैयारी शुरू कर दी।
मार्ग में इस सेना को कई छोटी मोटी रुकावटें हुईं। बुन्देल-
खण्ड के स्वतन्त्र राजाओं ने उसे अपने इलाके में से गुज़रने से
रोका। किन्तु किसी से लड़कर और किसी से मिलकर, किसी को
चाल से और नवाब भोपाल जैसे को धन से शान्त करते हुए कम्पनी
की सेना आगे बढ़ती रही। मार्ग में ३ अक्तूबर सन् १७७८ को
करनल लेसली की मृत्यु हो गई और करनल गॉडर्ड उसकी जगह
सेनापति नियुक्त हुआ।
बम्बई के अंगरेज़ों ने इस सेना के पहुँचने का इन्तज़ार न
किया। उन्होंने राघोबा को युद्ध के ख़र्च के लिए
[बम्बई से कम्पनी की सेना] एक ख़ासी रक़म बतौर क़र्ज़ के दी, जिसके लिए
उससे पट्टा लिखा लिया और २२ नवम्बर सन्
१७७८ को राघोबा तथा करनल इजर्टन के अधीन एक विशाल सेना
राघोबा को पेशवा की मसनद पर बैठाने के लिए बम्बई से पूना
की ओर रवाना कर दी। यह सेना राघोबा के नाम पर आगे बढ़ती
१६

२६० भारत में अंगरेज़ी राज
जाती थी और उसके साथ साथ मार्ग भर में एलान बँटते जाते थे,
जिनमें महाराष्ट्र की प्रजा से राघोबा की सहायता करने के लिए
प्रार्थना की गई।
इसी बीच मॉस्टिन पूना में अचानक बीमार पड़ गया, उसे
बम्बई लौट आना पड़ा और १ जनवरी सन् १७७६ को उसकी मृत्यु
हो गई।
खरडाला तक बम्बई की इस सेना को किसी ने न रोका, किन्तु
नाना असावधान न था। उसके गुप्तचरों का सगंठन इतना अच्छा
था कि पूना में बैठे हुए उसे भारत भर की राजनैतिक हालत का
ठीक ठीक पता रहता था। सींधिया और होलकर दोनों उस समय
पूना में थे। नाना ने उन्हें सेनापति नियुक्त करके उनके अधीन अंग-
रेज़ों के मुक़ाबले के लिए सेना रवाना की।
मराठे युद्ध विद्या में अत्यन्त होशियार थे। वे धीरे धीरे पीछे
[हाशिया: तालेगाँव की लड़ाई] हटते हुए अंगरेज़ी सेना को पूना से १८ मील दूर
तालेगाँव के मैदान तक ले आए। ६ जनवरी
सन् १७७६ को अंगरेज़ी सेना तालेगाँव पहुँची।
वहाँ पहुँचते ही अंगरेज़ों ने अचानक अनुभव किया कि एक विशाल
मराठा सेना ने उन्हें तीन ओर से घेर रक्खा था। इस पर वे इतने
भयभीत हो गए कि उन्हें फ़ौरन पीछे हटने के सिवा कोई चारा
दिखाई न दिया।
११ जनवरी के ११ बजे रात को अंगरेज़ी सेना ने पीछे हटना

पहला मराठा युद्ध २६१
शुरू किया। उन्होंने स्वयं अपने बहुत से गोले बारूद को आग
लगा दी और भारी तोपों को एक बड़े तालाब
अंग्रेज़ों की दोबारा में फेंक दिया। मराठा सेनापतियों ने अब आगे
हार और दूसरी बढ़कर सामने से शत्रु को रोका और उन्हें चारों
सन्धि ओर से घेर लिया। एक भयङ्कर संग्राम हुआ।
अंग्रेज़ी सेना को दूसरी बार पूरी तरह हार खानी पड़ी। उनके
तमाम अस्त्र शस्त्र छीन लिए गए। पेशवा की सेना उस समय यदि
चाहती तो राघोबा और उसके एक एक देशी और विदेशी साथी
को वहीं पर ख़त्म कर सकती थी, किन्तु अंग्रेज़ों ने हार मान कर
दया की प्रार्थना की। १३ जनवरी को अंग्रेज़ों का एक दूत सन्धि
के लिए मराठों के पास पहुंचा। मराठों ने शरणागत शत्रु को छोड़
दिया। दोनों पक्षों में फिर एक सन्धि हो गई जिसमें अंग्रेज़ों ने
वादा किया कि :-
(१) राघोबा को फ़ौरन पूना दरबार के हवाले कर दिया
जावेगा।
(२) भड़ोच, सूरत और मराठों के जितने और इलाक़ों पर
कम्पनी ने अपना अधिकार जमा रक्खा है वे सब फ़ौरन पेशवा
दरबार को वापस दे दिए जावेंगे।
(३) जो अंग्रेज़ी सेना बंगाल से आ रही है उसे वापस
लौटाने के लिए अंग्रेज़ अफ़सर उस सेना के पास स्पष्ट सन्देशा
भेज देंगे और यह सन्देशा पूना दरबार के एक वकील की मारफ़त
भेजा जावेगा।

