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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

वे और हम २३
और किन उपायों द्वारा अंगरेज़ों का राज भारत में क़ायम हुआ, भारत के
लिए उसके क्या नतीजे हुए और भविष्य में उससे छुटकारा पाने की किस
तरह आशा की जा सकती है ।
वे और हम
१७ वीं सदी का इंगलिस्तान
वास्तव में भारत और इङ्गलिस्तान का सम्पर्क दो अलग अलग सभ्य-
ताओं और अलग अलग आदर्शों का एक दूसरे से टकराना था । इसलिए
और बातों से पहले हम उस समय के इङ्गलिस्तान की हालत का, जब कि
हिन्दोस्तान और इङ्गलिस्तान का पहली बार सम्पर्क हुआ, संक्षिप्त बयान दे
देना चाहते हैं ।
१६ वीं और १७ वीं सदी के इंगलिस्तान की हालत को बयान करते
हुए प्रसिद्ध इतिहासज्ञ ड्रेपर लिखता है—
“किसानों की झोपड़ियाँ नरसलों और छड़ियों की बनी हुई
होती थीं जिनके ऊपर गारा फेर दिया जाता था । घर में आग
घास जला कर तैयार की जाती थी और धुएँ के निकलने के लिए
कोई जगह न होती थी । जिस तरह का सामान उस समय के
एक अंगरेज़ किसान के घर में होता था, और जिस तरह से वह
ज़िन्दगी बसर करता था, उससे मालूम होता था कि गाँव के
पास नदी के किनारे जो ऊदबिलाव मेहनत से माँद बना कर

२४ पुस्तक प्रवेश
रहता था, उस ऊदबिलाव की हालत में और उस किसान की
हालत में ज़्यादा फ़र्क़ न था। सड़कों पर डाकू फिरते रहते थे,
नदियों पर समुद्री लुटेरे और लोगों के कपड़ों और बिस्तरों में
जुएँ। आम तौर पर लोगों की ख़ुराक होती थी—मटर, उड़द,
जड़ें और वृक्षों की छालें। कोई ऐसा धन्धा न था, न कोई
तिजारत थी जिससे बारिश न होने की सूरत में किसान दुष्काल
से बच सके। मौसम की सख़्ती से बचने का मनुष्यों के पास
बिल्कुल कोई उपाय न था। आबादी बहुत कम थी, और महा-
मारी और अन्न के अभाव से और घटती रहती थी। शहर के
लोगों की हालत भी गाँव के लोगों से कुछ अच्छी न थी। शहर
वालों का बिछौना भुस का एक थैला होता था और तकिये की
जगह लकड़ी का एक गोल टुकड़ा। जो शहर वाले खुशहाल होते
थे वे चमड़े के कपड़े पहनते थे, जो ग़रीब होते थे वे अपने हाथ
और पैरों पर पवाल की पूलियाँ लपेट कर अपने को सरदी से बचाते
थे। × × × जिन शहरों में शीशे की या तैल पत्र की कोई खिड़की
तक न होती थी, वहाँ किसी तरह के कारीगर के लिए कहाँ
गुञ्जाइश थी। कहीं कोई कारख़ाना न था, जिसमें कोई कारीगर
आराम से बैठ सके। ग़रीबों के लिए कोई वैद्य न था। × × ×
सफ़ाई का कहीं कोई इन्तज़ाम था ही नहीं।”
आगे चल कर उस समय के यूरोप के सदाचार को बयान करते हुए
ड्रेपर लिखता है—
“जिस तेज़ी के साथ गरमी की बीमारी उन दिनों तमाम

वे और हम २४
यूरोप में फैली, उससे इस बात का साफ़ पता चलता है कि लोगों
में दुराचार कितने भयंकर रूप में फैला हुआ था । यदि हम उस
समय के लेखकों पर विश्वास करें तो विवाहित या अविवाहित,
ईसाई पादरी या मामूली गृहस्थ, पोप लियो दसवें से लेकर गली
के भिखमंगे तक—कोई वर्ग ऐसा न था जो इस रोग से बचा रहा
हो । × × × इंग्लिस्तान की आबादी पचास लाख से भी कम
थी । × × × किसान थपनी ज़मीन का मालिक न होता था ।
ज़मीन ज़मींदार की होती थी और किसान केवल उसका मज़दूर
और चौकीदार होता था । ऐसी हालत में दूसरे देशों की तिजारत
ने समाज में हलचल मचानी शुरू की । आबादी इधर से उधर
आने जाने लगी । दूसरे देशों से तिजारत करने के लिए कम्पनियाँ
बनाई गईं । ये अफ़वाहें या ख़बरें सुन कर कि दूसरे देशों में
जाकर जल्दी से ख़ूब धन कमाया जा सकता है, लोगों के दिमाग़
फिरने लगे × × × सारी अंगरेज़ क़ौम इतनी बेपढ़ी थी कि
पार्लिमेण्ट के बहुत से हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के मेम्बर तक न लिख
सकते थे और न पढ़ सकते थे × × × ईसाई पादरियों में भयंकर
दुराचार फैला हुआ था । खुले तौर पर कहा जाता था कि
इंग्लिस्तान में एक लाख औरतें ऐसी हैं, जिन्हें पादरियों ने
ख़राब कर रक्खा है । × × × कोई पादरी यदि बुरे से बुरा भी
जुर्म करता था तो उसे केवल थोड़ा सा जुरमाना देना पड़ता था ।
मनुष्य हत्या के लिए पादरियों को केवल छै शिलिंग आठ पेन्स
( क़रीब पाँच रुपए ) जुरमाना देना पड़ता था । × × × सत्रहवीं

