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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

पहला मराठा युद्ध २७६

भेजा। इस समय तक फड़के की विजयी सेना पूना वापस पहुँच
चुकी थी। मॉस्टिन अब पूना सं गुजरात चला आया और वहाँ पर
उसने अपनी चालों का जाल बिछाना शुरू किया। अन्त में अंगरेज़ों
और फ़तहसिंह गायकवाड़ के बीच सन्धि हो गई।
इस सन्धि के अनुसार भड़ोच, चिखली, वड़ियाव और कोरल
के तीनों परगने, जिनकी आमदनी कई लाख रुपए सालाना थी,
बिना किसी तरह की लड़ाई के कम्पनी को मिल गए और सयाजी
राव गायकवाड़ अंगरेज़ों की मदद् सं बड़ोदा की गद्दी पर बैठ
गया। गायकवाड़ का राज कुल अभी तक पेशवा को अपना
अधिराज मानता था, किन्तु अब से वह सदा के लिए मराठा
मराडल से फूट कर अलग हो गया और गुजरात में अंगरेज़ों के पैर
जम गए।
सूरत की सन्धि के अनुसार अंगरेज़ों ने साष्टी और बसई
दोनों पर क़ब्ज़ा कर लिया। किन्तु सूरत की सन्धि को पेशवा
सरकार ने स्वीकार न किया था और बाग़ी राघोबा को पेशवा
की मसनद पर बैठाने का निष्फल प्रयत्न कर अंगरेज़ पूना सरकार
को अपना दुशमन बना चुके थे।
अंगरेज़ों के सामने उस समय वास्तव में एक कठिन समस्या
थी। राघोबा के पेशवा बन सकने की सम्भावना बहुत ही कम थी
और बाग़ी राघोबा को मदद देने के बाद पूना सरकार से बातचीत
करने का उन्हें अब कोई मुंह न था। उनके गुप्तचर मॉस्टिन का
अब फिर पूना में घुस सकना तक नामुमकिन मालूम होता था।

२४० भारत में अंगरेज़ी राज
वारन हेस्टिंग्स को इस समय एक ख़ासी अच्छी तरकीब
[वारन हेस्टिंग्स की] सूझी। उसने सीधे कलकत्ते से अपने एक विशेष
[दोरुखी चालें] दूत कर्नल अपटन को पूना दरबार के पास भेजा
और यह रुख़ लिया कि बम्बई की कौन्सिल ने
राघोबा के साथ जो सन्धि की है और उसे जो कुछ मदद दी है,
वह मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ और मेरी इजाज़त के बिना दी गई है,
इसलिए वह सन्धि नाजायज़ है और अंगरेज़ सरकार न बाग़ी
राघोबा का साथ देना चाहती है और न पेशवा सरकार से लड़ना
चाहती है।
वारन हेस्टिंग्स ने बम्बई सरकार को हुकुम दिया कि पेशवा
दरबार से युद्ध फ़ौरन बन्द किया जावे और कर्नल कीटिङ्ग और
उसकी सेना को वापस बुला लिया जावे। बम्बई सरकार ने आज्ञा
पाते ही कीटिङ्ग और उसकी रही सही सेना को सूरत वापस बुला
लिया। पेशवा दरबार के मन्त्री उस समय पुरन्धर में थे, इसलिए
कर्नल अपटन २८ दिसम्बर सन् १७७५ को पुरन्धर पहुँचा।
सखाराम बापू उस समय पेशवा का प्रधान मन्त्री था। कर्नल
अपटन के पूना जाने का उद्देश ज़ाहिरा यह था कि बम्बई कौन्सिल
के समस्त कार्यों को नाजायज़ बताकर उनके लिए कम्पनी की ओर
से दुख प्रदर्शित करे और पेशवा दरबार के साथ कम्पनी की मित्रता
और वफ़ादारी प्रकट करे। किन्तु कर्नल अपटन के पास वारन
हेस्टिंग्स के दस्तख़ती दोहरे पत्र मौजूद थे। एक सखाराम बापू के
नाम जिसका आशय ऊपर दिया जा चुका है और दूसरा बाग़ी