२६२ भारत में अंग्रेज़ी राज

(४) जब तक अंगरेज़ इन शर्तों को पूरा न कर दें तब तक के
लिए दो अंगरेज़ अफ़सर बतौर बन्धक मराठों के पास क़ैद रहेंगे।
सन्धि पर बाज़ाब्ता दोनों ओर के सेनापतियों के दस्तख़त हो
गए और कम्पनी तथा पेशवा दरबार दोनों की मोहरें लग गईं।
राघोबा और दो अंगरेज़ मराठों के हवाले कर दिए गए। करनल
गॉडर्ड के नाम पत्र लिखकर पूना दरबार के एक वकील के सुपुर्द
कर दिया गया। नाना फड़नवीस ने राघोबा और उसके साथ
दोनों अंगरेज़ों को माधोजी सींधिया (महादजी सींधिया) के
हवाले कर दिया।
किन्तु अंगरेज़ अब भी अपने छल से बाज़ न आए। बम्बई
[हाशिया: इस] पहुँचते ही उन्होंने उस पत्र को रद्द करने के लिए
[हाशिया: दूसरी सन्धि का] जो हाल की सन्धि के अनुसार मराठा वक़ील
[हाशिया: उल्लङ्घन] की मारफ़त करनल गॉडर्ड के पास भेज दिया
गया था, करनल गॉडर्ड को एक और गुप्त पत्र भेजा और उसमें
लिखा कि आप जितनी जल्दी हो सके बम्बई पहुँच जाइये।
बम्बई की अंगरेजी सेना की हार का समाचार सुनकर करनल
गॉडर्ड पहले सूरत की ओर बढ़ा। ६ फ़रवरी को पूना दरबार का
वक़ील अंगरेज़ सेनापति के पत्र सहित गॉडर्ड से जा मिला। वकील
ने पत्र देकर गॉडर्ड पर बंगाल लौट जाने के लिए ज़ोर दिया।
गॉडर्ड यह झूठ बोल कर कि मेरो सेना का उद्देश पेशवा सरकार
से लड़ना नहीं है, बल्कि उससे मित्रता क़ायम रखना और
फ़्रांसीसियों का मुक़ाबला करना है, बराबर आगे बढ़ता गया।

पहला मराठा युद्ध २६३
२६ फ़रवरी सन् १७७६ को वह अपनी विशाल सेना सहित सूरत
पहुँच गया।
वारन हेस्टिंग्स को जिस समय बम्बई की सेना की इस
अपमानजनक हार और नई सन्धि का पता लगा तो उसने फ़ौरन
करनल गॉडर्ड को लिख भेजा कि आप उस सन्धि की बिलकुल
परवा न करें, और आगे बढ़ते जावें।
मराठा मण्डल के पाँच मुख्य स्तम्भों में से एक महाराजा
[हाशिया: सींधिया और होलकर कुलों की उत्पत्ति] गायकवाड़ को अंगरेज़ अपनी ओर फोड़ चुके थे।
बरार के महाराजा भोंसले ने वारन हेस्टिंग्स की
सलाह न मानी थी, फिर भी वारन हेस्टिंग्स ने
अपनी चालों द्वारा उसे इस संग्राम से तटस्थ
कर रक्खा था। पेशवा की मदद के लिए अब केवल होलकर और
सींधिया दो नरेश बाक़ी रह गए थे।
मालवा का प्रान्त जिसे मध्यभारत कहते हैं, १८ वीं सदी के
प्रारम्भ तक मुग़ल साम्राज्य का एक भाग था और निज़ाम की
सूबेदारी में था। सन् १७२१ में निज़ाम के बग़ावत करने पर दिल्ली
सम्राट ने निज़ाम की जगह एक हिन्दू राजा गिरधरराय को
मालवे का सूबेदार नियुक्त कर दिया। कुछ समय बाद पेशवा ने
राजा गिरधरराय से मालवा विजय करके उत्तरीय भाग अपने एक
अनुचर रानोजी सींधिया को और दक्षिणी भाग एक दूसरे
अनुचर मलहरराव होलकर को दे दिया। यही इन दोनों राजकुलों
का प्रारम्भ था।