२६ पुस्तक प्रवेश
सदी के अन्त में लन्दन का शहर गन्दा था, मकान भद्दे बने हुए
थे और सफ़ाई का कोई इन्तज़ाम न था । × × × जंगली जानवर
हर जगह फिरते थे । × × × बरसात में सड़कें इतनी ख़राब हो
जाती थीं कि उन पर से चलना मुश्किल था । × × × देहात में
अक्सर जब लोग रास्ता भूल जाते थे तो उन्हें रात रात भर बाहर
ठण्डी हवा में रहना पड़ता था । ख़ास ख़ास नगरों के बीच में भी
कहीं कहीं सड़कों का पता न होता था, जिसकी वजह से पहिये-
दार गाड़ियों का चल सकना इतना कठिन था कि लोग ज़्यादातर
लद्दू टट्टुओं के पालानों में दाएँ और बाएँ असबाब के साथ साथ
और असबाब की तरह लद कर एक जगह से दूसरी जगह आते
जाते थे । × × × सत्रहवीं सदी के अन्त में जाकर तेज़ से तेज़
गाड़ी दिन भर में तीस मील से पचास मील तक चल सकती थी
और वह “उड़ने वाली गाड़ी” कहलाती थीं । × × × टाइन
नदी के स्रोत पर जो लोग रहते थे वे अमरीका के आदिमवासियों
से कम जंगली न थे । उनकी स्त्रियाँ आधी नंगी जंगली गाने
गाती फिरती थीं, और पुरुष अपनी कटार घुमाते हुए लड़ाइयों के
नाच नाचते थे । × × × जब कि पुरुषों ही की यह हालत थी
कि उनमें से बहुत थोड़े ठीक ठीक लिखना जानते थे तो यह सोचा
जा सकता है कि स्त्रियाँ कितनी अनपढ़ रही होंगी । × × ×
समाज की व्यवस्था में जिसे हम सदाचार कहते हैं उसका कहीं
पता न था । × × × पति अपनी पत्नी को कोड़ों से पीटता था
× × × अपराधियों को टिकटिकी से बाँध कर पत्थर मार मार

वे और हम २७
कर मार डाला जाता था। औरतों की टाँगों को सरे बाज़ार
शिकओं में कस कर छोड़ दिया जाता था। × × × लोगों के
दिल अत्यन्त सख़्त हो गए थे × × × गाँव के लोगों के मकान
झोपड़े होते थे जिन पर फूस छाया हुआ होता था। × × ×
लन्दन में मकान अधिकतर लकड़ी और प्लास्टर के होते थे,
गलियाँ इतनी गन्दी होती थीं कि बयान नहीं किया जा सकता।
शाम होने के बाद डर के मारे कोई अपने घर से न निकलता
था, क्योंकि जो चाहे अपने ऊपर के कमरे से खिड़की खोल कर
बेखटके गन्दा पानी नीचे फेंक देता था। × × × लन्दन की
गलियों में लालटेनों का कहीं निशान न था। उच्च श्रेणी के लोगों
में सदाचार की आमतौर पर यह हालत थी कि उनमें यदि कोई
भी मनुष्य मरता था तो लोग यही समझते थे कि किसी ने ज़हर
देकर मार डाला × × × सारे देश पर दुराचार की एक बाढ़
आई हुई थी।”
विचार स्वातंत्र्य के विषय में ड्रेपर लिखता है—
ऑक्सफ़ोर्ड की विद्यापीठ ने यह आज्ञा दे दी कि बकेनन,
मिल्टन और बेक्सटर की राजनैतिक पुस्तकें स्कूलों के आँगनों में
खुले जला दी जायें। × × × राजनैतिक या धार्मिक अपराधों
के बदले में जिस तरह की सख़्त सज़ाएँ दी जाती थीं उन पर
बिश्वास होना कठिन है। लन्दन में टेम्स नदी के पुराने टूटे हुए
पुल पर इस तरह के अपराधियों के डरावने सिर काट कर लटका
दिए जाते थे, इसलिए कि उस भयङ्कर दृश्य को देख कर जन