पहला मराठा युद्ध २८१
राघोबा के नाम, जिसमें वारन हेस्टिंग्स ने राघोबा के प्रति मित्रता
प्रकट करते हुए बम्बई कौन्सिल की समस्त काररवाई का समर्थन
किया। अपटन को हिदायत कर दी गई थी कि यह दूसरा
पत्र केवल उस सूरत में उपयोग करना, जब कि इस बीच किसी
सबब से राघोबा के पक्ष की जीत हो चुकी हो। साथ ही हेस्टिंग्स
ने जो पत्र सखाराम बापू के नाम भेजा, उसमें भी अपनी मित्रता
प्रकट करते हुए पेशवा दरबार से प्रार्थना की कि साष्टी और बसई
अंगरेज़ों ही के पास रहने दिए जायें।
पेशवा दरबार के मन्त्री, जिनमें सखाराम बापू और नाना
[मराठों को] फ़ड़नवीस जैसे नीतिज्ञ मौजूद थे, मामले को खूब
[सन्देह] समझते थे। करनल अपटन ने वारन हेस्टिंग्स
के नाम २ फ़रवरी सन् १७७६ के पत्र में लिखा—
"वे मुझसे हज़ार बार पूछते हैं कि 'आप बराबर इतनी वफ़ादारी की
क़समें क्यों खाते हैं ? बम्बई गवरमेण्ट की छेड़ी हुई लड़ाई को तो आप लोग
बुरा कहते हैं और उस लड़ाई द्वारा जो इलाके आपको मिल गए हैं उन्हें
अपने पास रखने के लिए इतने इच्छुक हैं, यह सब मामला क्या है ?'" *
पेशवा दरबार ने इस बात पर ज़िद की कि अंगरेज़ फ़ौरन
साष्टी और बसई खाली कर दें। मजबूर होकर अपटन ने ७ फ़रवरी

  • "They ask me a thousand times, why we make such professions of
    honor? How disapprove the war entered into by the Bombay-Government,
    when we are so desirous of availing ourselves of the advantages of it?"—
    Colonel Upton to warren Hastings, 2nd Feb. 1776.

२८२ भारत में अंगरेज़ी राज
सन् १७७६ को वारन हेस्टिंग्स को लिख दिया कि—"पूना दरबार
हमारी शर्तों पर राज़ी नहीं होता।"
वारन हेस्टिंग्स ने जब देख लिया कि सुलह से काम नहीं चल
हेस्टिंग्स की युद्ध सकता, तो अपटन के पूना रहते हुए फ़ौरन एक
की तय्यारी बहुत बड़े पैमाने पर जंग की तैयारियाँ शुरू कर
दीं। कलकत्ते और मद्रास दोनों स्थानों पर पूना
भेजने के लिए सेनाएँ जमा की जाने लगीं। भोंसले, सींधिया और
होलकर, तीनों को हेस्टिंग्स ने अपनी ओर फोड़ने की कोशिशें शुरू
कीं। हैदरअली और निज़ाम से भी उसने गुप्त पत्र व्यवहार शुरू
किया, और यह कोशिश की कि यदि हैदरअली और निज़ाम पेशवा
दरबार के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों को मदद न भी दें तो कम से कम
तटस्थ रहें।
पूना दरबार को इन सब बातों की ख़बर मिलती रही। इतिहास
से पता नहीं चलता कि और कौन कौन सी बातें थीं, जिनसे डर
कर या मजबूर होकर अन्त में नाना फड़नवीस जैसे नीतिज्ञों ने
अपने विचार बदल दिए। कर्नल अपटन जिस समय निराश
होकर पुरन्धर से बंगाल लौटने को तैयार हुआ, कहा जाता है कि
पेशवा के मन्त्रियों ने उसे रोक लिया।
३ जून सन् १७७६ को पुरन्धर में पेशवा दरबार और कम्पनी
पुरन्धर की सन्धि के दरमियान एक नई सन्धि हुई, जिसमें सूरत
वाली नाजायज़ सन्धि को रद्द क़रार दिया
गया, अंगरेज़ों ने वादा किया कि हम फिर कभी राघोबा को

पहला मराठा युद्ध २८३
सहायता न देंगे, बसई' का क़िला पूना दरबार को लौटा देंगे और
इस दरबार के साथ सदा मित्रता क़ायम रक्खेंगे। पूना दरबार ने
राघोबा के गुज़ारे के लिए प्रबन्ध कर दिया और "दोस्ताना क़ायम
रखने के लिए" कम्पनी को साष्टी का टापू, भड़ौच शहर की माल-
गुज़ारी और उसके आस पास तीन लाख रुपए सालाना का
इलाक़ा बतौर जागीर दे दिया। यह भी तय हुआ कि कम्पनी का
एक वकील पेशवा के दरबार में रहा करे। पूना दरबार को
निस्सन्देह यह आशा थी कि इस उदारता के बाद हम इन विदेशी
व्यापारियों के साथ अमन से रह सकेंगे, किन्तु उनकी यह आशा
झूठी निकली। पूना के चतुर ब्राह्मण भी कूट नीति में इन विदेशियों
से टक्कर न ले सके। वास्तव में दोनों के नैतिक आदर्शों में बहुत
बड़ा अन्तर था। ज्योंही कम्पनी के डाइरेक्टरों को इस नई सन्धि
की सूचना मिली, उन्होंने फ़ौरन वारन हेस्टिंग्स को लिखा :-
"हम चाहते हैं कि राघोबा के साथ जो सन्धि हुई थी, उसके अनुसार
कम्पनी को जितना इलाक़ा मिला था, उस सबको हर हालत में अपने क़ब्ज़े
में रक्खा जावे और हम आपको आज्ञा देते हैं कि जो उपाय उसे क़ायम रखने
और उसकी रक्षा करने के लिए ज़रूरी हों, आप तुरन्त कर डालें।"*
बम्बई कौंसिल, कलकत्ता कौंसिल और कम्पनी के डाइरेक्टर,