२६४ भारत में अंगरेज़ी राज
जिस समय का हाल हम लिख रहे हैं उस समय दक्खिन
महारानी मालवे का शासन उस प्रातःस्मरणीया महारानी
अहिल्याबाई अहिल्याबाई के हाथों में था, जिसकी बुद्धिमत्ता,
योग्यता, न्यायशासन, सच्चरित्र और आदर्श
राजप्रबन्ध की प्रशंसा अनेक भारतीय और विदेशी इतिहास लेखकों
ने मुक्तकण्ठ से की है; जिसकी गाढ़ धार्मिकता के कारण उत्तर से
दक्खिन तक हिन्दू और मुसलमान समस्त भारतीय नरेश उसे
अपनी श्रद्धा और आदर का पात्र स्वीकार करते थे; और जिसका
नाम आज तक भारत के एक एक गांव और एक एक झोपड़े में,
श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता है। अहिल्याबाई इन विदेशियों
के साथ मेल या अपने यहाँ उनका हस्तक्षेप पसन्द न करती थी,
इसलिए वारन हेस्टिंग्स को पेशवा के ख़िलाफ़ सींधिया कुल के
साथ साज़िश करनी पड़ी ।
माधोजी सींधिया उस समय पेशवा के अत्यन्त योग्य और
माधोजी सींधिया विश्वस्त सेनापतियों में से था । वारन हेस्टिंग्स ने
के साथ झूठा वादा देख लिया कि नाना को पंगुल कर देने का सबसे
अच्छा तरीक़ा माधोजी को अपनी ओर फोड़
लेना है । अदूरदर्शी माधोजी विदेशियों की बातों में आकर पेशवा
दरबार के साथ विश्वासघात करने को राज़ी हो गया । तालेगांव
ही में अंगरेज़ों और माधोजी के बीच गुप्त बातचीत शुरू होगई ।
माधोजी को ख़ास लालच यह दिया गया कि यूरोपियन अफ़सरों
और यूरोपियन ढंग के शस्त्र ढालने वालों की मदद से तुम्हारे पास

महारानी अहल्याबाई होलकर
[ चित्रशाला प्रेस पूना की कृपा द्वारा ]

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पहला मराठा युद्ध २६५
एक ज़बरदस्त सेना तैयार कर दी जावेगी, जिसके द्वारा महाराष्ट्र,
बल्कि सारे भारत में तुम्हारा प्रभाव थोड़े ही दिनों के अन्दर
सर्वोपरि हो जावेगा। इस चाल के ज़रिये अंगरेज़ उससे राघोबा
और अपने दोनों बन्धकों को छुड़ा लेना चाहते थे ।
अन्त में माधोजी, राघोबा और अंगरेज़ों के बीच गुप्त सन्धि
[हाशिया: सींधिया और राघोबा के साथ गुप्त सन्धि] होगई, जिसमें तय हुआ कि बालक माधोराव
नारायन जिसकी आयु उस समय पाँच साल की
थी, पेशवा की मसनद पर क़ायम रहे, उसी के
नाम के सिक्के ढलते रहें, राघोबा का बेटा
बाजीराव जिसकी आयु चार साल की थी, पेशवा का दीवान
नियुक्त हो, माधोजी नाबालिग दीवान के नाम से शासन का सारा
काम करे और राघोबा को पेशवा दरबार से बारह लाख सालाना
पेन्शन पर झाँसी भेज दिया जावे । इसके अलावा अंगरेज़ों ने
भड़ोच का ज़िला माधोजी को और ४१,००० रुपए नक़द उसके
आदमियों को देने का वादा किया । स्वार्थान्ध माधोजी ने अपने
स्वामी पेशवा के साथ विश्वासघात करके राघोबा और दोनों
अंगरेज़ बन्धकों को चुपके से छोड़ दिया । राघोबा फिर अंगरेज़ों
से जा मिला । इसके थोड़े ही दिनों के अन्दर अंगरेज़ों ने माधोजी
सींधिया के साथ ठीक वैसा ही बर्ताव किया, जैसा वे बंगाल में
अमींचन्द से लेकर मीर जाफ़र तक एक एक देशघातक के साथ
कर चुके थे; फिर भी उस समय भारत के अन्दर कम्पनी की सत्ता
के जमने में माधोजी ने ज़बरदस्त मदद दी ।