२८ पुस्तक प्रवेश
सामान्य क़ानून के विरुद्ध जाने से रुके रहें। उस समय की उदा-
रता का अन्दाज़ा उस एक क़ानून से लगाया जा सकता है, जो
८ मई सन् १६८५ को स्कॉटलैण्ड की पार्लिमेण्ट ने पास किया।
क़ानून यह था कि जो कोई मनुष्य सिवाय बादशाह की सम्प्रदाय
के दूसरी किसी ईसाई सम्प्रदाय के गिरजे में जाकर उपदेश देगा
या उपदेश सुनेगा, उसे मौत की सज़ा दी जायगी, और उसका
माल असबाब ज़ब्त कर लिया जायगा। इस बात के काफ़ी से
ज़्यादा सबूत हमारे पास मौजूद हैं कि इस तरह के निन्दनीय
भाव केवल क़ानूनों के अक्षरों में ही बन्द न रह जाते थे। × × ×
स्कॉटलैण्ड में कवेनेण्टर (एक ईसाई सम्प्रदाय) लोगों के घुटनों
को शिकंजों के अन्दर कुचल कर तोड़ दिया जाता था और वे
दुःख से पड़े चिल्लाते रहते थे; स्त्रियों को लकड़ियों से बाँध कर
समुद्र के किनारे रेत पर छोड़ दिया जाता था और धीरे धीरे
बढ़ती हुई लहरें उन्हें बहा ले जाती थीं, केवल इस अपराध में
कि वे सरकार के बताए हुए गिरजे में जाने से इनकार करती थीं,
या उनके गालों को दाग़ कर उन्हें जहाज़ों में बन्द करके ज़बर-
दस्ती गुलाम बनाकर अमरीका भेज दिया जाता था। × × ×
राजकुल की स्त्रियाँ यहाँ तक कि स्वयं इङ्गलिस्तान की मलका तक
स्त्रियोचित दयाभाव और मामूली मनुष्यत्व तक को भूल कर
गुलामों के इस क्रय-विक्रय के नारकीय व्यापार में हिस्सा लेती
थीं × × ×।" ꕤ

  • "The peasant's cabin was made of reeds or sticks plastered over

वे और हम २६
उस समय के भारत से तुलना
ऊपर के लम्बे बयान से उस ज़माने के इङ्गलिस्तान के गांवों और
शहरों की हालत, मकानों, सड़कों, रहन सहन, धन्धों, कचहरियों, धार्मिक
विचारों, शिक्षा और सदाचार इत्यादि का पूरा पूरा पता चलता है। हमें यह
भी याद रखना चाहिए कि यह वह ज़माना था, जब कि हिन्दोस्तान में
कबीर और दादू के उदार धार्मिक विचार, अकबर का विश्वप्रेम, जहाँगीर का
न्यायशासन, शाहजहाँ के समय की ख़ुशहाली और आश्चर्यजनक कलाकौशल
संसार भर के यात्रियों को चकाचौंध कर रहे थे, जब कि भारत में दर्जनों
नगर सुन्दर से सुन्दर इमारतों से सुसज्जित और अत्यन्त घने बसे हुए थे,
जब कि दिल्ली और आगरे के क़िले और ताजमहल जैसी इमारतें बन
with mud. His fire was chimney-less—often it was made of peat. In the
objects and manner of his existence he was but a step above the industrious
beaver who was building his dam in the adjacent stream. There were high-
waymen on the roads, pirates on the rivers, vermin in abundance in the
clothing and beds. The common food was peas, vetches, fern roots and
even the bark of trees. There was no commerce to put off famine. Man
was altogether at the mercy of the seasons. The population, sparse as it
was, was perpetually thinned by pestilence and want. Nor was the state of
the townsman better than that of the rustic; his bed was a bag of straw,
with a hard round log for his pillow. If he was in easy circumstances, his
clothing was of leather, if poor, a wisp of straw wrapped round his limbs
kept off the cold. . . . . As to the mechanic, how was it possible that he
could exist where there were no windows made of glass, not even of oiled
paper, no workshop warmed by a fire. For the poor there was no physician
. . . Sanitary provisions there were none. . . the rapidity of its
(syphilis') spread all over Europe is a significant illustration of the fearful
immorality of the times. If contemporary authors are to be trusted, there
was not a class, married or unmarried, clergy or laity, from the holy father,
Leo X, to the begger by the wayside, free from it. . . . Its (England's)

३० पुस्तक प्रवेश
चुकी थीं, और जब कि औरङ्गज़ेब तक के शासनकाल में देश के पूरब से
पश्चिम और दक्खिन से उत्तर तक प्रजा में चारों ओर अलौकिक सुख
समृद्धि और सुशासन दिखाई देता था । निस्सन्देह मज़हब के नाम पर
इङ्गलिस्तान के अन्दर जिन भयङ्कर अत्याचारों का ऊपर ज़िक्र आया है,
उनके सामने औरङ्गज़ेब की धार्मिक सङ्कीर्णता भी उदारता थी । यही हालत
उस समय शेष अधिकांश यूरोप की थी । हमें यह भी याद रखना चाहिए
कि इङ्गलिस्तान की यह हालत १८ वीं सदी के शुरू तक बनी रही । इसी
population hardly reached five millions . . . It was a system of orga-
nized labour, the possession of land being a trust, not a property. But now
commerce was begining to disturb the foundations on which all these arrange-
ments had been sustained, and to compel a new distribution of population;
trading companies were being established ; men were unsettled by the rum-
ours or realities of immense fortunes rapidly gained in foreign adventure .
. . A nation so illiterate that many of its peers in Parliament could neither
read nor write, . . . to so great an extent had these immoralities gone that
it was openly asserted that there were one hundred thousand women in
England made dissolute by the clergy. . . . . The vilest crime in an
ecclesiastic might be commuted for money, six shillings and eight pence
being sufficient in the case of mortal sin. . . . the close of the seventeenth
century . . . London . . . was dirty, ill—built, without sanitary
provisions. . . . Wild animals roamed here and there. . . . In the rainy
seasons the roads were all but impassable . . . It was no uncommon thing
for persons to lose their way, and have to spend the night out in the air.
Between places of considerable importance the roads were sometimes very
little known, and such was the difficulty for wheeled carriages that a principal
mode of transport was by pack-horses, of which passengers took advantage,
stowing themselves away between the packs . . . Toward the close of the
century what were termed 'flying coaches' . . could move at the rate of
from thirty to fifty miles in a day . . . near the sources of the Tyne there
were people scarcely less savage than American Indians, their half-naked

