भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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जीवन द्वारा ही पैदा हो सकते हैं और इंगलिस्तान निवासियों को इस तरह
के सुसभ्य जीवन का कभी भी सौभाग्य प्राप्त न हुआ था ।
इंगलिस्तान और भारत की टक्कर
सत्रहवीं सदी के शुरू में इस तरह की एक क़ौम के साथ भारत जैसे
प्राचीन देश का पहली बार सम्पर्क हुआ । क़रीब सौ साल तक वे केवल
यहाँ थोड़ा बहुत व्यापार कर धन कमाते रहे । अठारहवीं सदी के शुरू में
औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य की संहति में फ़र्क़ पड़ा । सौ
साल के अन्दर इन विदेशियों की लालसा और आकांक्षा बेहद बढ़ चुकी
थी । न्याय अन्याय या ईमानदारी बेईमानी का कोई सवाल उस समय
उनकी आकांक्षाओं और उनकी पूर्ति के उपायों में बाधा डालने वाला न
था । तिजारती कोठियों के बहाने इन लोगों ने क़िलेबन्दी शुरू की । उदार
भारतीय नरेशों ने इसकी तनिक भी परवा न की । देश में व्यापार की उन्हें
खुली इजाज़त और अनेक सुविधाएँ दी ही जा चुकी थीं । विदेशियों का
बल बढ़ता गया । भारतीय व्यापार से उचित और अनुचित तरीक़ों से
उन्होंने बेहद धन कमाना शुरू किया । धन से फ़ौजें रक्खी गईं । फ़ौजों की
मदद से उन्होंने मद्रास और बंगाल में भारतीय नरेशों के आपसी झगड़ों
में कभी एक का और कभी दूसरे का पक्ष लेना शुरू किया । इस कूटनीति
और इन साज़िशों द्वारा विदेशियों का बल और बढ़ता चला गया । दिल्ली
साम्राज्य की निर्बलता के कारण कोई केन्द्रीय शक्ति इस समस्त स्थिति को
समझने और उसका उपाय कर सकने वाली बाक़ी न रह गई थी । भारतीय
नरेशों को एक दूसरे से लड़ाकर इलाक़े पर इलाक़ा विदेशियों के शासन में
आता गया । अब हम कुछ अंग्रेज़ इतिहास लेखकों ही के विचार इस