२६६ भारत में अंगरेज़ी राज
नाना फड़नवीस को जब अंगरेज़ों के इरादों का पता चला
और मालूम हुआ कि गॉडर्ड की सेना गुजरात पहुँच गई है, तो
उसने एक ओर माधोजी सींधिया को सेना देकर गुजरात भेजा
ताकि वह गुजरात से अंगरेज़ों को बाहर निकाल दे और दूसरी
ओर मूदाजी भोंसले को आज्ञा दी कि तुम फ़ौरन तीस हज़ार सेना
लेकर बंगाल पर चढ़ाई कर दो । नाना की तजवीज़ें काफ़ो ज़बरदस्त
थीं; किन्तु नाना को उस समय पता न था कि माधोजी और
अंगरेज़ों में पहले ही गुप्त सन्धि हो चुकी थी और मूदाजी भोंसले
भी भीतर से वारन हेस्टिंग्स के साथ मिला हुआ था। माधोजी
का बाक़ी हाल आगे चल कर दिया जावेगा । मूदाजी ने नाना को
धोखे में रखने के लिए ३०,००० सेना लेकर बंगाल पर चढ़ाई
अवश्य की, किन्तु उसने पहले हो से वारन हेस्टिंग्स को एक गुप्त
पत्र लिख दिया कि—"मैं यह चढ़ाई केवल नाना फड़नवीस और
दूसरे मराठों को खुश करने के लिए कर रहा हूँ, यह केवल दिखावा
है। मैं मार्ग में जानकर इतनी देर लगा दूँगा कि बरसात से पहले
बंगाल की सरहद पर न पहुँच सकूँ और फिर बरसात का बहाना
लेकर बरार वापस लौट आऊँगा।" मूदाजी भोंसले ने हेस्टिंग्स के
' साथ अपने वचन का पालन किया। सारांश यह कि इन दोनों
मराठा सेनापतियों ने अपने स्वामी और देश दोनों के साथ
विश्वासघात किया ।
कर्नल गॉडर्ड अब सूरत में बैठा हुआ एक ओर नाना फड़नवीस
के पास सुलह के पत्र भेज रहा था और दूसरी ओर पूना पर

पहला मराठा युद्ध २६७
चढ़ाई करने की ज़ोरदार तैयारी कर रहा था। नाना फड़नवीस ने
गॉडर्ड के पत्रों के उत्तर में स्पष्ट लिख भेजा कि
[हाशिया: अंग्रेज़ों का] सुलह की बातचीत के लिए सबसे पहली शर्त
[हाशिया: सींधिया के साथ] यह है कि पिछली सन्धि के अनुसार साष्टी का
[हाशिया: विश्वासघात] टापू और विद्रोही राघोबा दोनों पेशवा दरबार
के हवाले कर दिए जावें। किन्तु साष्टी पर अंगरेज़ों के शुरू से
दाँत थे और राघोबा इस तमाम खेल में उनके हाथ का तुरुप था।
इस दरमियान गॉडर्ड ने गुजरात में पेशवा के इलाक़ों पर धावे
मारने शुरू किए और वहाँ की प्रजा को ख़ूब लूटा और तबाह
किया। माधोजी सींधिया नाना को दिखाने के लिए सेना लेकर
गुजरात पहुँच गया था और इस समय गुजरात में मौजूद था।
किन्तु अंगरेज़ों ने बड़ी सफलता के साथ उसे झूठी आशाओं के
नशे में सुला रक्खा था। नाना फड़नवीस ने प्रजा की बरबादी
और माधोजी की नाफ़रमानी का हाल सुनकर अब होलकर को
सेना सहित गुजरात भेजा। किन्तु गायकवाड़ इस समय तक
मराठा मण्डल से पृथक हो चुका था। माधोजी सींधिया विदेशियों
के हाथों में खेल रहा था। मूदाजी भोंसले वारन हेस्टिंग्स की
चालों में आकर पेशवा के साथ विश्वासघात कर चुका था। इन
हालतों में अकेला होलकर गॉडर्ड की सेना के हाथों गुजरात की
प्रजा की बरबादी को न रोक सका।
१६ मार्च सन् १७८० को माधोजी सींधिया ने अपना एक
वकील गॉडर्ड के पास भेजा और प्रार्थना की कि तालेगाँव की गुप्त