वे और हम ३१
बयान में यह भी साफ़ लिखा है कि किस तरह हिन्दोस्तान जैसे देशों के
धन का चरचा भूखे और अर्धसभ्य अंगरेज़ों को यहाँ तक खींच कर लाया,
और किस तरह ईस्ट इण्डिया कम्पनी जैसी कम्पनियाँ बनीं।
वास्तव में इङ्गलिस्तान के पिछले इतिहास में कभी कोई इस तरह की
सभ्यता का ज़माना न गुज़रा था, जिस तरह की सभ्यता भारत में हज़ारों
साल पहले से चली आती थी, और जिसका हम आगे चलकर थोड़ा बहुत
ज़िक्र करेंगे।
इंग्लिस्तान को सभ्य बनाने की कोशिशें
ऐतिहासिक ज़माने में सबसे पहले हज़रत ईसा के जन्म के आस पास
ईरान की मशहूर मित्री सम्प्रदाय के प्रचारकों ने इंगलिस्तान पहुँच कर वहाँ
के अर्द्ध सभ्य बाशिन्दों को सभ्य बनाने और उनमें पाप पुण्य या धर्म
अधर्म के विचार पैदा करने की कोशिश की। एक बार मित्री सम्प्रदाय का,
women chanting a wild measure, while the men, with brandished dirks,
danced a war-dance. . . . . It might be expected that the women were
ignorant enough when very few men knew how to write correctly . . . .
Social discipline was very far from being of that kind which we call moral
. . . the husband (whipped) his wife . . . A culprit was set in the pillory
to be pelted with brickbats . . . women were fastened by the legs in the
stocks at the market-place . . . Such a hardening of heart . . . The
houses of the rural population were huts covered with strawthatch . . .
In London the houses were mostly of wood and plaster, the streets filthy
beyond expression. After nightfall a passenger went at his peril, for chamber
windows were opened and slop pails unceremoniously emptied down.
There were no lamps in the streets. . . . Hardly any personage died who
was not popularly suspected to have been made away with by poison, an
indication of the morality generally supposed to prevail among the higher
classes . . . flood of immorality . . . The University of Oxford had

३२ पुस्तक प्रवेश
जिसने रोमन लोगों में सब से पहले पाप पुण्य के विचार पैदा किये,
इंगलिस्तान भर में ख़ूब ज़ोर रहा। इंगलिस्तान के अनेक हिस्सों में वैदिक
देवता मित्र के मन्दिर क़ायम हुए, जिनके टूटे हुए अवशेष अभी तक अजायब
घरों में मौजूद हैं। किन्तु आने जाने की असुविधाओं और इंगलिस्तान की
बहुत अधिक असभ्य अवस्था के कारण यह असर देर तक न ठहर सका।
इसके बाद से रोमन लोगों ने इंगलिस्तान के बाशिन्दों को सभ्य बनाने
की कोशिश की। चार सौ साल तक इंगलिस्तान पर रोम वालों की हुकूमत
रही, किन्तु इंगलिस्तान रोमन साम्राज्य के बिलकुल एक दूर के किनारे
पर पड़ता था और इन चार सौ साल के अन्दर सबसे बड़ा उपयोग जो
रोम के शासकों ने इंगलिस्तान का किया, या जो वह कर सके वह यही था
ordered the political works of Buchanan, Milton, and Baxter to be publicly
burnt in the court of the schools . . . In administering the law, whether
in relation to political or religious offences, there was an incredible atrocity.
In London, the crazy old bridge over the Thames was decorated with grin-
ning and mouldering heads of criminals, under an idea that these ghastly
spectacles would fortify the common people in their resolves to act accor-
ding to law. The toleration of the times may be understood from a law
enacted by the Scotch Parliament, May 8, 1685, that whoever preached or
heard in a conventicle should be punished with death and the confiscation
of his goods. That such an infamous spirit did not content itself with mere
dead-letter laws there is too much practical evidence to permit anyone to
doubt. . . Shrieking Scotch Covenanters were submitted to torture by
crushing their knees flat in the boot; women were tied to stakes on the sea-
sands and drowned by the slowly advancing tide because they would not
attend Episcopal worship, or branded on their cheeks and then shipped to
America . . The court ladies, and even the Queen of England herselt,
were so utterly forgetful of womanly mercy and common humanity as to join
in this infernal traffic."—The Intellectual Development of Europe, by John
William Draper, vol. ii. pp. 230-244.