  • "We approve, under every circumstance, of the keeping of all the
    territories and possessions ceded to the Company by the treaty concluded
    with Raghoba; and direct that you forthwith adopt such measures as may
    be necessary for their preservation and defence." Court of Directors to the
    Government of Bengal, Mill, p. 436.

२८४ भारत में अंगरेज़ी राज

इन तीनों में इस सम्बन्ध में जो पत्र व्यवहार हुआ उससे इतिहास
लेखक मिल ने डाइरेक्टरों के कपट और लालच
[कम्पनी के डाइरेक्टरों का कपट] को अच्छी तरह प्रकट किया है। डाइरेक्टरों
ने इन पत्रों में स्पष्ट लिखा कि बसईं जैसे
महत्वपूर्ण इलाक़े को छोड़ देना मूर्खता है। अपनी मद्रास कौन्सिल
को युद्ध के लिए तैयार रहने और समय पड़ने पर वारन हेस्टिंग्स
की मदद करने की आज्ञा दी। भारत के तमाम अंगरेज़ अधिकारियों
को साफ़ हिदायत की कि आप लोग राघोबा का साथ न छोड़ें
और जिस बहाने हो सके, पुरन्धर की सन्धि को तोड़ कर या
मराठों को उकसाकर उनकी ओर से तुड़वाकर, राघोबा को फिर
सामने कर दें, इत्यादि।
वारन हेस्टिंग्स और उसके तमाम मातहतों के लिए ये हिदायतें
काफ़ी थीं।
पुरन्धर की सन्धि हो चुकी थी। उस पर बाज़ाब्ता कम्पनी की
मोहर लग चुकी थी। फिर भी अंगरेज़ों ने उस
[सन्धि को तोड़ने की कोशिशें] सन्धि की शर्तों को पूरा करने में टाल मटोल
शुरू की। न उन्होंने राघोबा का साथ छोड़ा
और न बसईं का क़िला ख़ाली किया। कर्नल अपटन सन्धि करके
कलकत्ते लौट गया और जब उस सन्धि के अनुसार कम्पनी के
एक वकील को पूना भेजने का मौक़ा आया तो फिर वही प्रसिद्ध
अंगरेज़ दूत मॉस्टिन बम्बई से पूना भेजा गया।
पेशवा दरबार के नीतिज्ञ मॉस्टिन और उसके कृत्यों से अच्छी

पहला मराठा युद्ध २८५
तरह परिचित थे। वे जानते थे कि मॉस्टिन ही अंग्रेज़ों और
मराठों के बीच की सारी आपत्तियों की जड़ है। उन्होंने मॉस्टिन जैसे
आदमी के फिर अपने दरबार में भेजे जाने पर एतराज़ किया, किन्तु
कम्पनी के अधिकारियों ने उनकी एक न सुनी और मार्च सन् १७७७
में मॉस्टिन कम्पनी के वकील की हैसियत से पूना पहुँच गया।
मॉस्टिन ने इस बार अपने गुप्त कुचक्रों द्वारा धीरे धीरे पेशवा
[हाशिया: अंग्रेज़ दूत मास्टिन] दरबार के एक और मन्त्री मोरोबा को अपनी
[हाशिया: का पूना दरबार में] ओर फोड़ लिया। उसने मोरोबा को नाना
[हाशिया: फूट डलवाना.] फड़नवीस से लड़ा दिया और नाना फड़नवीस
तथा प्रधान मन्त्री सखाराम बापू में भी फूट
डलवा दी। ये झगड़े यहाँ तक बढ़े कि दरबार के अन्दर नाना की
जगह मोरोबा को मिल गई और नाना कुछ दिनों के लिए दरबार
के कार्य से उदासीन होकर पुरन्धर चला गया । नाना की गैर
हाज़िरी में मोरोबा ने मॉस्टिन के कहने पर बम्बई की कौन्सिल को
यह गुप्त पत्र लिख भेजा कि आप फ़ौरन राघोबा को पेशवा की
मसनद पर बैठाने के लिए फिर से पूना ले आइए । बम्बई कौन्सिल
ने, जो केवल एक सहारा ढूंढ़ रही थी, पुरन्धर की सन्धि के विरुद्ध
फ़ौरन तैयारियां शुरू कर दीं। वारन हेस्टिंग्स ने भी ख़बर पाते ही
बम्बई की कौन्सिल की मदद के लिए एक बहुत बड़ी सेना बंगाल
से पूना भेजे जाने की आज्ञा दे दी।
करनल अपटन 'और उस समय के अन्य अंग्रेज़ों के बयानों
से साफ़ ज़ाहिर है कि पूना दरबार सच्चाई के साथ पुरन्धर की