२६८ भारत में अंग्रेज़ी राज
सन्धि के अनुसार राघोबा को झाँसी की ओर भेज दिया जाय,
ताकि मैं राघोबा के पुत्र बाजीराव को साथ लेकर पूना के लिए
रवाना हो जाऊँ । किन्तु गॉडर्ड का मतलब निकल चुका था। वह
राघोबा को इस तरह हाथ से छोड़ देने के लिए तैयार न था। उसने
अब तालेगाँव की गुप्त सन्धि को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
माधोजी को ज़बरदस्त नैराश्य और दुख हुआ। गॉडर्ड ने इस
हालत में उसे देर तक गुजरात में रहने देना ठीक न समझा। चन्द
रोज़ के अन्दर ही उसने बिल्कुल अचानक माधोजी की सेना पर
हमला कर दिया। माधोजी की सेना को तैयार होने का समय भी
न मिल सका। जिस तरह पेशवा के दल में माधोजी अंग्रेज़ों से
मिल गया था, उसी प्रकार माधोजी की सेना में न मालूम कितने
इस समय गॉडर्ड से मिले हुए होंगे। अन्त में गॉडर्ड ने कर्त्तव्य
विमूढ़ माधोजी और उसकी सेना को गुजरात से खदेड़कर बाहर
कर दिया। कर्नल गॉडर्ड के लिए अब केवल पूना पर हमला करना
बाक़ी था।
दूरदर्शी नाना को जब माधोजी की कर्त्तव्य विमुखता, होलकर
[पार्श्व: समस्त भारतीय] की असफलता और अंग्रेज़ों के इरादों का पता
[पार्श्व: नरेशों को मिलाने] चला, तो उसने फ़ौरन हिन्दोस्तान के क़रीब
[पार्श्व: की नाना की] क़रीब सब मुख्य मुख्य नरेशों को इन विदेशियों
[पार्श्व: कोशिश] के ख़िलाफ़ अपने साथ मिलाने के ज़ोरदार प्रयत्न
शुरू किए। हैदराबाद के निज़ाम, अरकाट के
नवाब, मैसूर के सुलतान हैदरअली और दक्खिन के अन्य कई

पहला मराठा युद्ध २६६
छोटे छोटे हिन्दू और मुसलमान नरेशों को उसने इस विषय के पत्र
लिखे। नाना, निज़ाम और हैदरअली में तय हो गया कि तीनों एक
साथ अपने अपने पास के अंगरेज़ी इलाक़ों पर हमला करके अंगरेज़ों
को हिन्दोस्तान से बाहर निकाल दें। नाना की ओर से मूदाजी
भोंसले तीस हज़ार सेना सहित अंगरेज़ों को बंगाल से निकालने
के लिए भेजा जा चुका था। निज़ाम और हैदरअली की कोशिशों
का ज़िक्र और आगे चल कर किया जावेगा। इसके अलावा जैसा
ऊपर लिखा जा चुका है, कम से कम उपचार के लिए पूना के पेशवा
दिल्ली के सम्राट को सारे भारत का अधिराज स्वीकार करते थे
और पेशवा का एक वकील सम्राट के दरबार में रहा करता था।
नाना को मालूम हुआ कि वारन हेस्टिंग्स दिल्ली सम्राट को अपनी
ओर करने की कोशिशों में लगा हुआ है।
नाना ने ६ मई सन् १७८० को अपने दिल्ली के वकील पुरुषोत्तम
महादेव हिङ्गने के नाम इस मज़मून का एक पत्र
[हाशिया: दिल्ली सम्राट के नाम] लिखा :—
[हाशिया: नाना का पत्र]
“यहाँ पर समाचार मिला है कि कलकत्ते के अंगरेज़
दिल्ली के सम्राट के साथ पत्र व्यवहार करके सम्राट को अपनी ओर करने
वाले हैं। इसलिए आप सम्राट और नज़फ़ ख़ाँ दोनों को इस तरह साफ़ साफ़
समझा दीजिये।
“इन टोपी वालों (यूरोप निवासियों) के तरीक़े बेईमानी और चाल
बाज़ी के हैं। इनकी आदत यह है कि पहले तो किसी हिन्दोस्तानी नरेश
को ख़ुश करते हैं, उसे अपने साथ सन्धि करने के फ़ायदे दिखलाते हैं