वे और हम ३३
कि इंग्लिस्तान से हज़ारों जवान लड़कों और लड़कियों को हर साल
पकड़ पकड़ कर अपने साम्राज्य के दूसरे हिस्सों में लेजाकर गुलाम बना कर
बेचते रहे। एक ज़माना था जब कि रोमन साम्राज्य भर में किसी देश के
गुलामों की इतनी माँग न थी जितनी ब्रिटिश गुलामों की।
सभ्यता या संस्कृति की तीसरी लहर जो ऐतिहासिक समय के अन्दर
इंग्लिस्तान के किनारों से जाकर टकराई ईसा की सातवीं सदी में इंग्लिस्तान
निवासियों का ईसाई धर्म स्वीकार करना था। किन्तु ईसाई धर्म से भी
अपनी अनुन्नत अवस्था के कारण इंग्लिस्तान निवासियों ने सिवाय भद्दे
भद्दे मूढ़ विश्वासों, प्रतिमा पूजा, साम्प्रदायिक पक्षपात और कलह के उस
समय और कुछ न सीखा।
इसके बाद यूरोप में अरबों का समय आया। आधे यूरोप के ऊपर अरबों
का साम्राज्य क़ायम हो गया। सभ्यता, विज्ञान, शिक्षा, कला कौशल और
समृद्धि की दृष्टि से यूरोप ने कभी उससे पहले इतने अच्छे दिन न देखे थे।
इंग्लिस्तान कई कारणों से इस अरब साम्राज्य से बाहर रहा। किन्तु यूरोप
के बड़े से बड़े विद्यालय अरब प्रोफ़ेसरों से भरे हुए थे और अरबी ही सारे
यूरोप की सर्वोच्च शिक्षा का माध्यम थी। ईसा की दसवीं और ग्यारहवीं
सदियों में इंग्लिस्तान का कोई मनुष्य उस समय तक शिक्षित न माना
जा सकता था जब तक कि वह अरबी भाषा से अच्छी तरह परिचित न हो।
किन्तु थोड़े दिनों के अन्दर ही यूरोप की संकीर्ण धार्मिक प्रवृत्तियों ने अरबों
के इस असर का भी ख़ात्मा कर दिया। इसके बाद जो क़रीब एक हज़ार
साल का समय तमाम यूरोप में अंधकार युग (dark ages) के नाम से
३

३४ पुस्तक प्रवेश
मशहूर है उसमें कम से कम ५०० साल तक इंगलिस्तान और देशों से भी
अधिक गहरे अंधेरे में डूबा रहा ।
सारांश यह कि पाप पुण्य, या धर्म अधर्म के इस तरह के नैतिक
आदर्श जो प्राचीन वैदिक मत, बौद्ध मत, जैन मत इत्यादि के कारण
भारत में हज़ारों साल से स्थिर हो चुके थे और जो हर भारतवासी की पैतृक
मानसिक सम्पत्ति थे, उस समय तक कभी भी इंगलिस्तान में स्थिर होने
न पाये थे ।
इसके अलावा १८ वीं सदी के शुरू तक इंगलिस्तान के जन सामान्य न
केवल भयंकर दरिद्रता ही में डूबे हुए थे, वरन् थोड़े से रईसों और ज़मीं-
दारों को छोड़कर ९० फ़ीसदी इंगलिस्तान निवासियों की हालत अनेक
बातों में ज़रख़रीद गुलामों की हालत से बेहतर न थी । जिस पार्लिमेण्टरी
शासन पद्धति की इतनी अधिक डींग हाँकी जाती है, उसका जन्म भी इस
आपसी कलह और द्वेष ही में हुआ था, जिसके लिये सुसभ्य, सुसंगठित,
खुशहाल भारत में कभी कोई गुञ्जाइश ही न थी । सुसंगठित ग्राम-पंचायतों
के रूप में ग्रामवासियों के सच्चे स्वराज्य या ग्रामतन्त्र का इंगलिस्तान
निवासियों को कभी अनुमान तक न हो सकता था । न राजा और प्रजा
के बीच वह सुन्दर धार्मिक सम्बन्ध वहाँ कभी क़ायम हो पाया था जो,
हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों के शासनकाल में भारत में कम से कम दो
हज़ार साल से ऊपर तक क़ायम रहा । इन सब बातों को हम आगे चल
कर अधिक विस्तार के साथ बयान करेंगे ।
सच यह है कि इस तरह के नैतिक आदर्श केवल सदियों के सुसभ्य

