भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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इन तीनों में इस सम्बन्ध में जो पत्र व्यवहार हुआ उससे इतिहास
लेखक मिल ने डाइरेक्टरों के कपट और लालच
[कम्पनी के डाइरेक्टरों का कपट] को अच्छी तरह प्रकट किया है। डाइरेक्टरों
ने इन पत्रों में स्पष्ट लिखा कि बसईं जैसे
महत्वपूर्ण इलाक़े को छोड़ देना मूर्खता है। अपनी मद्रास कौन्सिल
को युद्ध के लिए तैयार रहने और समय पड़ने पर वारन हेस्टिंग्स
की मदद करने की आज्ञा दी। भारत के तमाम अंगरेज़ अधिकारियों
को साफ़ हिदायत की कि आप लोग राघोबा का साथ न छोड़ें
और जिस बहाने हो सके, पुरन्धर की सन्धि को तोड़ कर या
मराठों को उकसाकर उनकी ओर से तुड़वाकर, राघोबा को फिर
सामने कर दें, इत्यादि।
वारन हेस्टिंग्स और उसके तमाम मातहतों के लिए ये हिदायतें
काफ़ी थीं।
पुरन्धर की सन्धि हो चुकी थी। उस पर बाज़ाब्ता कम्पनी की
मोहर लग चुकी थी। फिर भी अंगरेज़ों ने उस
[सन्धि को तोड़ने की कोशिशें] सन्धि की शर्तों को पूरा करने में टाल मटोल
शुरू की। न उन्होंने राघोबा का साथ छोड़ा
और न बसईं का क़िला ख़ाली किया। कर्नल अपटन सन्धि करके
कलकत्ते लौट गया और जब उस सन्धि के अनुसार कम्पनी के
एक वकील को पूना भेजने का मौक़ा आया तो फिर वही प्रसिद्ध
अंगरेज़ दूत मॉस्टिन बम्बई से पूना भेजा गया।
पेशवा दरबार के नीतिज्ञ मॉस्टिन और उसके कृत्यों से अच्छी