भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० भारत में अंगरेज़ी राज
वारन हेस्टिंग्स को इस समय एक ख़ासी अच्छी तरकीब
[वारन हेस्टिंग्स की] सूझी। उसने सीधे कलकत्ते से अपने एक विशेष
[दोरुखी चालें] दूत कर्नल अपटन को पूना दरबार के पास भेजा
और यह रुख़ लिया कि बम्बई की कौन्सिल ने
राघोबा के साथ जो सन्धि की है और उसे जो कुछ मदद दी है,
वह मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ और मेरी इजाज़त के बिना दी गई है,
इसलिए वह सन्धि नाजायज़ है और अंगरेज़ सरकार न बाग़ी
राघोबा का साथ देना चाहती है और न पेशवा सरकार से लड़ना
चाहती है।
वारन हेस्टिंग्स ने बम्बई सरकार को हुकुम दिया कि पेशवा
दरबार से युद्ध फ़ौरन बन्द किया जावे और कर्नल कीटिङ्ग और
उसकी सेना को वापस बुला लिया जावे। बम्बई सरकार ने आज्ञा
पाते ही कीटिङ्ग और उसकी रही सही सेना को सूरत वापस बुला
लिया। पेशवा दरबार के मन्त्री उस समय पुरन्धर में थे, इसलिए
कर्नल अपटन २८ दिसम्बर सन् १७७५ को पुरन्धर पहुँचा।
सखाराम बापू उस समय पेशवा का प्रधान मन्त्री था। कर्नल
अपटन के पूना जाने का उद्देश ज़ाहिरा यह था कि बम्बई कौन्सिल
के समस्त कार्यों को नाजायज़ बताकर उनके लिए कम्पनी की ओर
से दुख प्रदर्शित करे और पेशवा दरबार के साथ कम्पनी की मित्रता
और वफ़ादारी प्रकट करे। किन्तु कर्नल अपटन के पास वारन
हेस्टिंग्स के दस्तख़ती दोहरे पत्र मौजूद थे। एक सखाराम बापू के
नाम जिसका आशय ऊपर दिया जा चुका है और दूसरा बाग़ी