वे और हम ३५
जीवन द्वारा ही पैदा हो सकते हैं और इंगलिस्तान निवासियों को इस तरह
के सुसभ्य जीवन का कभी भी सौभाग्य प्राप्त न हुआ था ।
इंगलिस्तान और भारत की टक्कर
सत्रहवीं सदी के शुरू में इस तरह की एक क़ौम के साथ भारत जैसे
प्राचीन देश का पहली बार सम्पर्क हुआ । क़रीब सौ साल तक वे केवल
यहाँ थोड़ा बहुत व्यापार कर धन कमाते रहे । अठारहवीं सदी के शुरू में
औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य की संहति में फ़र्क़ पड़ा । सौ
साल के अन्दर इन विदेशियों की लालसा और आकांक्षा बेहद बढ़ चुकी
थी । न्याय अन्याय या ईमानदारी बेईमानी का कोई सवाल उस समय
उनकी आकांक्षाओं और उनकी पूर्ति के उपायों में बाधा डालने वाला न
था । तिजारती कोठियों के बहाने इन लोगों ने क़िलेबन्दी शुरू की । उदार
भारतीय नरेशों ने इसकी तनिक भी परवा न की । देश में व्यापार की उन्हें
खुली इजाज़त और अनेक सुविधाएँ दी ही जा चुकी थीं । विदेशियों का
बल बढ़ता गया । भारतीय व्यापार से उचित और अनुचित तरीक़ों से
उन्होंने बेहद धन कमाना शुरू किया । धन से फ़ौजें रक्खी गईं । फ़ौजों की
मदद से उन्होंने मद्रास और बंगाल में भारतीय नरेशों के आपसी झगड़ों
में कभी एक का और कभी दूसरे का पक्ष लेना शुरू किया । इस कूटनीति
और इन साज़िशों द्वारा विदेशियों का बल और बढ़ता चला गया । दिल्ली
साम्राज्य की निर्बलता के कारण कोई केन्द्रीय शक्ति इस समस्त स्थिति को
समझने और उसका उपाय कर सकने वाली बाक़ी न रह गई थी । भारतीय
नरेशों को एक दूसरे से लड़ाकर इलाक़े पर इलाक़ा विदेशियों के शासन में
आता गया । अब हम कुछ अंग्रेज़ इतिहास लेखकों ही के विचार इस

३६ पुस्तक प्रवेश
विषय में दे देना चाहते हैं कि मोटे तौर पर किन किन उपायों से उस समय
से धीरे धीरे अंगरेज़ों ने भारत में एक इतना बड़ा साम्राज्य क़ायम कर लिया,
और इस देश के समृद्ध और लहलहाते हुए जीवन का अन्त कर दिया ।
अंगरेज़ी राज क़ायम होने के तरीक़े
एक यूरोपियन विद्वान लिखता है —
“किसी भारतीय सन्त ने अपने देश के अन्दर यूरोपनिवासियों
की तुलना दीमकों के साथ की है। आरम्भ में दीमकों की क्रियाएँ
या तो अंधेरे में ज़मीन के नीचे से शुरू होती हैं या कम से कम
दिखाई नहीं देतीं । किन्तु इन दीमकों का लक्ष्य निश्चित होता
है और वे चुपचाप और अज्ञात उस लक्ष्य को पूरा करने में लगी
रहती हैं। बन के हरे वृक्षों को नष्ट कर डालती हैं और उन्हें
भीतर ही भीतर खाकर उनके खोखले तनों में अपनी इमारतें खड़ी
कर लेती हैं, उन इमारतों तक पास की और दूर की कड़ी मिट्टी
की बामियों से आने जाने के लिए वे अनेक गुप्त रास्ते बना लेती
हैं। जहाँ पहले दूर तक फैले हुए देवदार के वृक्ष लहलहाते थे वहाँ
बामियाँ ही बामियाँ दिखाई देने लगती हैं। ये दीमकें हर चीज़
पर धावा करती हैं, हर चीज़ को खा जाती हैं, भीतर ही भीतर
जड़ों को खोद डालती हैं, खोखला कर देती हैं और सब वीरान
कर डालती हैं। इस उपमा पर हम अधिक गर्व नहीं कर सकते,
यद्यपि उपमा एक दरजे तक फबती हुई है । X X X किन्तु कुछ
हो, इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि भारतवर्ष के साथ
हमारे शुरू के सम्बन्ध में बहुत सी ऐसी बातें हुई हैं जिनको याद

वे और हम ३७
करके कोई भी सदाचार को समझने वाला मनुष्य काँप उठेगा
और कोई भी सच्चा ईसाई जिनका घृणा के साथ निषेध किए
बिना नहीं रह सकता ।”*
एक और अंगरेज विद्वान लिखता है—
“कम्पनी ने बंगाल का राज या अरकाट का राज या दूसरे
किसी भी प्रान्त का राज और किन उपायों से प्राप्त किया, सिवाय
झूठी क़समें खाने और जालसाज़ियाँ करने के ?”†
विलियम हॉविट नामक एक अंग्रेज़ लिखता है—
“जिस तरीक़े से ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने हिन्दोस्तान पर
क़ब्ज़ा किया उससे अधिक बीभत्स और ईसाई सिद्धान्तों के विरुद्ध
किसी दूसरे तरीक़े की कल्पना तक नहीं की जा सकती । × × ×
यदि कोई कुटिल से कुटिल तरीक़ा हो सकता था—जिसमें नीच
से नीच अन्याय की कोशिशों पर न्याय का बढ़िया मुलम्मा फेरने


  • "Some native sage has compared the Europeans in India to dimaks
    or white ants, which from dark or scarcely visible beginnings, pursue their
    determined objects insidiously and silently, destroying green forest trees and
    in their excavated trunks building edifices, communicating by numerous
    galleries with the hardened clay pyramids, far and near, that denote where
    formerly flourished the far-spreading cedars. Attacking everything, devou-
    ring everything, they undermine and sap and desolate. The simile is not a
    very flattering one, though it is not in some measure without its aptitude
    either, . . . After all, however, there can be no question that in our early
    connection with India, there was much, from the contemplation of which,
    the moralist will shrink, and the Christian protest against, with abhorrence."
    The Calcutta Review, vol. vii, (1847), p. 226.
    † "How did the Company acquire Bengal, but by perjury and forgery?
    Or Arcot, or any other principality?"—The British Friend of India—
    March, 1843.