२८६ भारत में अंग्रेज़ी राज
सन्धि पर क़ायम रहना चाहता था; किन्तु वारन हेस्टिंग्स और
उसके साथियों को इंगलिस्तान से विश्वासघात करने की आज्ञा
मिल चुकी थी।
कम्पनी की सेनाएँ अभी पूना के लिए रवाना भी न हो पाई थीं
कि पूना मन्त्रि मण्डल के फिर से बदलने की ख़बर कलकत्ते पहुँची।
मालूम होता है कि अंग्रेज़ों के नाम मोरोबा के पत्र का हाल किसी
प्रकार खुल गया। मोरोबा अहमदनगर के क़िले में क़ैद कर दिया
गया। नाना फड़नवीस अब पेशवा का प्रधान मन्त्री नियुक्त हुआ।
सखाराम बापू बहुत बूढ़ा था, वह अब दरबार के कामों से अलग
रहता था, उसमें और नाना में फिर से प्रेम हो गया। पूना दरबार
में कोई भी अब हत्यारे राघोबा के पक्ष में न था। किन्तु कम्पनी
की दुरंगी नीति जारी रही। एक ओर मॉस्टिन पूना दरबार में
रह कर नाना फड़नवीस और उसके साथियों को यह विश्वास
दिलाता रहा कि अंग्रेज़ पुरन्धर की सन्धि पर क़ायम रहना चाहते
हैं और शीघ्र उसकी सब शर्तों को पूरा कर देंगे, और दूसरी ओर
वारन हेस्टिंग्स पुरन्धर की इस सन्धि के ख़िलाफ़ राघोबा को
पेशवा बनाने के लिए बम्बई, मद्रास और कलकत्ते से सेनाएँ भेजने
की ज़बरदस्त तैयारियाँ करता रहा।
वारन हेस्टिंग्स ने जो सेना कलकत्ते में तैयार की वह मई सन्
१७७८ में कर्नल लेस्ली के अधीन बंगाल से
[हाशिया: कलकत्ते से अंग्रेज़ी सेना का कूच] चली। इस सेना को भोंसले, होलकर, सींधिया
इत्यादि कई भारतीय नरेशों के इलाक़ों से होकर

पहला मराठा युद्ध २८७

गुज़रना था। इनमें से भौंसले, होलकर और सींधिया तीनों
महाराष्ट्र मण्डल के सदस्य थे। यदि इन नरेशों को अंगरेज़ी
सेना का असली उद्देश मालूम होता तो उस सेना का पूना तक
पहुँच सकना असम्भव होता। इसलिए वारन हेस्टिंग्स ने इन
तीनों को धोखे में रखने के लिए उनके साथ गुप्त पत्र व्यवहार शुरू
कर दिया।
सबसे पहले उसने इन सब नरेशों पर यह ज़ाहिर किया कि
फ्रान्स की सेना भारत के पच्छिमी तट पर हमला करने वाली है
और बंगाल से कम्पनी की सेना केवल फ्रान्सीसियों से अपने इलाक़े
की हिफ़ाज़त करने के लिए भेजी जा रही है, उसका उद्देश किसी
भारतीय नरेश से युद्ध करना नहीं है। इसके अलावा बरार के
राजा मूदाजी भौंसले के साथ उसने एक और ख़ासी सुन्दर चाल
चली। हाल ही में सतारा के राजा की मृत्यु हो चुकी थी, उसके
कोई औलाद न थी। भौंसले कुल की उत्पत्ति शिवाजी के वंश से
थी। वारन हेस्टिंग्स ने मूदाजी भौंसले को उकसाया कि आप
सतारा की गद्दी पर अपना हक़ जमाइए, कम्पनी आपकी मदद
करेगी। वारन हेस्टिंग्स का मतलब यह था कि सतारा की अधिकार
शून्य गद्दी पर एक प्रबल नरेश को बैठाकर पेशवा दरबार के अधि-
कारों को तोड़ दिया जावे, मराठा मण्डल में फूट डाल दी जावे
और फिर मूदाजी को अवध के नवाब वज़ीर की तरह अपने हाथों
में रक्खा जावे।

