भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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और अन्य स्थानों में निडर होकर लूट के लिए निकलते थे।” और
“बार बार अपनी दूकान छोड़ कर दल बना कर इधर उधर डाके
डालने जाते थे।” “उन दिनों कम्पनी के हर अंगरेज़ मुलाज़िम
का काम केवल यह था कि जितनी जल्दी हो सके, भारतवासियों से
दस या बीस लाख रुपए लूट खसोट कर इंगलिस्तान लौट जावे।”*
और आगे चल कर क्लाइव अपने उस ख़त में लिखता है :—
“× × × दौलत व्यवस्था की शत्रु है ही। इसी दौलत की वजह से
हमारी सेना प्रतिदिन बरबाद होती जा रही है × × × जब अंगरेज़ी फ़ौज
किसी शहर पर क़ब्ज़ा करती है तो उसके बाद सारा लूट का माल, दण्ड का
रुपया और सामान बे रोक टोक फ़ौज के लोग आपस में बाँट लेते हैं। × × ×
मैं आपको विश्वास दिला सकता हूँ कि बनारस में भी ऐसा ही हुआ। इससे
भी अधिक विचित्र बात यह है कि बनारस की लूट से कई साल पहले आपकी
ये स्पष्ट आज्ञाएँ आ चुकी थीं कि लूट के तमाम माल में से आधा कम्पनी
को मिलना चाहिए, फिर भी उस समय के गवर्नर और कौन्सिल ने बजाय
आपकी आज्ञा के अनुसार काम करने के × × × तमाम माल और रुपया
विजयी फ़ौज के सैनिकों में बाट दिया × × × ।
“× × × अय्याशी और रिश्वतख़ोरी का ज़ोर है × × ×।”
- "The razzias made with impunity in Bengal and elsewhere . . . .
the counting-house was deserted continually for marauding expeditions,
. . . During this period the business of a servant of the Company was
simply to wring out of the natives a hundred or two hundred thousand pounds
as speedily as possible, that he might return home. . . . ."—Torren's
Empire in Asia, pp. 82, 83.