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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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४० पुस्तक प्रवेश

था उसे बेत या क़ैदख़ाने की सज़ा देते थे। विचार कीजिए कि
उस समय देश की क्या हालत रही होगी जब कि अपनी किसी
यात्रा को बयान करते हुए वारन हेस्टिंग्स लिखता है कि, 'हमारे
पहुँचते ही लोग अधिकांश छोटे क़स्बों और सरायों को छोड़
छोड़ कर भाग जाते थे।' इन अंगरेज़ अधिकारियों की निश्चित
नीति ही उस समय यह थी कि बिना किसी कारण के देशवासियों
के साथ दग़ा की जावे। देशी नरेशों को धोखा देकर उन्हें एक
दूसरे से लड़ा दिया गया ; पहले उनमें से किसी एक को उसके
विपक्षी के विरुद्ध मदद दी गई, और फिर किसी न किसी
दुर्व्यवहार का बहाना लेकर उसी को तख़्त से उतार दिया गया।
इन सरकारी भेड़ियों को किसी न किसी गँदले नाले का बहाना
सदा मिल जाता था। जिन मातहत सरदारों के पास इस तरह के
इलाक़े होते थे, जिन पर इन लोगों के दाँत होते थे, उनसे बड़ी
बड़ी अनुचित रक़में बतौर ख़िराज के लेकर उन्हें निर्धन कर दिया
जाता था, और अन्त में जब वे इन माँगों को पूरा करने के
नाक़ाबिल हो जाते थे तो इसी सङ्गीन जुर्म के दण्ड रूप उन्हें
गद्दी से उतार दिया जाता था। यहाँ तक कि हमारे समय (१८२१)
में भी उसी तरह के ज़ुल्म जारी हैं। आज दिन तक नमक का
कष्टकर ठेका और लगान की वही निर्दय प्रथा जारी है, जो कि
ग़रीब रय्यत से ज़मीन की क़रीब क़रीब आधी पैदावार चूस लेती
है। आज दिन तक भी वह धूर्ततापूर्ण स्वेच्छाशासन जारी है, जो
देश को पराधीन बनाए रखने और उस पराधीनता को बढ़ाने के