२८८ भारत में अंगरेज़ी राज
इस काम के लिए एक अंगरेज़ दूत एलयाॅट को बरार के राजा
[बरार के राजा को] के पास भेजा गया। एक अंगरेज़ इतिहास लेखक
[फोड़ने के प्रयत्न] लिखता है :—
“मिस्टर एलयाॅट को इस काम के लिए नियुक्त
किया गया कि तुम जाकर बरार के राजा को मराठा मण्डल से फोड़ो।
एलयाॅट के द्वारा बरार के राजा से बातचीत की गई। एलयाॅट को यह अधिकार
दिया गया कि तुम राजा से कह दो कि गवरनर जनरल अपनी पूरी शक्ति से
सतारा के राजा का तमाम इलाक़ा और पेशवा की पदवी आपको दिलवाने के
लिए तैयार है ।”*
किन्तु मूदाजी ने किसी वजह से वारन हेस्टिंग्स की इस सलाह
को स्वीकार न किया। वारन हेस्टिंग्स की चाल पूरी तरह न चल
सकी। इस पत्र व्यवहार से उसे इतना लाभ अवश्य हुआ कि
बंगाल की सेना शान्ति के साथ बरार के इलाक़े से गुज़र सकी।
होलकर और सींधिया दोनों मालूम होता है फ़्रान्सीसी हमले
के धोखे में आगए। इसके अलावा वे उस समय पूना में थे, इस
लिए उन्होंने इस सेना को अपने राज्यों में से गुज़रने की इजाज़त
दे दी।

  • “Overtures were made to the Raja of Berar through Mr. Elliot, who
    was deputed, with the view of detaching him from the confederacy, and who
    was empowered to offer him the full support of the Governor-General in his
    claims to the possessions of the Raja of Sattara, and to the situation of
    Peshwa.”—Origin of the Pindaries etc., by an Officer in the service of the
    Honorable East India Company, 1818.

पहला मराठा युद्ध २८६
वारेन हेस्टिंग्स ने ठीक यही धोखा नाना फड़नवीस को देना
चाहा और उससे यह इजाज़त मांगी कि पेशवा
[नाना फड़नवीस का अंगरेज़ी सेना को रोकना] के इलाके में से कम्पनी की सेना को जाने दिया
जावे। किन्तु नाना फड़नवीस ताड़ गया,
उसने कम्पनी की सेना के आगे बढ़ने पर एत-
राज़ किया, और जब देखा कि एतराज़ों का कोई फल नहीं हुआ
और अंगरेज़ी सेना बढ़ती चली आ रही है तो मजबूर होकर युद्ध की
तैयारी शुरू कर दी।
मार्ग में इस सेना को कई छोटी मोटी रुकावटें हुईं। बुन्देल-
खण्ड के स्वतन्त्र राजाओं ने उसे अपने इलाके में से गुज़रने से
रोका। किन्तु किसी से लड़कर और किसी से मिलकर, किसी को
चाल से और नवाब भोपाल जैसे को धन से शान्त करते हुए कम्पनी
की सेना आगे बढ़ती रही। मार्ग में ३ अक्तूबर सन् १७७८ को
करनल लेसली की मृत्यु हो गई और करनल गॉडर्ड उसकी जगह
सेनापति नियुक्त हुआ।
बम्बई के अंगरेज़ों ने इस सेना के पहुँचने का इन्तज़ार न
किया। उन्होंने राघोबा को युद्ध के ख़र्च के लिए
[बम्बई से कम्पनी की सेना] एक ख़ासी रक़म बतौर क़र्ज़ के दी, जिसके लिए
उससे पट्टा लिखा लिया और २२ नवम्बर सन्
१७७८ को राघोबा तथा करनल इजर्टन के अधीन एक विशाल सेना
राघोबा को पेशवा की मसनद पर बैठाने के लिए बम्बई से पूना
की ओर रवाना कर दी। यह सेना राघोबा के नाम पर आगे बढ़ती
१६