इस पत्र को पढ़कर ऐसा मालूम होने लगता है मानों वह सन् १८५७

  • "मानों": मानों.
  • "१८५७": १८५७.

के प्रसिद्ध नाना धोरडुपन्त के हाथ का लिखा हुआ हो । नाना

  • As analyzed, "धोरडुपन्त".
    Wait, could it be "धोण्डुपन्त"?
    Let's look at the transcription conventions: if a letter is clearly a printing error or intended as something, usually in transcription we reproduce what is printed, or note it. Let's look very carefully at "धोरडुपन्त". Yes, it is typed धोरडुपन्त.

फड़नवीस जो बात चाहता था वह न हो सकी । किन्तु उसके

  • "फड़नवीस जो बात चाहता था वह न हो सकी । किन्तु उसके"

प्रयत्न बिल्कुल निष्फल नहीं गए ।

  • "प्रयत्न बिल्कुल निष्फल नहीं गए ।"

Everything is verified and clear. Output clean markdown with to .३०० भारत में अंगरेज़ी राज
और फिर उसे क़ैद करके स्वयम् उसके राज पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं। मिसाल
के तौर पर शुजाउद्दौला, मोहम्मदअली ख़ाँ, अरकाट के सूबे और तञोर के
नरेश इत्यादि की हालत देख लीजिये । इसलिए आपका इन टोपी वालों को
[L5

पहला मराठा युद्ध ३०१
करनल गॉडर्ड अपनी विशाल सेना सहित पूना की ओर बढ़ा।
[हाशिया: तीसरी बार अंग्रेज़ों] रास्ते में कल्यान, बसई और कोकन प्रान्त के अन्य
[हाशिया: की हार] कई स्थानों को उसकी सेना ने खूब रौंदा और
बरबाद किया। किन्तु अभी वह मराठा साम्राज्य
के केन्द्र पूना के निकट भी न पहुँच पाया था कि भोरघाट के ऊपर
हरिपन्त फड़के, परशुराम भाऊ और होलकर के अधीन पेशवा की
सेना ने उसे रास्ते ही में घेर लिया। मैदान खूब गरम हुआ, किन्तु
फिर तीसरी बार विजय मराठों ही की ओर रही और अप्रेल
सन् १७८१ के आख़ीर में जान और माल दोनों की भारी हानि
उठाकर पूना के दर्शन किए बिना ही कम्पनी की इस विशाल सेना
को उसी तरह ज़िल्लत के साथ पीछे भागना पड़ा जिस तरह जनवरी
सन् १७७६ में बम्बई की सेना को भागना पड़ा था। बचे खुचे
आदमी जान बचाकर बम्बई पहुँच गए, किन्तु इस दूसरी लज्जा
जनक हार से अंग्रेज़ों को मराठों की वीरता और युद्ध कौशल का
खूब पता चल गया और उनकी हिम्मत कुछ अर्से के लिए टूट गई।
इस दरमियान भारत के दूसरे हिस्सों में भी वारन हेस्टिंग्स की
[हाशिया: अंग्रेज़ों का गोहद] साज़िशें जारी थीं। माधोजी सींधिया को अंग्र-
[हाशिया: के राना को अपनी] रेज़ों की दग़ाबाज़ी का काफ़ी तजरुबा हो चुका
[हाशिया: ओर फोड़ना] था। उसकी हालत इस समय अधमरे साँप की
सी थी। वारन हेस्टिंग्स ने सबसे पहले उसे पूरी
तरह कुचल डालना ज़रूरी समझा। सींधिया का मुख्य गढ़ ग्वालियर
था। वारन हेस्टिंग्स ने सींधिया के एक बाजगुज़ार गोहद नरेश

