भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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सन् १७७६ को वारन हेस्टिंग्स को लिख दिया कि—"पूना दरबार
हमारी शर्तों पर राज़ी नहीं होता।"
वारन हेस्टिंग्स ने जब देख लिया कि सुलह से काम नहीं चल
हेस्टिंग्स की युद्ध सकता, तो अपटन के पूना रहते हुए फ़ौरन एक
की तय्यारी बहुत बड़े पैमाने पर जंग की तैयारियाँ शुरू कर
दीं। कलकत्ते और मद्रास दोनों स्थानों पर पूना
भेजने के लिए सेनाएँ जमा की जाने लगीं। भोंसले, सींधिया और
होलकर, तीनों को हेस्टिंग्स ने अपनी ओर फोड़ने की कोशिशें शुरू
कीं। हैदरअली और निज़ाम से भी उसने गुप्त पत्र व्यवहार शुरू
किया, और यह कोशिश की कि यदि हैदरअली और निज़ाम पेशवा
दरबार के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों को मदद न भी दें तो कम से कम
तटस्थ रहें।
पूना दरबार को इन सब बातों की ख़बर मिलती रही। इतिहास
से पता नहीं चलता कि और कौन कौन सी बातें थीं, जिनसे डर
कर या मजबूर होकर अन्त में नाना फड़नवीस जैसे नीतिज्ञों ने
अपने विचार बदल दिए। कर्नल अपटन जिस समय निराश
होकर पुरन्धर से बंगाल लौटने को तैयार हुआ, कहा जाता है कि
पेशवा के मन्त्रियों ने उसे रोक लिया।
३ जून सन् १७७६ को पुरन्धर में पेशवा दरबार और कम्पनी
पुरन्धर की सन्धि के दरमियान एक नई सन्धि हुई, जिसमें सूरत
वाली नाजायज़ सन्धि को रद्द क़रार दिया
गया, अंगरेज़ों ने वादा किया कि हम फिर कभी राघोबा को