भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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सन्धि पर क़ायम रहना चाहता था; किन्तु वारन हेस्टिंग्स और
उसके साथियों को इंगलिस्तान से विश्वासघात करने की आज्ञा
मिल चुकी थी।
कम्पनी की सेनाएँ अभी पूना के लिए रवाना भी न हो पाई थीं
कि पूना मन्त्रि मण्डल के फिर से बदलने की ख़बर कलकत्ते पहुँची।
मालूम होता है कि अंग्रेज़ों के नाम मोरोबा के पत्र का हाल किसी
प्रकार खुल गया। मोरोबा अहमदनगर के क़िले में क़ैद कर दिया
गया। नाना फड़नवीस अब पेशवा का प्रधान मन्त्री नियुक्त हुआ।
सखाराम बापू बहुत बूढ़ा था, वह अब दरबार के कामों से अलग
रहता था, उसमें और नाना में फिर से प्रेम हो गया। पूना दरबार
में कोई भी अब हत्यारे राघोबा के पक्ष में न था। किन्तु कम्पनी
की दुरंगी नीति जारी रही। एक ओर मॉस्टिन पूना दरबार में
रह कर नाना फड़नवीस और उसके साथियों को यह विश्वास
दिलाता रहा कि अंग्रेज़ पुरन्धर की सन्धि पर क़ायम रहना चाहते
हैं और शीघ्र उसकी सब शर्तों को पूरा कर देंगे, और दूसरी ओर
वारन हेस्टिंग्स पुरन्धर की इस सन्धि के ख़िलाफ़ राघोबा को
पेशवा बनाने के लिए बम्बई, मद्रास और कलकत्ते से सेनाएँ भेजने
की ज़बरदस्त तैयारियाँ करता रहा।
वारन हेस्टिंग्स ने जो सेना कलकत्ते में तैयार की वह मई सन्
१७७८ में कर्नल लेस्ली के अधीन बंगाल से
[हाशिया: कलकत्ते से अंग्रेज़ी सेना का कूच] चली। इस सेना को भोंसले, होलकर, सींधिया
इत्यादि कई भारतीय नरेशों के इलाक़ों से होकर