२६० भारत में अंगरेज़ी राज
जाती थी और उसके साथ साथ मार्ग भर में एलान बँटते जाते थे,
जिनमें महाराष्ट्र की प्रजा से राघोबा की सहायता करने के लिए
प्रार्थना की गई।
इसी बीच मॉस्टिन पूना में अचानक बीमार पड़ गया, उसे
बम्बई लौट आना पड़ा और १ जनवरी सन् १७७६ को उसकी मृत्यु
हो गई।
खरडाला तक बम्बई की इस सेना को किसी ने न रोका, किन्तु
नाना असावधान न था। उसके गुप्तचरों का सगंठन इतना अच्छा
था कि पूना में बैठे हुए उसे भारत भर की राजनैतिक हालत का
ठीक ठीक पता रहता था। सींधिया और होलकर दोनों उस समय
पूना में थे। नाना ने उन्हें सेनापति नियुक्त करके उनके अधीन अंग-
रेज़ों के मुक़ाबले के लिए सेना रवाना की।
मराठे युद्ध विद्या में अत्यन्त होशियार थे। वे धीरे धीरे पीछे
[हाशिया: तालेगाँव की लड़ाई] हटते हुए अंगरेज़ी सेना को पूना से १८ मील दूर
तालेगाँव के मैदान तक ले आए। ६ जनवरी
सन् १७७६ को अंगरेज़ी सेना तालेगाँव पहुँची।
वहाँ पहुँचते ही अंगरेज़ों ने अचानक अनुभव किया कि एक विशाल
मराठा सेना ने उन्हें तीन ओर से घेर रक्खा था। इस पर वे इतने
भयभीत हो गए कि उन्हें फ़ौरन पीछे हटने के सिवा कोई चारा
दिखाई न दिया।
११ जनवरी के ११ बजे रात को अंगरेज़ी सेना ने पीछे हटना

पहला मराठा युद्ध २६१
शुरू किया। उन्होंने स्वयं अपने बहुत से गोले बारूद को आग
लगा दी और भारी तोपों को एक बड़े तालाब
अंग्रेज़ों की दोबारा में फेंक दिया। मराठा सेनापतियों ने अब आगे
हार और दूसरी बढ़कर सामने से शत्रु को रोका और उन्हें चारों
सन्धि ओर से घेर लिया। एक भयङ्कर संग्राम हुआ।
अंग्रेज़ी सेना को दूसरी बार पूरी तरह हार खानी पड़ी। उनके
तमाम अस्त्र शस्त्र छीन लिए गए। पेशवा की सेना उस समय यदि
चाहती तो राघोबा और उसके एक एक देशी और विदेशी साथी
को वहीं पर ख़त्म कर सकती थी, किन्तु अंग्रेज़ों ने हार मान कर
दया की प्रार्थना की। १३ जनवरी को अंग्रेज़ों का एक दूत सन्धि
के लिए मराठों के पास पहुंचा। मराठों ने शरणागत शत्रु को छोड़
दिया। दोनों पक्षों में फिर एक सन्धि हो गई जिसमें अंग्रेज़ों ने
वादा किया कि :-
(१) राघोबा को फ़ौरन पूना दरबार के हवाले कर दिया
जावेगा।
(२) भड़ोच, सूरत और मराठों के जितने और इलाक़ों पर
कम्पनी ने अपना अधिकार जमा रक्खा है वे सब फ़ौरन पेशवा
दरबार को वापस दे दिए जावेंगे।
(३) जो अंग्रेज़ी सेना बंगाल से आ रही है उसे वापस
लौटाने के लिए अंग्रेज़ अफ़सर उस सेना के पास स्पष्ट सन्देशा
भेज देंगे और यह सन्देशा पूना दरबार के एक वकील की मारफ़त
भेजा जावेगा।

२६२ भारत में अंग्रेज़ी राज

(४) जब तक अंगरेज़ इन शर्तों को पूरा न कर दें तब तक के
लिए दो अंगरेज़ अफ़सर बतौर बन्धक मराठों के पास क़ैद रहेंगे।
सन्धि पर बाज़ाब्ता दोनों ओर के सेनापतियों के दस्तख़त हो
गए और कम्पनी तथा पेशवा दरबार दोनों की मोहरें लग गईं।
राघोबा और दो अंगरेज़ मराठों के हवाले कर दिए गए। करनल
गॉडर्ड के नाम पत्र लिखकर पूना दरबार के एक वकील के सुपुर्द
कर दिया गया। नाना फड़नवीस ने राघोबा और उसके साथ
दोनों अंगरेज़ों को माधोजी सींधिया (महादजी सींधिया) के
हवाले कर दिया।
किन्तु अंगरेज़ अब भी अपने छल से बाज़ न आए। बम्बई
[हाशिया: इस] पहुँचते ही उन्होंने उस पत्र को रद्द करने के लिए
[हाशिया: दूसरी सन्धि का] जो हाल की सन्धि के अनुसार मराठा वक़ील
[हाशिया: उल्लङ्घन] की मारफ़त करनल गॉडर्ड के पास भेज दिया
गया था, करनल गॉडर्ड को एक और गुप्त पत्र भेजा और उसमें
लिखा कि आप जितनी जल्दी हो सके बम्बई पहुँच जाइये।
बम्बई की अंगरेजी सेना की हार का समाचार सुनकर करनल
गॉडर्ड पहले सूरत की ओर बढ़ा। ६ फ़रवरी को पूना दरबार का
वक़ील अंगरेज़ सेनापति के पत्र सहित गॉडर्ड से जा मिला। वकील
ने पत्र देकर गॉडर्ड पर बंगाल लौट जाने के लिए ज़ोर दिया।
गॉडर्ड यह झूठ बोल कर कि मेरो सेना का उद्देश पेशवा सरकार
से लड़ना नहीं है, बल्कि उससे मित्रता क़ायम रखना और
फ़्रांसीसियों का मुक़ाबला करना है, बराबर आगे बढ़ता गया।

