भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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रह सकना नामुमकिन है ।"* इसके अलावा कोई नीच से नीच
काम ऐसा न हो सकता था जिसे अपनी इष्टसिद्धि के लिए क्लाइव
करने को तैयार न हो जाता । नजमुद्दौला के मृत्यु से एक लाभ
कम्पनी को और हुआ। उन्होंने 'दीवानी' मिलने पर नवाब के सैनिक
ख़र्च के लिए ५५ लाख रुपये सालाना देश की आमदनी में से देने का
वादा किया था । अब उसे घटा कर ४१ लाख ८१ हज़ार कर दिया ।
नजमुद्दौला की मृत्यु के साथ साथ मुर्शिदाबाद के नवाबों की
सत्ता की रही सही छाया भी बंगाल के इतिहास से लोप हो जाती
है। यद्यपि नाम या उपचार के लिए नजमुद्दौला के बाद उसका एक
छोटा भाई मसनद पर बैठा दिया गया और यह दोअमली वारन
हेस्टिंग्स के समय तक जारी रही, किन्तु वास्तव में बंगाल का सूबे-
दार अब केवल एक 'शून्य' रह गया, तीनों प्रान्तों का शासन
अंगरेज़ों के नियुक्त किए हुए तीन 'नायबों' के हाथों में आगया और
'अंगरेज़ सरकार' का ही बंगाल भर में ज़हूर दिखाई देने लगा । उस
समय से बंगाल का इतिहास केवल अंगरेज़ गवर्नरों के कारनामों
का इतिहास रह जाता है।
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के तमाम छोटे बड़े अंगरेज़ मुलाज़िमों
[हाशिया: भयंकर लूट और दोअमली] में धन का लोभ और दुराचार दोनों अब इस
दर्जे फैल गए थे कि नेकी, बदी या न्याय अन्याय
का विचार तो दूर रहा, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ
- "It is impossible, therefore, to trust him with power, and be safe."—
Clive's letter to the Court of Directors, dated 30th September, 1765.