३८ पुस्तक प्रवेश
की कोशिश की गई हो—यदि कोई तरीक़ा अधिक से अधिक
निष्ठुर, क्रूर, गर्वयुक्त और दयाशून्य हो सकता था, तो वह तरीक़ा
है जिससे भारतवर्ष की अनेक देशी रियासतों का शासन देशी
राजाओं के हाथों से छीन छीन कर ब्रिटिश सत्ता के चंगुल में
इकट्ठा कर दिया गया है × × × जब कभी हम दूसरी क़ौमों के
सामने अंगरेज़ क़ौम की सच्चाई और ईमानदारी का ज़िक्र करते हैं
तो वे भारत की ओर इशारा करके ख़ूब हिक़ारत के साथ हमारा
मज़ाक़ उड़ा सकते हैं। × × × जिस तरीक़े पर चल कर,
लगातार सौ साल से ऊपर तक, देशी राजाओं से उनके इलाक़े
छीने जाते रहे, और वह भी न्याय और औचित्य की पवित्रतम
आड़ में, उस तरीक़े से बढ़ कर दूसरों को यन्त्रणा पहुँचाने का
तरीक़ा राजनैतिक या धार्मिक किसी मैदान में किसी भी ज़ालिम
हुकूमत ने कभी पहले ईजाद न किया था; संसार में उसके
मुक़ाबले की कोई दूसरी मिसाल नहीं मिल सकती।"*

  • "... the mode by which the East India Company has possessed
    itself of Hindostan, as the most revolting and un-Christian that can possibly
    be conceived . . . if ever there was one system more Machiavelian, more
    appropriative of the show of justice where the basest injustice was attempted,
    more cold, cruel, haughty and unrelenting than another, it is the system by
    which the Government of the different states of India has been wrested from
    the hands of their respective princes and collected into the grasp of the
    British power. . . Whenever we talk to other nations of British faith and
    integrity, they may well point to India in derisive scorn. . . . The system
    which for more than a century, was steadily at work to strip the native
    princes of their dominions, and that too under the most sacred pleas of right
    and expediency, is a system of torture more exquisite than regal or spiritual

वे और हम ६६
स्पेन्सर के विचार
प्रसिद्ध अंगरेज़ तत्ववेत्ता हरबर्ट स्पेन्सर पिछले क़रीब सौ साल के ईस्ट
इण्डिया कम्पनी के भारतीय शासन का सन् १८४१ में सिंहावलोकन करते
हुए लिखता है—
"पिछली सदी में भारत में रहने वाले अंगरेज़, जिन्हें बर्क ने
'भारत में शिकार की ग़रज़ से जाने वाले फ़सली परिन्दे' बतलाया
है, अपने मुक़ाबले के पेरू और मेक्सिको निवासी यूरोपियनों❄
से कुछ ही कम ज़ालिम साबित हुए। कल्पना कीजिए कि उनके
कृत्य कितने कलुषित रहे होंगे, जब कि कम्पनी के डाइरेक्टरों तक
ने यह स्वीकार किया कि 'भारत के आन्तरिक व्यापार में जो
बड़ी बड़ी पूँजियां कमाई गई हैं वे इतने ज़बरदस्त अन्यायों
और अत्याचारों द्वारा प्राप्त की गई हैं, जिनसे बढ़ कर अन्याय
और अत्याचार कभी किसी देश या किसी ज़माने में भी सुनने
में नहीं आए।' अनुमान कीजिए कि वन्सीटॉर्ट ने समाज की
जिस दशा को बयान किया है वह कितनी बीभत्स रही होगी, जब
कि वन्सीटॉर्ट हमें बतलाता है कि अंगरेज़ भारतवासियों को विवश
करके जिस भाव चाहते थे, उनसे माल ख़रीदते थे और जिस
भाव चाहते थे उनके हाथ बेचते थे, और जो कोई इनकार करता
tyranny ever before discovered; such as the world has nothing similar to
show."—The English in India—System of Territorial Acquistion, by
William Howitt.
❄ जिन्हों ने वहां के लाखों आदिमनिवासियो को अंग भंग कर के
और उनका शिकार खेल खेल कर उन्हें निर्मूल कर दिया—लेखक

