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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 548

पहला मराठा युद्ध २७६

भेजा। इस समय तक फड़के की विजयी सेना पूना वापस पहुँच
चुकी थी। मॉस्टिन अब पूना सं गुजरात चला आया और वहाँ पर
उसने अपनी चालों का जाल बिछाना शुरू किया। अन्त में अंगरेज़ों
और फ़तहसिंह गायकवाड़ के बीच सन्धि हो गई।
इस सन्धि के अनुसार भड़ोच, चिखली, वड़ियाव और कोरल
के तीनों परगने, जिनकी आमदनी कई लाख रुपए सालाना थी,
बिना किसी तरह की लड़ाई के कम्पनी को मिल गए और सयाजी
राव गायकवाड़ अंगरेज़ों की मदद् सं बड़ोदा की गद्दी पर बैठ
गया। गायकवाड़ का राज कुल अभी तक पेशवा को अपना
अधिराज मानता था, किन्तु अब से वह सदा के लिए मराठा
मराडल से फूट कर अलग हो गया और गुजरात में अंगरेज़ों के पैर
जम गए।
सूरत की सन्धि के अनुसार अंगरेज़ों ने साष्टी और बसई
दोनों पर क़ब्ज़ा कर लिया। किन्तु सूरत की सन्धि को पेशवा
सरकार ने स्वीकार न किया था और बाग़ी राघोबा को पेशवा
की मसनद पर बैठाने का निष्फल प्रयत्न कर अंगरेज़ पूना सरकार
को अपना दुशमन बना चुके थे।
अंगरेज़ों के सामने उस समय वास्तव में एक कठिन समस्या
थी। राघोबा के पेशवा बन सकने की सम्भावना बहुत ही कम थी
और बाग़ी राघोबा को मदद देने के बाद पूना सरकार से बातचीत
करने का उन्हें अब कोई मुंह न था। उनके गुप्तचर मॉस्टिन का
अब फिर पूना में घुस सकना तक नामुमकिन मालूम होता था।