पहला मराठा युद्ध २६३
२६ फ़रवरी सन् १७७६ को वह अपनी विशाल सेना सहित सूरत
पहुँच गया।
वारन हेस्टिंग्स को जिस समय बम्बई की सेना की इस
अपमानजनक हार और नई सन्धि का पता लगा तो उसने फ़ौरन
करनल गॉडर्ड को लिख भेजा कि आप उस सन्धि की बिलकुल
परवा न करें, और आगे बढ़ते जावें।
मराठा मण्डल के पाँच मुख्य स्तम्भों में से एक महाराजा
[हाशिया: सींधिया और होलकर कुलों की उत्पत्ति] गायकवाड़ को अंगरेज़ अपनी ओर फोड़ चुके थे।
बरार के महाराजा भोंसले ने वारन हेस्टिंग्स की
सलाह न मानी थी, फिर भी वारन हेस्टिंग्स ने
अपनी चालों द्वारा उसे इस संग्राम से तटस्थ
कर रक्खा था। पेशवा की मदद के लिए अब केवल होलकर और
सींधिया दो नरेश बाक़ी रह गए थे।
मालवा का प्रान्त जिसे मध्यभारत कहते हैं, १८ वीं सदी के
प्रारम्भ तक मुग़ल साम्राज्य का एक भाग था और निज़ाम की
सूबेदारी में था। सन् १७२१ में निज़ाम के बग़ावत करने पर दिल्ली
सम्राट ने निज़ाम की जगह एक हिन्दू राजा गिरधरराय को
मालवे का सूबेदार नियुक्त कर दिया। कुछ समय बाद पेशवा ने
राजा गिरधरराय से मालवा विजय करके उत्तरीय भाग अपने एक
अनुचर रानोजी सींधिया को और दक्षिणी भाग एक दूसरे
अनुचर मलहरराव होलकर को दे दिया। यही इन दोनों राजकुलों
का प्रारम्भ था।

२६४ भारत में अंगरेज़ी राज
जिस समय का हाल हम लिख रहे हैं उस समय दक्खिन
महारानी मालवे का शासन उस प्रातःस्मरणीया महारानी
अहिल्याबाई अहिल्याबाई के हाथों में था, जिसकी बुद्धिमत्ता,
योग्यता, न्यायशासन, सच्चरित्र और आदर्श
राजप्रबन्ध की प्रशंसा अनेक भारतीय और विदेशी इतिहास लेखकों
ने मुक्तकण्ठ से की है; जिसकी गाढ़ धार्मिकता के कारण उत्तर से
दक्खिन तक हिन्दू और मुसलमान समस्त भारतीय नरेश उसे
अपनी श्रद्धा और आदर का पात्र स्वीकार करते थे; और जिसका
नाम आज तक भारत के एक एक गांव और एक एक झोपड़े में,
श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता है। अहिल्याबाई इन विदेशियों
के साथ मेल या अपने यहाँ उनका हस्तक्षेप पसन्द न करती थी,
इसलिए वारन हेस्टिंग्स को पेशवा के ख़िलाफ़ सींधिया कुल के
साथ साज़िश करनी पड़ी ।
माधोजी सींधिया उस समय पेशवा के अत्यन्त योग्य और
माधोजी सींधिया विश्वस्त सेनापतियों में से था । वारन हेस्टिंग्स ने
के साथ झूठा वादा देख लिया कि नाना को पंगुल कर देने का सबसे
अच्छा तरीक़ा माधोजी को अपनी ओर फोड़
लेना है । अदूरदर्शी माधोजी विदेशियों की बातों में आकर पेशवा
दरबार के साथ विश्वासघात करने को राज़ी हो गया । तालेगांव
ही में अंगरेज़ों और माधोजी के बीच गुप्त बातचीत शुरू होगई ।
माधोजी को ख़ास लालच यह दिया गया कि यूरोपियन अफ़सरों
और यूरोपियन ढंग के शस्त्र ढालने वालों की मदद से तुम्हारे पास