४० पुस्तक प्रवेश

था उसे बेत या क़ैदख़ाने की सज़ा देते थे। विचार कीजिए कि
उस समय देश की क्या हालत रही होगी जब कि अपनी किसी
यात्रा को बयान करते हुए वारन हेस्टिंग्स लिखता है कि, 'हमारे
पहुँचते ही लोग अधिकांश छोटे क़स्बों और सरायों को छोड़
छोड़ कर भाग जाते थे।' इन अंगरेज़ अधिकारियों की निश्चित
नीति ही उस समय यह थी कि बिना किसी कारण के देशवासियों
के साथ दग़ा की जावे। देशी नरेशों को धोखा देकर उन्हें एक
दूसरे से लड़ा दिया गया ; पहले उनमें से किसी एक को उसके
विपक्षी के विरुद्ध मदद दी गई, और फिर किसी न किसी
दुर्व्यवहार का बहाना लेकर उसी को तख़्त से उतार दिया गया।
इन सरकारी भेड़ियों को किसी न किसी गँदले नाले का बहाना
सदा मिल जाता था। जिन मातहत सरदारों के पास इस तरह के
इलाक़े होते थे, जिन पर इन लोगों के दाँत होते थे, उनसे बड़ी
बड़ी अनुचित रक़में बतौर ख़िराज के लेकर उन्हें निर्धन कर दिया
जाता था, और अन्त में जब वे इन माँगों को पूरा करने के
नाक़ाबिल हो जाते थे तो इसी सङ्गीन जुर्म के दण्ड रूप उन्हें
गद्दी से उतार दिया जाता था। यहाँ तक कि हमारे समय (१८२१)
में भी उसी तरह के ज़ुल्म जारी हैं। आज दिन तक नमक का
कष्टकर ठेका और लगान की वही निर्दय प्रथा जारी है, जो कि
ग़रीब रय्यत से ज़मीन की क़रीब क़रीब आधी पैदावार चूस लेती
है। आज दिन तक भी वह धूर्ततापूर्ण स्वेच्छाशासन जारी है, जो
देश को पराधीन बनाए रखने और उस पराधीनता को बढ़ाने के

वे और हम ५१
लिए देशी सिपाहियों का ही बतौर साधनों के उपयोग करता है।
इसी स्वेच्छाशासन के नीचे अभी बहुत साल नहीं गुज़रे कि
हिन्दोस्तानी सिपाहियों की एक पूरी रेजिमेण्ट को इसलिए जान
बूझ कर क़त्ल कर डाला गया, क्योंकि उस रेजिमेण्ट के सिपाहियों
ने बग़ैर पहरने के कपड़ों के कूच करने से इनकार कर दिया था।
आज दिन तक पुलिस के कर्मचारी धनवान लफङ्गों के साथ मिल
कर ग़रीबों से ज़बरदस्ती धन ऐंठने के लिए सारी क़ानूनी मशीन
को काम में लाते हैं। आज के दिन तक साहब लोग हाथियों पर
बैठ कर निर्धन किसानों की खड़ी फ़सलों में से जाते हैं और गाँव
के लोगों से बिना क़ीमत दिए रसद वसूल करते हैं। आज के
दिन तक यह एक आम बात है कि दूर के ग्रामों में रहने वाले
लोग किसी यूरोपियन की शक्ल देखते ही जङ्गल में भाग
जाते हैं।"*

  • "The Anglo-Indians of the last century whom Burke described as
    'Birds of prey and passage in India' showed themselves only a shade less
    cruel than their prototypes of Peru and Mexico. Imagine how black must
    have been their deeds, when even the Directors of the Company admitted
    'That the vast fortunes acquired in the inland trade have been obtained by
    a scene of the most tyrannical and oppressive conduct, that was ever known
    in any age or country.' Conceive the atrocious state of society described
    by Vansittart, who tells us that the English compelled the natives to buy or
    sell at just what rates they pleased on pain of flogging or confinement.
    Judge to what a pass things must have come when, in describing a journey,
    Warren Hastings says 'Most of the petty towns and serais were deserted at
    our approach.' A cold-blooded treachery was the established policy of the
    authorities. Princes were betrayed into war with each other; and one of
    them having been helped to overcome his antagonist, was then himself

४२ पुस्तक प्रवेश
कम्पनी के पाप
एक और अंगरेज़ लेखक डॉक्टर रसल लिखता है—
"ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भारतीय शासन को आरम्भ से
ही बड़े बड़े पापों ने कलुषित कर रक्खा था, × × × लगातार
अनेक पीढ़ियों तक बड़े से बड़े सिविल और फ़ौजी अफ़सरों से
लेकर छोटे से छोटे कर्मचारियों तक, कम्पनी के मुलाज़िमों का
एक मात्र महान लक्ष्य और उद्देश यह रहता था कि जितनी जल्दी
हो सके और जितनी बड़ी से बड़ी पूँजी हो सके, इस देश से
निचोड़ ली जाय और फिर अपना मतलब पूरा करते ही सदा के
लिए इस देश को छोड़ दिया जाय । × × × यह बात बिलकुल
dethroned for some alleged misdemeanour. Always some muddied stream
was at hand as a pretext for official wolves Dependent chiefs possessing
coveted lands were impoverished by exorbitant demands for tribute and
then ultimate inability to meet these demands was construed into a treaso-
nable offence, punished by deposition. Even down to our own day kindred
iniquities are continued. Down to our own day, too are continued the
grievous salt monopoly and the pitiless taxation, that wring from the poor
ryots nearly half the produce of the soil. Down to our own day continues
the cunning despotism which uses native soldiers to maintain and extend
native subjection a despotism under which, not many years since, a regiment
of sepoys was deliberately massacred, for refusing to march without proper
clothing. Down to our own day, the police authorities league with wealthy
scamps, and allow the machinery of the law to be used for the purposes of
extortion. Down to our own day, so called gentlemen will ride their ele-
phants through the crops of impoverished peasants and will supply them-
selves with provisions from the native villages without paying for them.
And down to our own day it is common with the people in the interior to
run into the woods at sight of a European."—Social Statics, by Herbert
Spencer.