भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहला मराठा युद्ध २८६
वारेन हेस्टिंग्स ने ठीक यही धोखा नाना फड़नवीस को देना
चाहा और उससे यह इजाज़त मांगी कि पेशवा
[नाना फड़नवीस का अंगरेज़ी सेना को रोकना] के इलाके में से कम्पनी की सेना को जाने दिया
जावे। किन्तु नाना फड़नवीस ताड़ गया,
उसने कम्पनी की सेना के आगे बढ़ने पर एत-
राज़ किया, और जब देखा कि एतराज़ों का कोई फल नहीं हुआ
और अंगरेज़ी सेना बढ़ती चली आ रही है तो मजबूर होकर युद्ध की
तैयारी शुरू कर दी।
मार्ग में इस सेना को कई छोटी मोटी रुकावटें हुईं। बुन्देल-
खण्ड के स्वतन्त्र राजाओं ने उसे अपने इलाके में से गुज़रने से
रोका। किन्तु किसी से लड़कर और किसी से मिलकर, किसी को
चाल से और नवाब भोपाल जैसे को धन से शान्त करते हुए कम्पनी
की सेना आगे बढ़ती रही। मार्ग में ३ अक्तूबर सन् १७७८ को
करनल लेसली की मृत्यु हो गई और करनल गॉडर्ड उसकी जगह
सेनापति नियुक्त हुआ।
बम्बई के अंगरेज़ों ने इस सेना के पहुँचने का इन्तज़ार न
किया। उन्होंने राघोबा को युद्ध के ख़र्च के लिए
[बम्बई से कम्पनी की सेना] एक ख़ासी रक़म बतौर क़र्ज़ के दी, जिसके लिए
उससे पट्टा लिखा लिया और २२ नवम्बर सन्
१७७८ को राघोबा तथा करनल इजर्टन के अधीन एक विशाल सेना
राघोबा को पेशवा की मसनद पर बैठाने के लिए बम्बई से पूना
की ओर रवाना कर दी। यह सेना राघोबा के नाम पर आगे बढ़ती
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