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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २२३
“अपनी इच्छा के विरुद्ध मजबूर होकर यह प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ी।”
क्लाइव अब अपना उद्देश पूरा कर इलाहाबाद से कलकत्ते वापस
आ गया।
क्लाइव जब मुर्शिदाबाद से बनारस के लिए रवाना हुआ था
[हाशिया: नजमुद्दौला की] उसी समय अचानक नवाब नजमुद्दौला की मृत्यु
[हाशिया: हत्या] हो गई। जिन हालात में यह मृत्यु हुई वे काफी
शक पैदा करने वाले थे। 'सीअरुल मुताख़रीन'
से मालूम होता है कि नजमुद्दौला और मोहम्मद रज़ा ख़ाँ दोनों
मुर्शिदाबाद के बाहर एक बाग़ तक क्लाइव को छोड़ने के लिए आए।
क्लाइव के रवाना हो जाने पर जब ये दोनों अपने अपने महलों की
ओर लौटे तो मार्ग ही में नौजवान नवाब के पेट में एकाएक ज़बर-
दस्त दर्द पैदा हुआ और महल तक पहुंचते पहुंचते उसकी मृत्यु हो
गई। लिखा है कि उन दिनों आम लोगों का ज़ोरों के साथ यह
ख़याल था कि मोहम्मद रज़ा ख़ाँ ने नजमुद्दौला को मरवा डाला।
मोहम्मद रज़ा ख़ाँ अंगरेज़ों का खास आदमी था। वेरेल्स्ट
नामक अंगरेज़ के एक ख़त से मालूम होता है कि कलकत्ते में उन
दिनों यह ज़बरदस्त अफ़वाह थी कि नवाब नजमुद्दौला की हत्या में
लॉर्ड क्लाइव और उसके कई अंगरेज़ साथियों की साज़िश थी। *
इसमें सन्देह नहीं, क्लाइव नजमुद्दौला के ख़िलाफ़ था। पाँच लाख
रुपये नक़द ले लेने के बाद उसने डाइरेक्टरों के नाम एक ख़त में
लिखा—“नजमुद्दौला के हाथों सत्ता सौंप देना और ख़ैरियत से

  • Third Report 1773, p. 325.