३०२ भारत में अंगरेज़ी राज
को ग्वालियर का लालच देकर सींधिया के ख़िलाफ़ अपनी ओर
फोड़ लिया। कप्तान पोफ़म के अधीन कम्पनी की एक सेना
ग्वालियर भेजी गई और गोहद के राना की सहायता से ४ अगस्त
सन् १७८० को ग्वालियर का क़िला माधोजी सींधिया से जीत कर
गोहद के राना को दे दिया गया। आज कल के धौलपुर के जाट
राना उसी गोहद के राना की औलाद हैं। इसके बाद करनल
कारनक ने वारन हेस्टिंग्स की आज्ञा से फ़रवरी और मार्च सन्
१७८१ में सींधिया के अनेक स्थानों को रौंदा, उन्हें लूटा और
तबाह किया।
माधोजी को अपने विश्वासघात की काफ़ी सज़ा मिल चुकी
थी। वारन हेस्टिंग्स ने इसके बाद माधोजी का सर्वनाश करने के
लिए राजपूताने के नरेशों को उसके विरुद्ध भड़काना चाहा, किन्तु
माधोजी के सौभाग्य से इसमें हेस्टिंग्स को सफलता न हो सकी।
इतने में हेस्टिंग्स को मालूम हुआ कि अंगरेज़ों के विरुद्ध नाना
फ़ड़नवीस, निज़ाम और हैदरअली में सलाह होगई है। मूदाजी
भोंसले का बंगाल पर हमला हेस्टिंग्स की चालों और मूदाजी के
विश्वासघात द्वारा विफल हो ही चुका था। केवल दो प्रबल शक्तियाँ
मैदान में बाक़ी थीं, निज़ाम और हैदरअली। हेस्टिंग्स ने इन दोनों
को अपनी ओर फोड़ने के भरसक यत्न किए। निज़ाम के साथ
उसे पूरी सफलता हुई, किन्तु हैदरअली को वह अपनी ओर न
फोड़ सका। वास्तव में हैदरअलो और निज़ाम के चरित्र में बहुत
बड़ा अन्तर था।

पहला मराठा युद्ध ३०३
हैदरअली एक निर्धन घराने में पैदा हुआ था। केवल अपनी
[हैदरअली और] वीरता और योग्यता के बल वह एक मामूली
[निज़ाम में तुलना] सिपाही से बढ़ते बढ़ते एक विशाल राज का
स्वामी बन गया था। वह प्रजापालक था और
उसकी प्रजा उससे प्रेम करती थी। अपने देश या देशवासियों के
साथ उसने कभी भी दग़ा नहीं की। हैदरअली के चरित्र, अंगरेज़ों
के साथ उसके युद्ध और उसके अद्भुत पराक्रम का बयान अगले
अध्याय में किया जायगा। इसके ख़िलाफ़ हैदराबाद के राजकुल
का संस्थापक निज़ामुलमुल्क दिल्ली का एक चलता हुआ दरबारी
था, जो केवल चालबाज़ियों से बढ़ा और जिसने अपने स्वामी
दिल्ली सम्राट के साथ विश्वासघात करके अपने लिए एक स्वतन्त्र
राज क़ायम किया। जिस समय दोनों प्रसिद्ध भाई सय्यद अब्दुल्ला
और सय्यद हुसेनअली उस 'जज़िये' को, जिसे अकबर ने रद्द कर
दिया था और जिसे औरङ्गज़ेब ने दोबारा जारी किया था, फिर से
रद्द करवा कर तथा अन्य अनेक उपायों से मुग़ल साम्राज्य के नाश
को रोकने के प्रयत्न कर रहे थे, उस समय निज़ामुलमुल्क ने इन
दोनों दूरदर्शी भाइयों के ख़िलाफ़ साज़िशें करके उनकी सत्ता को
नष्ट किया। निज़ामुलमुल्क ने ही मराठों को उकसाकर मुग़ल
साम्राज्य पर उनसे हमले करवाए। निज़ामुलमुल्क ही ने नादिरशाह
को ईरान से बुलवा कर भारत तथा भारत सम्राट दोनों को अपमा-
नित करवाया। निज़ामुलमुल्क ही सम्राट का पहला सूबेदार था,
जिसने अपने सूबे को साम्राज्य से पृथक करके साम्राज्य के अंगभंग