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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पहला मराठा युद्ध २८३
सहायता न देंगे, बसई' का क़िला पूना दरबार को लौटा देंगे और
इस दरबार के साथ सदा मित्रता क़ायम रक्खेंगे। पूना दरबार ने
राघोबा के गुज़ारे के लिए प्रबन्ध कर दिया और "दोस्ताना क़ायम
रखने के लिए" कम्पनी को साष्टी का टापू, भड़ौच शहर की माल-
गुज़ारी और उसके आस पास तीन लाख रुपए सालाना का
इलाक़ा बतौर जागीर दे दिया। यह भी तय हुआ कि कम्पनी का
एक वकील पेशवा के दरबार में रहा करे। पूना दरबार को
निस्सन्देह यह आशा थी कि इस उदारता के बाद हम इन विदेशी
व्यापारियों के साथ अमन से रह सकेंगे, किन्तु उनकी यह आशा
झूठी निकली। पूना के चतुर ब्राह्मण भी कूट नीति में इन विदेशियों
से टक्कर न ले सके। वास्तव में दोनों के नैतिक आदर्शों में बहुत
बड़ा अन्तर था। ज्योंही कम्पनी के डाइरेक्टरों को इस नई सन्धि
की सूचना मिली, उन्होंने फ़ौरन वारन हेस्टिंग्स को लिखा :-
"हम चाहते हैं कि राघोबा के साथ जो सन्धि हुई थी, उसके अनुसार
कम्पनी को जितना इलाक़ा मिला था, उस सबको हर हालत में अपने क़ब्ज़े
में रक्खा जावे और हम आपको आज्ञा देते हैं कि जो उपाय उसे क़ायम रखने
और उसकी रक्षा करने के लिए ज़रूरी हों, आप तुरन्त कर डालें।"*
बम्बई कौंसिल, कलकत्ता कौंसिल और कम्पनी के डाइरेक्टर,

  • "We approve, under every circumstance, of the keeping of all the
    territories and possessions ceded to the Company by the treaty concluded
    with Raghoba; and direct that you forthwith adopt such measures as may
    be necessary for their preservation and defence." Court of Directors to the
    Government of Bengal, Mill, p. 436.