महारानी अहल्याबाई होलकर
[ चित्रशाला प्रेस पूना की कृपा द्वारा ]

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पहला मराठा युद्ध २६५
एक ज़बरदस्त सेना तैयार कर दी जावेगी, जिसके द्वारा महाराष्ट्र,
बल्कि सारे भारत में तुम्हारा प्रभाव थोड़े ही दिनों के अन्दर
सर्वोपरि हो जावेगा। इस चाल के ज़रिये अंगरेज़ उससे राघोबा
और अपने दोनों बन्धकों को छुड़ा लेना चाहते थे ।
अन्त में माधोजी, राघोबा और अंगरेज़ों के बीच गुप्त सन्धि
[हाशिया: सींधिया और राघोबा के साथ गुप्त सन्धि] होगई, जिसमें तय हुआ कि बालक माधोराव
नारायन जिसकी आयु उस समय पाँच साल की
थी, पेशवा की मसनद पर क़ायम रहे, उसी के
नाम के सिक्के ढलते रहें, राघोबा का बेटा
बाजीराव जिसकी आयु चार साल की थी, पेशवा का दीवान
नियुक्त हो, माधोजी नाबालिग दीवान के नाम से शासन का सारा
काम करे और राघोबा को पेशवा दरबार से बारह लाख सालाना
पेन्शन पर झाँसी भेज दिया जावे । इसके अलावा अंगरेज़ों ने
भड़ोच का ज़िला माधोजी को और ४१,००० रुपए नक़द उसके
आदमियों को देने का वादा किया । स्वार्थान्ध माधोजी ने अपने
स्वामी पेशवा के साथ विश्वासघात करके राघोबा और दोनों
अंगरेज़ बन्धकों को चुपके से छोड़ दिया । राघोबा फिर अंगरेज़ों
से जा मिला । इसके थोड़े ही दिनों के अन्दर अंगरेज़ों ने माधोजी
सींधिया के साथ ठीक वैसा ही बर्ताव किया, जैसा वे बंगाल में
अमींचन्द से लेकर मीर जाफ़र तक एक एक देशघातक के साथ
कर चुके थे; फिर भी उस समय भारत के अन्दर कम्पनी की सत्ता
के जमने में माधोजी ने ज़बरदस्त मदद दी ।

२६६ भारत में अंगरेज़ी राज
नाना फड़नवीस को जब अंगरेज़ों के इरादों का पता चला
और मालूम हुआ कि गॉडर्ड की सेना गुजरात पहुँच गई है, तो
उसने एक ओर माधोजी सींधिया को सेना देकर गुजरात भेजा
ताकि वह गुजरात से अंगरेज़ों को बाहर निकाल दे और दूसरी
ओर मूदाजी भोंसले को आज्ञा दी कि तुम फ़ौरन तीस हज़ार सेना
लेकर बंगाल पर चढ़ाई कर दो । नाना की तजवीज़ें काफ़ो ज़बरदस्त
थीं; किन्तु नाना को उस समय पता न था कि माधोजी और
अंगरेज़ों में पहले ही गुप्त सन्धि हो चुकी थी और मूदाजी भोंसले
भी भीतर से वारन हेस्टिंग्स के साथ मिला हुआ था। माधोजी
का बाक़ी हाल आगे चल कर दिया जावेगा । मूदाजी ने नाना को
धोखे में रखने के लिए ३०,००० सेना लेकर बंगाल पर चढ़ाई
अवश्य की, किन्तु उसने पहले हो से वारन हेस्टिंग्स को एक गुप्त
पत्र लिख दिया कि—"मैं यह चढ़ाई केवल नाना फड़नवीस और
दूसरे मराठों को खुश करने के लिए कर रहा हूँ, यह केवल दिखावा
है। मैं मार्ग में जानकर इतनी देर लगा दूँगा कि बरसात से पहले
बंगाल की सरहद पर न पहुँच सकूँ और फिर बरसात का बहाना
लेकर बरार वापस लौट आऊँगा।" मूदाजी भोंसले ने हेस्टिंग्स के
' साथ अपने वचन का पालन किया। सारांश यह कि इन दोनों
मराठा सेनापतियों ने अपने स्वामी और देश दोनों के साथ
विश्वासघात किया ।
कर्नल गॉडर्ड अब सूरत में बैठा हुआ एक ओर नाना फड़नवीस
के पास सुलह के पत्र भेज रहा था और दूसरी ओर पूना पर